The Mysterious Bell – Chapter 1076
मशीन वहीं खड़ी थी, पर अब उसके पहिये कड़े थे। उसके पीछे दो ट्रक खाली खड़े थे, और सीमेंट की बोरियों पर एक आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। हमें देखकर वो उठा, और उसने वो काग़ज़ जेब से निकाला जिस पर शालिनी की नज़र पहले ही पड़ चुकी थी।
"काग़ज़ आ गया?" उसके हिसाब से मुझे पूछना नहीं था।
शालिनी ने कहा, "कल छह बजे से पहले मशीन नहीं चलेगी। यह आदेश में है।"
आदमी ने सिर हिलाया। "मैं तो भई मशीन नहीं चलाता। मैं सिर्फ़ बोरियाँ ढोता हूँ। पर ये आप हमारे मालिक से कहिए। वो कहते हैं — मशीन दो दिन पहले भी रुक सकती थी, हमने रोके रखी है।"
"क्यों रोकी?"
"इसीलिए।" उसने हमारी तरफ़ देखा, फिर वो पहला काम किया जो वो शायद कभी नहीं करता — उसने बीड़ी बुझाई और जेब में रखी। "मालिक परसों आए थे। कुछ बोले नहीं। सिर्फ़ बक्से की तरफ़ देखा और मुस्कुराए। उसके बाद से मुझे रात को नींद नहीं आती।"
मेरी नज़र एक पल को उसकी जेब पर गई, जहाँ बुझी हुई बीड़ी पड़ी थी, और मन से मैंने कहा कि आदमी डर कर भी ऐसे ही बोलते हैं।
हम वापस लौटे। रास्ते में शालिनी बोली, "आज रात। मशीन रुकी है, पर वो रुकी हुई नहीं है। देर मत करो।"
"आज रात," मैंने दोहराया।
और शाम हो गई।
शाम को गली में वो अजीब सी शांति थी जो सिर्फ़ उस दिन आती है जब सबने एक साथ कुछ झूठ बोला हो। भोला भाई के शटर अब पूरे खुले थे, पर वो बाहर बैठे भी नहीं थे। किशनलाल काका की दुकान पर चना भी नहीं भुना था। और शबनम आपा की गुमटी पर चाय बन रही थी, पर कोई बोल नहीं रहा था।
मैं दुकान पर बैठा किसी साइकिल का पहिया सीधा कर रहा था, तभी मेरी नज़र गली के कोने पर गई।
वहाँ खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छोटा सा काला बैग, और दूसरे हाथ में एक कॉपी — जिस पर वो पेंसिल से कुछ लिख रहा था।
और जब लिखता, तो सिर उठाकर हमारी तरफ़ देखता — दुकान, चबूतरी, पीपल, फिर दुकान।
मैंने पहिया नीचे रखा और उसकी तरफ़ नहीं देखा। काम करने लगा, पर आँख की कोर से देखता रहा।
उसने एक लड़के को बुलाया। चिंटू था वो — पता नहीं कहाँ से वो वहाँ पहुँच गया। बात हुई, दो मिनट की। फिर चिंटू दौड़कर मेरे पास आया।
"भैया," उसने कहा, "वो अंकल कुछ पूछ रहे थे।"
"क्या पूछ रहे थे?"
चिंटू ने हाँफते हुए कहा, "पूछ रहे थे कि आज सुबह चबूतरी पर बल्ले से कौन लड़ा था। मैंने कहा — भैया, वो हमारी गली के लड़के हैं। फिर उन्होंने पूछा कि उस बड़े लड़के का नाम क्या है, जो अब्बा की जगह लड़ रहा था। मैंने कह दिया — गोलू।"
मेरे हाथ की रिंच रुक गई।
"और फिर?"
"फिर उन्होंने कॉपी में गोलू का नाम लिखा," चिंटू ने कहा। "नीली स्याही से। और नीचे एक तारीख़ लिखी।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"दुकान देखना," मैंने चिंटू से कहा। "कोई आए तो कहना कि भैया मंदिर की तरफ़ गए हैं।"
वो आदमी मंदिर के मोड़ पर मुड़कर फाटक की तरफ़ जा रहा था — उसी तरफ़ जहाँ पुराना बिजलीघर है। मैं उसके पीछे नहीं गया। मैंने दीवार के उस हिस्से पर नज़र डाली जहाँ वो खड़ा था, और वहाँ धूल पर नीली स्याही में दो लकीरें और बीच में एक बिंदु का निशान बना था।
वही निशान।
जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर है। जो मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर है। जो घंटी के छल्ले पर है।
मैंने जेब में हाथ डाला।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "ये निशान क्यों आ रहा है पूरे शहर में?"
घंटी चुप रही। फिर बोली, "क्योंकि अब वो निशान नहीं, पता बन रहा है।"
"किसका पता?"
"उसका।" और फिर — "आज रात बिजलीघर मत जाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात वहाँ मैं नहीं, वो बोलेगा।"
और यह कहकर घंटी फिर चुप हो गई। इस बार ऐसे चुप हुई जैसे कोई बुज़ुर्ग बात कहकर मुँह फेर लेता है, ताकि सामने वाला अपनी समझ से काम करे।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो गुमटी के बाहर खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उनकी आँखें भी उसी फाटक की तरफ़ थीं।
"आपा," मैंने कहा।
"देख रही हूँ," उन्होंने कहा। "वो आदमी रोज़ इस वक़्त नहीं आता।"
"आपको पता है वो?"
"पता नहीं, पर पहचानती हूँ।" आपा ने चिमटी नीचे रखी। "ये वही लोग हैं जो काग़ज़ लाते हैं, पर काग़ज़ पर खुद का नाम नहीं लिखते।"
रात आई।
और मैंने घंटी की बात नहीं मानी।
मैं गया — पर अकेला नहीं। मेरे साथ टिंकू था, जो मेरे पीछे चुपचाप चल रहा था, और शालिनी फाटक से सौ कदम दूर खड़ी थीं।
बिजलीघर का फाटक पहले से टूटा हुआ था। अंदर अंधेरा था, बस दीवार के एक हिस्से से पीली नीली रोशनी की हल्की सी लकीर निकल रही थी।
हम अंदर गए।
छह लोहे के बड़े बक्से दीवार के साथ रखे थे। उनमें से आख़िरी बक्सा खुला था — और उसी के सामने, दीवार से टिककर, एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता।
पीठ हमारी तरफ़ थी, इसलिए चेहरा नहीं दिखा। पर उसके गले में एक चीज़ नीली हो रही थी — गोल, पीतल जैसा, और वो रोशनी दे रही थी जैसे कोई चीज़ अंदर से जल रही हो।
वो ताबीज़।
मैंने टिंकू का कंधा दबाया और उसे दीवार से चिपका लिया।
और तभी बक्से से आवाज़ आई।
न ज़ोर से, न तेज़। लगातार। जैसे कोई बड़ा जानवर सोते हुए गुनगुना रहा हो — और धीरे-धीरे जाग रहा हो। दीवार में कंपन हुआ। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
वो आदमी नहीं हिला। उसने सिर्फ़ ताबीज़ पर हाथ रखा और एक लंबी साँस ली, वैसे जैसे बीमार आदमी दवा के बाद लेता है।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ चंद्रेश की नहीं, रणवीर भारद्वाज की थी, इतनी साफ़ कि मैं ठंडा हो गया:
"एक और जोड़ बना आजु। छोटा सा। दो लड़के।" वो हँसा। "बारह अंक मिले होंगे उसे। मैंने भी पूरे बारह लिए। तुझे पता है न, मुझे भी भूख लगती है।"
बक्से से आवाज़ आई — इस बार गुनगुनाहट नहीं, एक गहरी, छोटी गुर्राहट।
रणवीर वहीं खड़े रहे एक पल, फिर मुड़कर बाहर की तरफ़ चले।
हम दीवार से चिपके रहे, जब तक उनके पीछे का अंधेरा फाटक से बाहर नहीं निकल गया।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। उसकी सतह गरम नहीं थी।
बर्फ़ जैसी थी।
"घंटी," मैंने फुसफुसाकर कहा। "अब बोल। क्या हो रहा है?"
बहुत देर बाद, बहुत धीमी आवाज़ में, घंटी ने कहा:
"अब दो भूखे हैं। एक बक्से में। एक मेरे अंदर।"
॥
घंटी की आख़िरी बात बिजलीघर की दीवारों से टकराकर लौट आई, जैसे कोई पुराना कुआँ तुम्हारी अपनी आवाज़ वापस थूक देता है।
अब दो भूखे हैं। एक बक्से में। एक मेरे अंदर।
मैंने टिंकू का कंधा पकड़ा। उसका शरीर काँप रहा था, और उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर इतनी ज़ोर से चिपकी थीं कि मुझे उसकी हड्डियाँ महसूस हुईं।
“उस्ताद,” उसने फुसफुसाया। “वो… वो रणवीर था न?”
“हाँ।”
“और बक्से से आवाज़ आ रही थी?”
“हाँ।”
“तो बक्से में कौन है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा सिर्फ़ आधा दिख रहा था, बाकी आधा उस पीली रोशनी की लकीर में, जो दीवार की दरार से आ रही थी।
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर जो भी है, वो भूखा है। और भूखे से सीधे नहीं उलझते।”
हम दीवार से चिपके-चिपके बाहर निकले। फाटक के पास पहुँचकर मैंने पीछे देखा — बक्सा अब भी खुला था, और उसके भीतर से आती गुर्राहट अब धीमी हो चुकी थी, जैसे जानवर खा चुका हो और अब सो रहा हो।
शालिनी सौ कदम दूर, उसी पुराने नीम के नीचे खड़ी थीं। उन्होंने हमें देखा और तेज़ी से आगे आईं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno