The Mysterious Bell – Chapter 1061
"बस्ती की आवाज़," उसने कैमरे से कहा, आवाज़ में कोई काँप नहीं, "यह सीधा प्रसारण है नूर अस्पताल के गेट से। यहाँ आज सुबह एक वार्ड सील किया जा रहा है। काग़ज़ दिखाया गया है, जिस पर नगर निगम की मुहर नहीं, एक ठेकेदार की मुहर है। अंदर मरीज़ हैं। एक मरीज़ की साँस मशीन पर है। और सील लगाने वाले अफ़सर से मेरा एक सवाल है —"
वो आगे बढ़ी, कैमरा सामने, और अफ़सर के चेहरे पर रोशनी पड़ी।
"साहब, इस काग़ज़ पर मरीज़ों की सूची क्यों नहीं है?"
अफ़सर ने हाथ से कैमरा रोकने की कोशिश की। "रिकॉर्डिंग बंद करो।"
"सार्वजनिक जगह पर रिकॉर्डिंग बंद करने का आदेश आपके पास नहीं है," शालिनी ने कहा। "और अगर है, तो दिखाइए।"
अफ़सर ने कुछ नहीं कहा।
और तभी भीड़ में से आवाज़ें आने लगीं — अलग-अलग, टूटी हुई, पर साफ़।
"मेरी बहू का इलाज यहीं चल रहा है!"
"मेरे बच्चे का बुखार यहीं उतरा था!"
"डॉक्टर साहब ने मेरे पोते की जान बचाई थी!"
"यह अस्पताल मेरे बाप का नहीं, हमारा है!"
शबनम आपा ने चिमटी थाली पर पटकी। टन्न। भीड़ चुप हुई।
"एक-एक करके," उन्होंने कहा। "चीखने से काग़ज़ नहीं जलता, गवाही से जलता है।"
और फिर मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था — मैं सीधा पीले वार्ड के दरवाज़े पर गया और अफ़सर के सामने खड़ा हो गया।
"साहब," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहले थोड़ी फँसी, फिर साफ़ हुई। "अंदर एक औरत है। उसका नाम सुशीला यादव है। वो मेरी माँ है। वो छह महीने से इसी वार्ड में है। उसकी साँस मशीन पर है। मैं आपसे कोई काग़ज़ नहीं माँग रहा, कोई वकील नहीं लाया। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ — जब तक उसकी नली नहीं हटती, यह दरवाज़ा बंद नहीं होगा।"
अफ़सर ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल। दो पल। मुझे लगा कुछ बोलेगा।
उसने मुँह फेर लिया।
"पट्टी लगाओ," उसने कहा।
और वो शब्द — दो शब्द — मेरे अंदर कहीं गिरे, जैसे कोई भारी चीज़ सीढ़ियों से लुढ़कती हुई।
शकील मेरे पास आया। उसके हाथ काँप रहे थे।
"उस्ताद, वो औरत जो सुबह भागी थी — वो मेरे घर गई थी। उसने मेरी अम्मी से कहा कि अगर मैंने सच बोला तो अब्बा की दवा हमेशा के लिए बंद। मेरी अम्मी डर गई। उसी ने उसे बुलाया। मेरी गलती नहीं थी, उस्ताद।" उसकी आवाज़ टूट गई। "पर मैंने भी कुछ नहीं किया।"
"तूने सच बोल दिया," मैंने कहा। "यही बहुत है।"
"अब क्या होगा?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अभी दरवाज़ा बंद होने दो। फिर हम उसे खोलेंगे।"
"कैसे?"
"पता नहीं," मैंने सच कहा।
और शायद यही सच इस कहानी की सबसे ईमानदार बात थी — मुझे नहीं पता था। नहीं पता था कि सील खुलेगी कैसे, नहीं पता था कि माँ की दवा कल आएगी या नहीं, नहीं पता था कि वो सफ़ेद गाड़ी में बैठा आदमी कौन है जो बस उँगली उठाकर पूरी गली का रुख बदल देता है।
पर एक बात पता थी। अगर आज मैंने सिर्फ़ खड़े रहकर देखा, तो कल मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा।
सफ़ेद पट्टी वाले दोनों आदमी आगे आए। एक ने पट्टी का एक सिरा दरवाज़े के कुंडे पर रखा, दूसरे ने दूसरा। पतला बाबू आगे आया, स्याही की डिब्बी खोली, और उसने पट्टी के किनारे पर मुहर लगाने के लिए हाथ उठाया।
"एक मिनट," मैंने कहा।
बाबू रुका।
"मुहर लगाने से पहले," मैंने कहा, "यह बताइए कि इस वार्ड में अभी कौन-कौन है?"
बाबू ने अफ़सर की तरफ़ देखा। अफ़सर ने कुछ नहीं कहा।
"कोई सूची नहीं है," मैंने कहा। "तो मैं बताता हूँ। अंदर चार बेड हैं। एक बेड पर बूढ़ी औरत थी, जिसे अभी गलियारे में शिफ्ट किया गया। एक पर बच्चे वाली औरत थी, वो भी बाहर। एक पर सल्लू चाचा थे — वो बाहर, नली हाथ में। और एक पर मेरी माँ हैं, जो अंदर हैं, क्योंकि उनकी साँस मशीन से चल रही है और डॉक्टर साहब ने कहा कि हिलाने से जान जाएगी। अब आप मुहर लगाइए।"
बाबू का हाथ हवा में रुका रहा।
"लगाओ," अफ़सर ने कहा।
मुहर लगी। नीली स्याही पट्टी पर फैली।
और उसी पल, अंदर से, पीले वार्ड के भीतर से, एक आवाज़ आई।
खाँसी।
लंबी। खींची हुई। वो खाँसी जो रुकती नहीं, जो सीने से शुरू होकर पूरे शरीर को हिला देती है। और उसके बाद साँस लेने की वो आवाज़, जैसे कोई तिनका पानी से ऊपर आ रहा हो।
मैंने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।
"माँ!"
काजल अंदर थी। वो बाहर नहीं आई थी — वो माँ के पास रह गई थी। मैंने दरवाज़े की दरार से देखा। काजल माँ का हाथ पकड़े बैठी थी और रो रही थी, और माँ उसका हाथ सहला रही थीं, और उनके होंठ हिल रहे थे।
अफ़सर ने दूसरी मुहर लगाई। पट्टी चिपक गई।
"पूरा वार्ड बंद," उसने कहा। "अंदर जो है, उसे कल सुबह तक निकाल लिया जाएगा।"
"कल सुबह तक?" मैंने कहा। "उनकी दवा आज रात खत्म हो जाएगी।"
अफ़सर ने बैग बंद किया।
"मेरा काम खत्म," उसने कहा। "बाकी दफ़्तार देखेगा।"
वो मुड़ा।
और मैंने वो किया जो शायद मुझे नहीं करना चाहिए था — मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"साहब।"
वो रुका। उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया, पर देखा भी नहीं।
"आप किसी की जान नहीं ले रहे," मैंने कहा। "आप बस काग़ज़ पर मुहर लगा रहे हैं। कल आप घर जाएँगे, चाय पिएँगे, बच्चों से बात करेंगे। और यहाँ एक औरत रात भर साँस गिनेगी। साहब, एक बार अंदर झाँक लीजिए। एक बार। बस इतना कि आपको पता रहे कि आपने किसका दरवाज़ा बंद किया है।"
उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।
"बेटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी नरम हुई, "मेरे पास बच्चे हैं। मेरी नौकरी जाएगी तो उनका क्या होगा?"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि वो सच बोल रहा था।
और यही सबसे बुरा था — कि इस पूरी लड़ाई में हर आदमी के पास एक मजबूरी थी, और मजबूरी किसी को भी अच्छा नहीं बनाती।
"चलो," अफ़सर ने अपने आदमियों से कहा और वो मुड़कर चल दिया। भीड़ ने रास्ता दिया। कोई रोका नहीं। क्योंकि अब रोकने का कोई मतलब नहीं था — पट्टी चिपक चुकी थी।
शालिनी मेरे पास आई। उसने काग़ज़ की एक नकल मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"मैंने अफ़सर से माँगी," उसने कहा। "उसने दे दी। इसका मतलब वो खुद जानता है कि यह काग़ज़ कमज़ोर है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, सुन। इस काग़ज़ पर तीस दिन का नोटिस लिखा है, पर मुहर आज की है। मतलब किसी ने तीस दिन पहले की तारीख़ पर आज की मुहर लगाई है। यह पहला ऐसा काग़ज़ है जिसमें वो फँसे हैं।"
मैंने काग़ज़ देखा। वो सफ़ेद पट्टी, वो नीली मुहर, और नीचे की तारीख़ — जो कल की थी, पर जिसके आगे तीस दिन की बात लिखी थी।
"तो?"
"तो हमें इसे कल सुबह दस बजे चंद्रेश के दफ़्तार में ले जाना है," शालिनी ने कहा। "और साथ में खाता, जला पन्ना, सात अंगूठे और वो आठवाँ अंगूठा। और सबसे ज़रूरी — एक इंसान जो कहे कि यह मुहर उसने लगवाई।"
"कौन?"
शालिनी ने अपनी काली फाइल खोली और उसमें से एक पुरानी घड़ी निकाली — अपने पापा की घड़ी। उसने उसे हथेली में रखा।
"मेरे पापा ने इस घड़ी को उस दिन बंद किया था जिस दिन रणवीर ने उनका प्रेस लिया," उसने कहा। "और उसने मुझसे कहा था — बेटी, जो आदमी खाली काग़ज़ों पर अंगूठा लगवाए, वो कभी खुद अंगूठा नहीं लगाता। वो किसी और का अंगूठा लेता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मतलब?"
"मतलब, आज के इस सील के काग़ज़ पर भी उसका अंगूठा नहीं है," शालिनी ने कहा। "किसी और का है। और वो कोई ऐसा है जिसने डर के मारे अंगूठा लगाया। घंटी ने कल रात यही कहा था — डर से एक काग़ज़ पर अंगूठा लगेगा।"
मेरी जेब में घंटी अब भी बर्फ़ जैसी थी।
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