The Mysterious Bell – Chapter 106
बेलू काका ने कॉपी मेज़ से… माफ़ कीजिए, चबूतरी से उठाई। खोली। उन्होंने उल्टे हाथ से, धीरे-धीरे पन्ने पलटे। हर पन्ने पर एक लाइन थी। हर महीने की तारीख़ पर एक ही लाइन। लौटाया।
मैंने पूछा, काका, ये क्या है।
बेलू काका धीरे बोले, मेरी तरफ़ से जवाब।
खेलू काका ने पूछा, किसका।
बेलू काका ने कहा, तेरे सिक्के का। जब तूने चौखट पर रखा, मैंने सोचा, भाई ने पैसे लौटाने की कोशिश की। मैंने सोचा, ये आधा है। आधा लौटाकर किसी ने क्या इज़्ज़त बचाई। मैंने सोचा, जब पूरा आएगा, तब बात करूँगा। फिर साल बीत गया। फिर तीस। और मैं हर महीने की पहली तारीख़ को ये कॉपी खोलता हूँ और लिखता हूँ — लौटाया। मैं कुछ लौटाया नहीं। बस लिखता हूँ। जैसे खुद को सज़ा दे रहा हूँ।
कुछ देर कुछ नहीं बोला गया।
फिर खेलू काका ने कहा, बेलू।
बेलू काका ने कहा, हूँ।
खेलू काका ने कहा, उस रात मेरे पास पैसे थे। जेब में थे। मैंने देने से पहले एक बार सोचा। और यही सोच मुझे तीस साल ले डूबा।
बेलू काका ने सिर झुका लिया।
उन्होंने कहा, और मैंने उस रात कह दिया था। तेरे पास बारह आने नहीं। मैंने कहा था। मैंने पैसे देने से पहले कहा था। मुझे लगा तू हँसी में उड़ा देगा। और तब मैं डर गया कि अगर मैं इतनी देर से पैसे दूँगा तो तू समझेगा कि मैंने तेरे बेटे की जान पर एहसान किया है। इसलिए मैंने पहले एक कड़वी बात कह दी, ताकि दोनों बराबर रहें।
खेलू काका की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, तूने मुझे तीस साल उधार दिया और मैंने तुझे तीस साल शक दिया।
बेलू काका ने कहा, और मैंने सोचा कि मेरे रहते तेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने सोचा, एहसान करने की इच्छा से मैंने कह दिया। इसके लिए मैं कभी माफ़ी नहीं माँगी, क्योंकि माफ़ी माँगने का मतलब होता कि मैंने सच में कहा था। और मुझे वो सच झेलना नहीं था।
अब अंकुश की बारी थी।
मैं आगे आया। मैंने सिक्का उठाया। दोनों के बीचों-बीच रखा।
मैंने कहा, अब यहाँ एक बात होगी। दोनों एक-एक बात बोलेंगे। सच्ची। माफ़ी नहीं, सिर्फ़ सच। माफ़ी अपनी जगह खुद आ जाएगी।
बेलू काका ने पहले कहा, मुझे इतना डर था कि मैंने पहली बार में ही उधार का ज़हर घोल दिया।
खेलू काका ने कहा, मुझे इतनी शर्म आई कि मैंने तेरा रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दिया।
फिर दोनों एक साथ बोले। एक ने कहा, मुझे माफ़ कर दे, दूसरे ने कहा, मैंने तेरे बेटे की जान बचाई थी, अब मेरा दिल बचा ले।
और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने पहले किसी में नहीं देखा।
बेलू काका झुके और उन्होंने खेलू काका के पैर के अंगूठे के पास वो टेढ़ी लकीर अपने हाथ से छुई। जैसे तीस साल पुराना ज़ख़्म पढ़ रहे हों। और खेलू काका ने अपना हाथ उनके सिर पर रख दिया।
दोनों रोए। बस दो मिनट।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी।
उतनी देर में गली में जितने लोग थे, सब रुक गए। चाय की गुमटी पर शबनम आपा की चिमटी रुक गई। स्कूल की छत से पतंग उड़ाने वाले बच्चे रुक गए। उस्ताद तुफ़ैल के कमरे से कुछ देर बाद हारमोनियम की पहली सुर निकली और रुक गई।
घंटी बोली, अड़तालीस।
मैंने फुसफुसाकर कहा, अड़तालीस किस चीज़ के।
घंटी बोली, तेरे हाथ में। अब भी गिनता है? मैंने उलझनों को जोड़ दिया, तेरे हाथ से नहीं, तेरे सब्र से। अड़तालीस।
मैंने पूछा, अब कुल कितने।
घंटी ने कहा, गिनती भूल जा। जिस दिन घर जुड़ेगा, उस दिन गिनेंगे। आज तू बस इतना सुन ले — पीपल के नीचे ये आख़िरी नहीं है।
मैंने कहा, क्या मतलब।
घंटी ने कहा, आज रात तेरे घर में जो है, वो पीपल के नीचे के किसी भी सच से बड़ा है।
और वो फिर ठंडी हो गई।
मैं हाथ जेब से बाहर निकाल ही रहा था कि दर्ज़ी की दुकान का दरवाज़ा खुला।
उस्ताद अली बक्श बाहर आए।
न चश्मा पहना हुआ, न पेंसिल कान पर। एक हाथ अलमारी के किवाड़ पर, जैसे अभी-अभी उठे हों और उन्हें सहारा चाहिए। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद थी। गली की सारी आवाज़ें आज अचानक कम हो गईं, जैसे घंटी के बजने के बाद गली खुद को चुप कर लेना चाहती हो।
उस्ताद ने एक बार चारों तरफ़ देखा। चबूतरी पर दोनों भाइयों को देखा। बच्चों को देखा। शबनम आपा को देखा। और फिर मुझे।
उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने कभी नहीं देखा था। गुस्सा नहीं। डर।
उन्होंने कहा, अंकुश।
मैंने कहा, उस्ताद, मैंने घंटी नहीं बजाई।
वो मेरी तरफ़ आए। धीरे। उनके हाथ मेरे कंधे पर पड़े और उन्होंने मुझे चबूतरी से दूर, दर्ज़ी की दुकान के कोने में खींच लिया। मेरे पीछे सानिया और चिंटू भागने लगे, पर शबनम आपा ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
उस्ताद ने कहा, मैंने तुझसे कहा था नहीं बजाना। तूने बजा दी।
मैंने कहा, उस्ताद, खुद बजी। मैंने जेब में हाथ डाला भी नहीं।
वो एक पल मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उनका हाथ मेरे कंधे से हटा।
उन्होंने धीमे से कहा, खुद बजी। यानी घंटी ने खुद को सुना दिया।
मैंने कहा, क्या गलती की मैंने।
उन्होंने कहा, आज तक ऐसा नहीं हुआ था।
उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा और एक लंबी साँस ली।
उन्होंने कहा, घंटी दो हाथों की मिरासी है। ये मैंने तुझे कल शाम कहा था। पर एक बात कहना भूल गया। मिरासी सिर्फ़ चीज़ नहीं होती। मिरासी एक दस्तूर होती है। और दस्तूर कहता है कि जब घंटी खुद बजे, तो उसका मतलब है कि अब उसे दिखना पड़ेगा। छुपी घंटी से बजी घंटी बड़ी होती है।
मैंने कहा, तो अब।
उन्होंने कहा, अब मेरी एक ही सलाह है। अभी किसी सभा में मत जा। अभी बाज़ार में इसे लेकर मत खड़ा हो जा। अभी बस घर जा। क्योंकि जो घंटी खुद बजी है, वो बाहर की सभा के लिए नहीं, घर के सन्नाटे के लिए बजी है।
मैंने कहा, उस्ताद, मीरा आठ बजे आ रही है। मेरे घर।
वो हँसे। एक छोटी सी हँसी।
उन्होंने कहा, तो मीरा को भी बैठा लेना उसी बातचीत में।
मैंने कहा, वो मुझ पर इल्ज़ाम लगाएगी। वो कहेगी कि मैं लोगों को बेवकूफ़ बना रहा हूँ।
उन्होंने कहा, अंकुश, अगर तेरे पास सच है, तो बेवकूफ़ वही बनेगा जो इल्ज़ाम लगाता है। तेरे काम को नहीं, तेरे सच को सामने रखना। और जब वो तेरे बाबा के अंगूठे के काग़ज़ की बात करे, तो उसे वो काग़ज़ देखने को कह।
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
मैंने कहा, उस्ताद, आपका नाम उस काग़ज़ पर गवाह की जगह है।
उन्होंने कहा, मुझे पता है।
मैंने कहा, और आपने कहा था कि पचास साल पहले जो आपने छोड़ा था वो यही घंटी थी।
उन्होंने कहा, हाँ।
मैंने कहा, आपने घंटी क्यों छोड़ी।
कुछ देर वो चुप रहे।
तभी गली के मुहाने से एक सफ़ेद गाड़ी की रोशनी आई। बड़ी, चमकदार। गाड़ी धीमी हुई, थोड़ी रुकी, तब किसी ने अंदर से खिड़की उतारी और बाहर झाँका। मैंने सिर्फ़ एक हाथ देखा। सफ़ेद कुर्ते की आस्तीन और हाथ में एक काग़ज़, जिसे वो रोशनी में देख रहे थे। फिर खिड़की चढ़ी, गाड़ी आगे बढ़ गई, और गली में धूल का एक बादल पीछे छोड़ गई।
उस्ताद ने उस गाड़ी को देखा। उनका जबड़ा कसा।
उन्होंने कहा, अंकुश, अंदर चल।
हम दुकान के पीछे वाले कमरे में गए। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया। एक पुराना बल्ब जल रहा था, उसकी लाइट फीकी थी और मकड़ी के जाले उसके कोने को जोड़कर दीवार तक गए थे। मेज़ पर कपड़े की गोलियाँ रखी थीं।
उन्होंने ट्रंक की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
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