The Mysterious Bell104 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 104

7 min read November 5, 2026

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। वो गुस्से में थी। उसकी आवाज़ तेज़ थी। दोनों बुज़ुर्ग चौंककर देखने लगे।

"मीरा, शांत हो।"

"मैं शांत हूँ!" वो चिल्लाई। "मैं तुमसे सवाल पूछ रही हूँ। तुमने मुझे कल रात बुलाया था। याद है? तुमने कहा था कि मुझे पूरा सच बताओगे। तो बताओ। यह क्या है? यह घंटी क्या है? और तुम लोगों को क्यों जोड़ रहे हो? किसके लिए? ट्रस्ट के लिए? भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के लिए? या अपने पापा के अंगूठे को छिपाने के लिए?"

पीछे खड़े दोनों लड़कों ने काग़ज़ ऊपर किए। एक बोला, "ये दुकान के काग़ज़ हैं। ट्रस्ट के नाम पर। हस्ताक्षर उस्ताद अली बक्श के।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारी दुकान किसी ट्रस्ट की है। वही ट्रस्ट जो भारद्वाज से जुड़ा है। तुम्हारे पापा ने अंगूठा लगाया था। और तुम आज बुज़ुर्गों को जोड़कर सबको यह दिखा रहे हो कि तुम अच्छे हो।"

मैं चुप था। घंटी ठंडी थी।

"मैं तुम्हें रोक नहीं रही," उसने कहा। "पर जब तक तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं देते, तुम्हारा यह सब नाटक है। और मैं इसे शहर भर में दिखाऊँगी।"

वो मुड़ी और चली गई। दोनों लड़के उसके पीछे चले। बुज़ुर्ग अभी भी हाथ पकड़े हुए थे, हैरान।

मैं वहीं खड़ा रहा। जेब में घंटी ठंडी थी।

शाम को मैं अपनी दुकान में बैठा था, दीवार को देख रहा था। घंटी मेज़ पर रखी थी। सुबह से ठंडी थी। मैंने उससे अंकों के बारे में पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। मैंने मीरा के बारे में पूछा। उसने जवाब नहीं दिया।

तभी उस्ताद अली बक्श अंदर आए। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया नहीं। बस धकेला और अंदर आ गए। हाथ में चश्मा था।

"उस्ताद?" मैं उठ खड़ा हुआ।

"बैठ," उन्होंने कहा। वो स्टूल पर बैठ गए। "मुझे पता है मीरा ने क्या किया। उसके लड़के मेरे पास भी आए थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि ये दुकान किसकी है।"

"और आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा कि ये दुकान उस आदमी की है जो इसे चलाता है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, वो काग़ज़ सच है। ट्रस्ट सच है। पर वो ट्रस्ट भारद्वाज का नहीं। वो ट्रस्ट उस आदमी का है जिसने ये घंटी बनाई थी। और वो आदमी तेरा दादा नहीं था।"

मैं उन्हें देखता रह गया।

"ये घंटी," उन्होंने मेज़ से उठाई। "ये किसी की मिरासी है। और मिरासी का मतलब विरासत। पर हर विरासत खुशी की नहीं होती। कुछ विरासतें ज़िम्मेदारी की होती हैं। और जो ज़िम्मेदारी की हो, उसका हिसाब भारी होता है।"

उन्होंने घंटी वापस रखी। "मैंने तुझे पहले भी चेताया था। इसे बाज़ार में मत दिखा। इसे सभा में मत बजा। ये दो हाथों की चीज़ है। जब तक दोनों हाथ न हों, ये अधूरी है।"

"दूसरा हाथ कौन है?"

"मैंने कहा था, अभी नहीं।" वो उठे। "पर एक बात सुन। मीरा के सवालों का जवाब देने से पहले तू अपने घर के सवालों का जवाब दे। जा घर। आज रात। घंटी को हाथ में ले। और पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"

"उस्ताद—"

"और अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर तूने आज रात नहीं पूछा, तो कल सुबह मैं तुझे यह घंटी वापस करने आऊँगा। और फिर तू इसे कभी नहीं बजा पाएगा।"

वो बाहर चले गए। दरवाज़ा बंद हो गया। मेज़ पर घंटी ठंडी थी। पर जैसे ही मैंने उसे उठाया, वो अचानक गर्म हो गई। इतनी गर्म कि मैंने लगभग गिरा दी।

फिर वो बोली। "अब पूछ।"

मैंने गला साफ़ किया। "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"

घंटी चुप रही। फिर बोली, "क्योंकि तेरे घर का सबसे बड़ा सच तू है।"

और फिर वो ठंडी हो गई।

मैं वहीं बैठा रहा, घंटी हाथ में, और पहली बार मुझे डर लगा कि मैं क्या पाऊँगा।

बाहर गली में शाम की आवाज़ें आ रही थीं। शबनम आपा की गुमटी से चाय की खुशबू। बच्चों की हँसी। पीपल के पत्तों की सरसराहट। पर मेरे अंदर सन्नाटा था। वो सन्नाटा जो तब होता है जब आपको पता हो कि अब कुछ ऐसा खुलेगा जो आपने खुद से भी छिपाया है।

मैंने घंटी जेब में रखी और उठा। घर जाना था। पापा से बात करनी थी। माँ से। काजल से। और मीरा को जवाब देना था।

पर सबसे पहले — मुझे खुद से पूछना था कि मेरे घर का सबसे बड़ा सच क्या है। और क्या वो सच मैं हूँ?

मैंने दुकान का दरवाज़ा बंद किया। पीछे वाले कमरे से गुनगुनाता बल्ब बंद कर दिया। और गली में कदम बढ़ा दिए।

पीपल के नीपीपल के नीचे पहुँचा तो शाम ठीक अपनी जगह पर थी। पत्तों के बीच से आख़िरी धूप छनकर चबूतरी पर गिर रही थी, जैसे किसी ने पीले काग़ज़ के टुकड़े फाड़कर बिखेर दिए हों। चाय की भाप गुमटी से उठकर हवा में घुल रही थी और दूर कहीं स्कूल की छत से किसी बच्चे की पतंग की डोर कट गई थी, जिस पर चार-पाँच आवाज़ें एक साथ चिल्लाईं।

मैंने कदम धीमे कर दिए।

चबूतरी पर आज कोई नहीं था। न बंसी बाबा, न रहमत बाबा, न कलीम बाबा। बस दो आदमी थे। एक सिरे पर एक, दूसरे सिरे पर दूसरा। दोनों की पीठ एक-दूसरे की तरफ़। बीच में पत्थर का इतना हिस्सा ख़ाली कि उस पर चार लोग बैठ सकें।

मैं रुक गया।

ये दोनों मुझे रोज़ दिखते थे। हर शाम। इतने सालों से। और मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये दोनों कौन हैं और पीठ करके क्यों बैठे हैं।

एक के हाथ में लाठी थी और सिर पर सफ़ेद टोपी। चेहरा चौड़ा, मूँछें सफ़ेद, आँखें ऐसी जैसे बहुत दूर कुछ देख रही हों। वो अपने अंगूठे से लाठी की नोक पर गोल-गोल घेरे बना रहे थे। चुप। बिल्कुल चुप।

दूसरे का कद छोटा था, कमर झुकी हुई, और एक हाथ हमेशा जेब पर। जैसे अंदर कोई चीज़ रखी हो और वो उसे भूलना चाहते हों पर उनका हाथ भूलता न हो।

मैंने सोचा, क्यों नहीं जानता मैं इन्हें? मेरी गली है। मेरा पीपल है। और मैं इन दोनों के नाम भी नहीं जानता।

मैं मुड़ा और गुमटी की तरफ़ चल दिया।

शबनम आपा गुमटी के अंदर थीं। चिमटी से समोसे उलट रही थीं और कड़ाही से आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी बड़बड़ा रहा हो। सामने बेंच पर बच्चों की टोली बैठी थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथ में एक-एक कटोरी और बीच में एक ही प्लेट में समोसे रखे थे, जिस पर चारों की नज़र बराबर बँटी हुई थी।

सानिया के हाथ में अपनी लाल कवर वाली कॉपी थी। वो कॉपी उसने आज छुपाई नहीं थी, खुली रखी थी, जैसे किसी को दिखाना चाहती हो।

मैंने गुमटी की सीढ़ी पर पैर रखा तो चारों ने एक साथ सिर उठाया।

चिंटू बोला, उस्ताद, आपकी जेब में फिर बजा?

मैंने कहा, नहीं।

उसने कहा, झूठ बोल रहे हो। मैंने सुना था।

सानिया ने उसकी कटोरी खींच ली और कहा, चुप कर और खा।

मैं बैठ गया। शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखे बिना एक गिलास चाय मेरी तरफ़ सरका दी, जैसे उन्हें पहले से पता था कि मैं आऊँगा और क्या पीऊँगा।

मैंने कहा, आपा, चबूतरी पर दो लोग बैठे हैं। एक सिरे पर एक, दूसरे सिरे पर दूसरा। पीठ करके। कौन हैं?

शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही के किनारे रखी। एक लंबी साँस ली। और बोलीं, तू आज तक उन्हें जानता नहीं?

मैंने कहा, नहीं।

उन्होंने कहा, तो सुन। एक खेलू है, एक बेलू। दोनों सगे भाई। दोनों के खेत पीछे हैं, दोनों की बैलगाड़ियाँ गली से रोज़ गुज़रती हैं। और दोनों ने तीस साल से एक-दूसरे से बात नहीं की।

तीस साल।

मैंने गिलास पकड़े हुए पूछा, क्यों?

शबनम आपा ने कटोरी उठाई, उसमें गली के लोगों के छोड़े पैसे खनके। उन्होंने उसे वापस रखा और बोलीं, ये मैं नहीं बताऊँगी। कोई भी नहीं बताएगा। तीस साल से न कोई पूछता है, न कोई बोलता है। गली इतनी आदत डाल चुकी है कि उसे लगता है ये ऐसे ही होना चाहिए।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho