The Mysterious Bell105 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 105

7 min read November 5, 2026

सानिया ने कॉपी खोली। उसने पन्ना पलटा और अपनी उँगली एक लाइन पर रख दी।

उसने कहा, उस्ताद, मैं रोज़ देखती हूँ। खेलू काका रोज़ शाम आते हैं और जेब से एक काग़ज़ की पुड़िया निकालते हैं। छोटी सी। पीली, मैली। उसे खोलते नहीं। बस देखते हैं, फिर वापस जेब में डाल देते हैं।

गुड्डू बोला, और बेलू काका रोज़ एक कॉपी निकालते हैं। मैंने एक दिन पीछे से झाँका था। हर महीने की एक तारीख़ पर वो एक लाइन लिखते हैं।

रफ़ीक़ ने कहा, मैंने एक बार ध्यान से देखा था, वो लिखते हैं, लौटाया — और फिर उँगली दबाकर कुछ लिखते हैं जो पढ़ा नहीं जाता। पर हर महीने वही लिखते हैं।

मेरे हाथ में चाय ठंडी होने लगी थी।

मैंने कहा, सानिया, तेरी कॉपी में ये सब लिखा है?

उसने कहा, हाँ। छह ट्रक पीछे। और ये दो काका। दोनों अलग पन्ने पर।

चिंटू ने अचानक कहा, उस्ताद, और एक बात है। खेलू काका के पैर में तीस साल पुराना निशान है। मुझे मालूम है क्योंकि स्नान के दिन मैंने देखा था, पैर के अंगूठे के पास एक टेढ़ी लकीर है।

शबनम आपा ने चिंटू को घूरा।

चिंटू ने कहा, क्या हुआ? मैंने देखा था तो बताया।

शबनम आपा ने धीरे से कहा, बेटा, बात पैर के निशान से नहीं, दिल के ज़ख़्म से चलती है।

मैंने गिलास रख दिया। चाय छोड़कर उठा।

शबनम आपा ने पीछे से कहा, अंकुश।

मैं रुका।

उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, तू अभी चार बुज़ुर्गों की सुलह कर आया है। पाँच। और अब छठी करने जा रहा है। पर सुन। बाहर के सच खोलकर तू अपने घर का भाव मत चुका दे।

मैंने कहा, आपा, मुझे घर जाना है। पापा से बात करनी है।

उन्होंने कहा, तो जा। पर पहले इन दोनों को निपटा। क्योंकि जब तू पीपल के नीचे से गुज़रता है और इन दोनों को इस तरह बैठा छोड़ जाता है, तो पीपल तेरी तरफ़ देखता है। और मुझे नहीं पसंद कि पीपल किसी लड़के की तरफ़ शिकायत से देखे।

बच्चे एक साथ उठ खड़े हुए।

सानिया ने कहा, हम चलते हैं।

मैंने कहा, क्यों?

उसने कहा, क्योंकि इस बार हमारा काम है। अब तक हम सिर्फ़ खबर लाते रहे हैं। आज हम अंदर जाएँगे।

चिंटू ने कहा, मैं खेलू काका के पास जाऊँगा।

गुड्डू ने कहा, फिर मैं बेलू काका के पास।

रफ़ीक़ ने कहा, और मैं दोनों के बीच खड़ा रहूँगा, ताकि कोई उठकर भाग न जाए।

मैं हँस पड़ा। पहली बार दिन भर में। फिर मैंने कहा, ठीक है। फिर तीन तरफ़ से होकर आते हैं।

हम चारों दिशाओं से पीपल की तरफ़ बढ़े।

पहले खेलू के पास पहुँचा, तो मैं अकेला था।

करीब जाकर मैंने देखा कि उनकी आँखें बंद नहीं थीं। वो दूर बैलगाड़ी के पहियों को देख रहे थे, जो गली के मुहाने पर खड़ी थी।

मैंने कहा, खेलू काका।

वो मेरी तरफ़ नहीं मुड़े। बस बोले, क्या है बेटा। मैं इनकी तरफ़ देख रहा था। मेरी गाड़ी है। मैं तीस साल से इनकी तरफ़ देखता हूँ और ये आज तक मेरी तरफ़ नहीं देखा।

मैं उनके बगल में बैठ गया। पत्थर ठंडा था।

मैंने कहा, काका, मैं वो काग़ज़ की पुड़िया देख सकता हूँ?

उनका हाथ एक बार जेब पर गया, फिर रुका। फिर वो धीरे से निकाला।

पुड़िया सच में पीली और मैली थी। इतनी मैली कि उसके तह कहाँ खत्म होते थे, समझना मुश्किल था। उन्होंने उसे मेरी हथेली पर रख दिया।

मैंने खोला।

अंदर एक ही चीज़ थी। एक पुराना सिक्का। उस पर गंदगी जमी थी और बीच से घिस गया था, जैसे किसी ने उसे हज़ार बार अंगूठे से रगड़ा हो।

मैंने कहा, यह क्या है।

खेलू काका ने कहा, उधार। ये रिश्ते का उधार है। तीस साल से मैं रोज़ इसे लेकर आता हूँ। रोज़ सोचता हूँ, आज लौटा दूँगा। रोज़ ये काग़ज़ मेरी जेब से नीचे आता है, और रोज़ बेलू के पास जाने की हिम्मत नहीं होती।

मैंने कहा, बात क्या थी, काका। सच बोलिए। मुझे नहीं चाहिए कोई तमाशा। मुझे बस यह चाहिए कि जब मैं पीपल के नीचे से गुज़रूँ, तो मुझे शिकायत वाली पीठ न दिखे।

खेलू काका चुप रहे। बहुत देर।

फिर बोले, तीस साल पहले मेला था। बड़े तालाब पर। रात। झूले पर मेरा बेटा घायल हो गया। सिर फूट गया, खून बह रहा था। मैं गोद में लेकर भागा। डॉक्टर ने कहा, पैसे पहले, औरत ने कहा, चार बीस रुपये।

मेरे पास पैसे थे। जेब में थे।

उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।

मैंने कहा, तो आपने क्यों नहीं दिए।

मैंने इसलिए नहीं दिए क्योंकि उस वक़्त मेरे पास भी वही पैसे थे जो मेरे बेटे की जान थे। और मुझे लगा, अगर मैं इसे दे दूँगा, तो बचेगा क्या हाथ में? जब ज़िंदगी में सब कुछ जाता रहा हो, तो आदमी आख़िरी चीज़ पर बैठ जाता है। मैं बैठ गया।

तो फिर बेलू ने दिए?

उन्होंने कहा, बेलू ने दिए। पर उसने पैसे गिनते हुए कहा — तेरे पास तो बारह आने भी नहीं। ये ले। और याद रखने, ये उधार है।

खेलू काका ने सिक्का मुट्ठी में बंद कर लिया।

मैंने कहा, और उस एक लाइन से तीस साल बर्बाद हो गए।

उन्होंने कहा, वो लाइन से नहीं हुआ। मेरी उस चुप्पी से हुआ। उस रात मेरे बेटे का सिर सिल रहा था और मैं बाहर खड़ा यह सोच रहा था कि भाई ने बारह आने कहकर मेरी बेच दी। मुझे शर्म आई। शर्म से गुस्सा बनता है, बेटा। और गुस्से से चुप्पी।

मैंने कहा, और ये सिक्का?

उसने कहा, अगले दिन मैंने बेलू के दरवाज़े पर ये सिक्का रख दिया। आधा हिस्सा। सोचा, बाक़ी भी दूँगा, पूरा हिसाब करूँगा। पर अगली सुबह वो लौटकर यही सिक्का मेरी चौखट पर रख गया। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा। बस सिक्का दरवाज़ों के बीच घूमता रहा। फिर मैंने इसे जेब में रख लिया। तीस साल से लौटाने निकलता हूँ, और वो सिक्का जेब में ही रह जाता है।

मैं उठ खड़ा हुआ।

वो बोले, कहाँ जा रहे हो?

मैंने कहा, आपसे एक वादा चाहिए।

कैसा वादा?

अब आप उस सिरे पर बेलू काका के सामने बैठिए और सच बोलिए। पूरा सच। सिक्के की कहानी।

उन्होंने कहा, तीस साल बाद मैं उसके सामने क्या कहूँगा ये छोटा लड़का?

मैंने कहा, यही छोटा लड़का आपसे कह रहा है — कुछ छोटा ही कहिए। बड़ा बोलने की ज़िम्मेदारी मेरी है।

वो हँसे। तीस साल में पहली बार, मुझे पता नहीं, पर मुझे लगा वो हँसे।

वो उठे और मेरे साथ चले।

दूसरी तरफ़ गुड्डू बेलू काका के साथ खड़ा था। बेलू काका के हाथ में एक मोटी कॉपी थी, जिसका रंग अब पीला पड़ गया था। रफ़ीक़ बिल्कुल बीच में ज़मीन पर बैठा पत्थर से खेल रहा था, और सानिया चबूतरी के किनारे पर बैठी कॉपी खोल के बीच फँसे पन्ने देख रही थी। चिंटू गुमटी की तरफ़ भाग गया था। पाँच मिनट बाद वो लौटा, हाथ में एक कटोरी में गरम समोसे और शबनम आपा की एक पुरानी चादर।

शबनम आपा बाहर खड़ी थीं। उन्होंने तौलिया कमर में खोंसा हुआ था और हाथ में चिमटी थी।

खेलू काका चबूतरी के दूसरे सिरे पर पहुँचे। बेलू काका ने सिर उठाया।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा। तीस साल में पहली बार, आँखों में। और चबूतरी पर जो सन्नाटा फैला, वो शोर से बड़ा था।

बेलू काका ने पहले कहा, बैठ।

खेलू काका बैठ गए।

मैं बीच में नहीं बैठा। मैं पीछे खड़ा रहा, पीपल के तने से पीठ टिकाकर। सानिया मेरे पास आई। शबनम आपा ने चादर सिर पर रख ली और आँगन में से जाती हुई औरतों की तरह खड़ी रहीं।

खेलू काका ने पुड़िया उनकी तरफ़ सरका दी। काग़ज़ फटा हुआ था। सिक्का उसके अंदर से बाहर गिरा और चबूतरी पर खनका।

बेलू काका ने उसे देखा।

उन्होंने कहा, ये तो… ये तो मैं… ये मैं तेरी चौखट पर रख आया था।

खेलू काका ने कहा, और मैंने जेब में रख लिया। तीस साल के लिए।

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