The Mysterious Bell – Chapter 1060
"वकील हूँ," शालिनी ने कहा। "दिखाइए।"
वो काग़ज़ उसके हाथ में आया। शालिनी ने एक पल देखा और फिर मुँह उठाकर बोली —
"इस काग़ज़ पर मरीज़ों की सूची नहीं लगी। सील के आदेश के साथ सूची अनिवार्य होती है — कौन मरीज़ अंदर है, किसकी साँस मशीन पर है, किसे कहाँ शिफ्ट किया जाएगा। यह काग़ज़ अधूरा है।"
"सूची कल आएगी," अफ़सर ने कहा।
"तो सील कल होगी।"
"आदेश आज का है।"
शालिनी ने काग़ज़ पलटा, और उसका चेहरा बदल गया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "इधर आ।"
मैं पास गया।
"यह देख।" उसने काग़ज़ के नीचे की तरफ़ उँगली रखी। "यह मुहर नगर निगम की नहीं है। यह नीली गोल मुहर है। यह भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है।"
मैंने देखा। नीली स्याही, गोल घेरा, बीच में वही निशान जो अब मुझे हर जगह दिखता था।
"और नीचे गवाह के दो खाने खाली हैं," शालिनी ने कहा। "बिना गवाह का सील आदेश काग़ज़ नहीं, कूड़ा है।"
अफ़सर ने काग़ज़ वापस खींचा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था, थकान थी — जैसे वो खुद जानता हो कि वो गलत काग़ज़ उठाकर आया है, पर लौटने का रास्ता बंद हो चुका है।
"आदेश ऊपर से आया है," उसने फिर वही बात दोहराई। "मुझे सिर्फ़ अमल करना है।"
डॉक्टर इसरानी सीढ़ी से उतरे। धीरे-धीरे, लाठी की नोक टक-टक करती हुई। वो अफ़सर के सामने आकर रुके।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं इस अस्पताल में साठ साल से हूँ। मैंने किसी ज़मीन के काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाया। मेरा नाम कहीं है, तो दिखाओ।"
अफ़सर ने बैग में हाथ डाला, फिर निकाल दिया। "आपका नाम नहीं है।"
"तो फिर मुझे अंदर जाने से क्यों रोका जा रहा है?"
"कोई अंदर नहीं जाएगा।"
डॉक्टर इसरानी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और उसकी आवाज़ धीमी, साफ़ थी। "मेरे मरीज़ अंदर हैं। मेरी नर्स अंदर है। और मेरी एक मरीज़ ऐसी है जिसकी साँस मशीन पर है। तुम काग़ज़ दिखाकर उसकी साँस नहीं रोक सकते।"
अफ़सर ने मुँह फेर लिया।
"मरीज़ों को बाहर निकालो," उसने अपने पीछे खड़े दोनों आदमियों से कहा। "गलियारे में शिफ्ट करो। जल्दी।"
फिर वो घूमा और सफ़ेद पट्टी वालों की तरफ़ इशारा किया।
और शुरू हो गया वो काम, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
पीले वार्ड का दरवाज़ा खुला। अंदर से दवा, सीलन और कार्बोलिक की गंध आई। दो वार्ड बॉय ने पहला बेड पकड़ा — वो बूढ़ी औरत जो पुरानी साड़ी में थी, जिसकी परची हाथ से नहीं छूटती थी। उसने बेड का किनारा पकड़ लिया।
"मेरी परची," वो बोली, "मेरी परची मत छीनो।"
काजल ने उसका हाथ पकड़ा। "नहीं छीनेंगे। नहीं छीनेंगे। चलिए, धीरे।"
दूसरा बेड — वो आदमी जिसके कंधे पर बच्चा सो रहा था। उठाते ही बच्चा जागा और रोने लगा। उसकी माँ ने उसे सीने से लगाया और भीड़ में देखने लगी, जैसे किसी को ढूँढ रही हो जो उसे बताए कि यह सब क्यों हो रहा है।
तीसरा बेड — सल्लू चाचा। साँस की दवा, ऑक्सीजन की नली, और चेहरे पर वो थकान जो बीमारी से ज़्यादा डर से आती है। शकील ने अपने अब्बा का हाथ पकड़ा और मेरी तरफ़ देखा।
मैंने सिर हिलाया — डरो मत, मैं हूँ।
और फिर चौथा बेड आया।
माँ।
वो बैठी थीं, पीठ में तकिया, हाथ में कटोरी। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, माथे पर चंदन का टीका — जैसे अस्पताल में नहीं, घर में बैठी हों। उन्होंने मुझे देखा और पहले कुछ नहीं कहा। बस आँख से इशारा किया — तू आ गया, अब ठीक है।
वार्ड बॉय ने उनका बेड पकड़ा।
"मैडम, उठिए।"
"कहाँ?"
"गलियारे में।"
माँ ने कटोरी रखी और धीरे से बोलीं, "क्यों?"
"आदेश है।"
"किसका?"
वार्ड बॉय ने जवाब नहीं दिया।
डॉक्टर इसरानी आगे आए। उन्होंने माँ की कलाई पकड़ी, नब्ज़ देखी, और फिर वार्ड बॉय की तरफ़ देखा।
"इन्हें नहीं हिलाएँगे।"
"सर, आदेश—"
"इनकी नली इसी बेड से जुड़ी है। इन्हें हिलाया तो साँस उखड़ जाएगी। मैं डॉक्टर हूँ, और आज मैं अपनी मरीज़ को हिलने नहीं दूँगा।"
अफ़सर आगे आया। "डॉक्टर साहब, वार्ड खाली होगा।"
"यह वार्ड खाली हो," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "पर यह औरत अपने बेड पर रहेगी।"
"नहीं रहेगी।"
"तो मेरे हाथ बाँधकर निकालो।"
भीड़ में से आवाज़ आई — "शर्म करो!"
अफ़सर ने पीछे देखा। गली के लोग गेट पर जमा थे। भोला भाई, हाथ में रेडियो का पुर्ज़ा पकड़े। किशनलाल काका, चने का लोटा हाथ में। नसीमा बाई, लोहे की बाल्टी लिए। उस्ताद अली बक्श, अपनी सिलाई की कुर्सी के सहारे। और सबसे आगे शबनम आपा, हाथ में लोहे की चिमटी।
"अफ़सर साहब," शबनम आपा ने कहा, आवाज़ गुमटी वाली, गली की सबसे तेज़ ज़ुबान, "इस गली में दो चीज़ें कभी बंद नहीं हुईं — एक मेरा चूल्हा, दूसरा ये अस्पताल का दरवाज़ा। आप काग़ज़ लाए हो, इंसान नहीं लाए। इंसान लाओ, फिर बात करेंगे।"
भीड़ हँसी नहीं, बस आगे आ गई। धीरे-धीरे, एक कदम, फिर एक कदम। कोई नारा नहीं, कोई शोर नहीं। सिर्फ़ खड़े हो जाना।
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई और पीछे से बोले, "शांति रखो। कोई धक्का नहीं। हम किसी से लड़ने नहीं आए। हम अपना दरवाज़ा बचाने आए हैं।"
उनकी नीली शर्ट, वो वर्दी जैसी शर्ट, और आवाज़ में वो चीज़ थी जो तीस साल की थानेदारी के बाद भी नहीं गई — भरोसा।
अफ़सर एक पल के लिए रुका। मैंने वो पल देखा। उस आदमी के हाथ में काग़ज़ था, पर आँखों में सवाल — क्या मैं सच में यह करने आया हूँ?
तभी पीछे से एक गाड़ी की खिड़की खिसकी। मैंने पलटकर देखा। सफ़ेद गाड़ी। उसमें से किसी ने हाथ निकाला, और वो हाथ — सफ़ेद कुर्ते की आस्तीन, उँगली पर कुछ काला — बस इशारा किया। इतना ही।
और अफ़सर की आँखों का सवाल मर गया।
"मरीज़ों को निकालो," उसने फिर कहा, इस बार आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी। "और जो बेड नहीं हिल सकता, उसका बेड यहीं छोड़ो — मरीज़ को नीचे उतारो।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"भैया," उसने कहा, "माँ को नीचे नहीं उतार सकते।"
"उतारो," माँ ने खुद कहा।
"माँ—"
"उतारो, काजल। ज़मीन पर बैठ जाऊँगी। इतनी सी बात है।"
काजल उनका हाथ पकड़कर बैठ गई और रोने लगी। माँ ने उसका सिर सहलाया।
"रो मत। रोने से साँस फूलती है। और मुझे आज साँस की ज़रूरत है।"
मैंने देखा — माँ के हाथ की नसें, पतली, नीली। छह महीने में वो कितनी पतली हो गई थीं, यह आज पहली बार दिखा। और मेरे पेट में कुछ ऐसा कसा कि मैं कुछ बोल नहीं पाया।
शालिनी मेरे पास आई। "अंकुश, यह काग़ज़ कमज़ोर है। मैं इसे अदालत में एक दिन में उड़ा दूँगी। पर आज वो सुनने को तैयार नहीं है। आज गवाह चाहिए — जो कहे कि इस काग़ज़ के पीछे कोई बैठा है।"
"गवाह कौन?"
उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "तेरी घंटी क्या कहती है?"
मैंने हाथ जेब में डाला।
बर्फ़।
बर्फ़ जैसी ठंडी। और जब मैंने उसे उँगली से छुआ, तो वो हिली, बिना आवाज़ के, जैसे कोई साँस रोककर रो रहा हो।
"कुछ नहीं कह रही," मैंने कहा।
"तो फिर आज काग़ज़ नहीं, आवाज़ चलाओ," शालिनी ने कहा।
और मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
मीरा दूर खड़ी थी, कैमरा हाथ में, बंद। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो हर बार पूछती है — चालू करूँ?
मैंने सिर हिलाया।
उसने कैमरा उठाया और उसकी लाल बत्ती जल गई।
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