The Mysterious Bell – Chapter 103
मैं ठिठक गया।
"मैंने तुझे आज सुबह पूछा था। तेरा घर इतना चुप क्यों है। तूने टाल दिया।"
"उस्ताद—"
"अब टाल मत। जा घर। आज रात। बैठकर। पापा के सामने, माँ के सामने, काजल के सामने, घंटी को हाथ में लेकर पूछ। और सुन। पूरा सुन। तंत्र से पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
"पूछूँगा," मैंने कहा। "पर आप भी तो कुछ छिपा रहे हैं। आपने घंटी के बारे में सब नहीं बताया। आपके भाई इलियास की बात भी आपने अधूरी छोड़ी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर वो मुस्कुराए। "अब सही सवाल पूछा। पर आज नहीं। आज तेरे घर का नंबर है। मेरा नंबर बाद में आएगा। जब तेरा घर जुड़ेगा, तब मेरा घर टूटकर सामने आएगा। यही तंत्र का तरीक़ा है। एक-एक करके।"
उन्होंने चश्मा फिर पहन लिया। "जा। देर मत कर। आज रात का सच अगर कल सुबह तक नहीं खुला, तो कुछ ऐसा टूटेगा जो फिर शायद न जुड़े।"
मैं उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े पर पहुँचा, तो उस्ताद ने फिर कहा, "अंकुश।"
मुड़ा।
"जब पूछे, तो हिम्मत रखना। क्योंकि तेरे घर का तीसरा सच," उन्होंने कहा, "शायद तू खुद हो।"
मैं घर की तरफ़ चला। पीछे सिलाई मशीन की आवाज़ आई। एक बार। फिर बंद हो गई।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मैंने हाथ जेब से बाहर निकाल लिया।
रात मैंने सोचा कि घंटी से पूछूँगा, पर पूछ नहीं पाया। पापा चुप थे, माँ हिसाब की कॉपी में उलझी थीं, काजल अपनी किताब लेकर बैठी थी। मैंने रोटी खाई और सो गया।
सुबह उठा तो गली में चहल-पहल थी। बच्चे पीपल के नीचे जमा थे। शबनम आपा की गुमटी पर चाय की भाप उठ रही थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू बेंच पर बैठे थे, पैर हिला रहे थे।
चिंटू ने मुझे देखा और चिल्लाया, "अंकुश भैया! आपा की चाय पीओ। आज हमारी तरफ़ से।"
"क्या बात है?" मैंने पूछा। "लॉटरी लगी?"
"नहीं," सानिया ने आँखें घुमाईं। "पर आज हमें एक नई खबर मिली है।"
उसने अपनी लाल कवर कॉपी निकाली। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग हैं। एक बाबा शरीफ़, एक लाला बसंतलाल। पचास साल से नहीं बोले।"
"पचास साल?" मैं बेंच पर बैठ गया।
"हाँ," गुड्डू बोला। "मैंने सुना है कि पहले दोनों एक ही दुकान चलाते थे। कबाड़ की। फिर कुछ चोरी हो गई। दोनों ने एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाया। फिर लड़ाई। फिर बस।"
"क्या चोरी हुई थी?"
"पता नहीं," रफ़ीक़ ने कहा। "कोई कहता है पीतल का घड़ा, कोई कहता है सोने की चेन।"
"क्या बकवास है," मैंने कहा। "चोरी तो किसी ने की होगी।"
"पर वो आज तक पता नहीं चला," सानिया ने कहा। "और अब दोनों बूढ़े हो गए हैं। एक पीपल के इस तरफ़ बैठता है, दूसरा उस तरफ़। एक-दूसरे को देखते भी नहीं।"
मैंने पीपल के पेड़ की तरफ़ देखा। दो बुज़ुर्ग बैठे थे। एक के पास सफ़ेद कुर्ता और टोपी थी। दूसरे के पास पीली धोती और गमछा। दोनों में फासला था। सुबह की धूप उन पर पड़ रही थी।
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
"हम भी आएँ?" चिंटू ने पूछा।
"तुम लोग यहाँ रहो," शबनम आपा ने कहा। "अंकुश, तू जा। पर ध्यान से। ये दोनों बुज़ुर्ग हैं। इनकी बेज़ुबान दुश्मनी है। जुबान से नहीं, चुप्पी से। और चुप्पी वाली दुश्मनी सबसे मुश्किल होती है।"
मैंने सिर हिलाया और पीपल की तरफ़ बढ़ा। मैंने दोनों के बीच में बैठने की कोशिश की। नबी चाचा और श्यामलाल काका वाली जगह से थोड़ा दूर। सफ़ेद कुर्ते वाले बाबा शरीफ़ ने मेरी तरफ़ देखा। दूसरे लाला बसंतलाल ने ज़मीन पर नज़रें जमा रखी थीं।
"बाबा," मैंने कहा। "मैं अंकुश हूँ। साइकिल वाला।"
"जानता हूँ," बाबा शरीफ़ ने कहा। "तू वही है जो बुज़ुर्गों को जोड़ रहा है।"
"आज आप दोनों को जोड़ने आया हूँ।"
लाला बसंतलाल ने सिर उठाया। उनकी आँखें धुँधली थीं। "हमें मत जोड़। हम जुड़ चुके हैं। ज़मीन से। हम दोनों यहीं रहेंगे। पर एक-दूसरे से नहीं बोलेंगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो मेरा दुश्मन है," उन्होंने कहा।
"दुश्मन?" मैंने कहा। "आपने उसका क्या बिगाड़ा?"
"उसने मेरा पीतल का घड़ा चुराया।"
"नहीं!" बाबा शरीफ़ अचानक गुस्से में बोले। "तूने मेरी चेन चुराई।"
"चेन तो मैंने कभी देखी ही नहीं!"
"तू झूठ बोल रहा है!"
"तू बूढ़ा हो गया है, दिमाग़ खराब है!"
"चुप!" मैंने कहा। दोनों चुप हो गए। मैंने गहरी साँस ली। "बाबा, लाला, सुनो। मैं आपकी चोरी के बारे में नहीं जानता। पर मैं एक बात जानता हूँ। पचास साल हो गए। आप दोनों ने एक-दूसरे से एक शब्द नहीं बोला। क्या आपने कभी सोचा कि अगर चोरी किसी और ने की हो?"
दोनों मेरी तरफ़ देखने लगे।
"किसी तीसरे ने," मैंने कहा। "किसी ऐसे ने जिसे आप दोनों जानते भी न हों।"
बाबा शरीफ़ हिल गए। लाला बसंतलाल ने फिर ज़मीन देखी।
"मैं आपसे एक सच्ची बात कहने को कह रहा हूँ," मैंने कहा। "एक-दूसरे से। चाहे वो कितनी भी छोटी हो। चाहे वो कितनी भी शर्मनाक हो। बस सच।"
वो दोनों चुप रहे। बहुत देर तक। फिर बाबा शरीफ़ बोले। उनकी आवाज़ रूखी थी। "मैंने…" वो रुके। "मैंने उस रात तुझे चोरी करते नहीं देखा था।"
लाला बसंतलाल ने उनकी तरफ़ देखा। "क्या?"
"मैंने तुझे नहीं देखा था," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने बस मान लिया था। क्योंकि उस रात तू दुकान के पास था।"
"तो तूने मुझ पर इल्ज़ाम क्यों लगाया?"
"क्योंकि सबने कहा कि तूने किया। और मैंने सोचा कि अगर मैं तेरा बचाव करूँ, तो लोग मुझे भी चोर समझेंगे।"
लाला बसंतलाल की आँखें भर आईं। "और मैंने सोचा कि तूने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया, तो मैं क्यों तेरी परवाह करूँ। मैंने भी तेरे बारे में ऐसी बातें फैलाईं।"
"पर मैंने कभी नहीं कहा कि तूने चुराया," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने बस यह कहा कि तू दुकान के पास था।"
"और मैंने सोचा कि इसका मतलब वही है।"
अब दोनों रो रहे थे। चुपचाप। सुबह की धूप उनके चेहरों पर थी।
"मैं माफ़ी माँगता हूँ," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने तुझे इल्ज़ाम दिया। बिना सोचे।"
"मैं भी," लाला बसंतलाल ने कहा। "मैंने तेरे बारे में बुरा बोला। और फिर पचास साल तक तेरे साथ बैठा, तेरे बिना।"
उन्होंने एक-दूसरे को देखा। बाबा शरीफ़ ने हाथ बढ़ाया। लाला बसंतलाल ने उसे थाम लिया।
मेरी जेब गर्म हुई। मुझे पता था कि घंटी बजने वाली है। पर वो ज़ोर से नहीं बजी। बस काँपी। मैंने महसूस किया। ऊर्जा। जुड़ाव।
घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीमी। "पैंतालीस अंक।"
मैं मुस्कुराया। दोनों बुज़ुर्ग अभी भी हाथ पकड़े हुए थे। उन्होंने ध्यान नहीं दिया।
तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई। "तो यही तुम्हारा तमाशा है?"
मैं मुड़ा। मीरा खड़ी थी। कंधे पर कैमरा था, पर लेंस कवर लगा था। वो गुस्से में लग रही थी। उसके साथ दो अनजान लड़के थे जिनके हाथ में काग़ज़ थे।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम यहाँ?"
"मैं कल रात आठ बजे तुम्हारे घर आई थी," उसने कहा। "तुम नहीं थे। तुम्हारे पापा ने कहा कि तुम किसी काम से बाहर हो। और आज सुबह मुझे पता चला कि तुम यहाँ हो, बुज़ुर्गों को नचा रहे हो।"
"मैं नचा नहीं रहा।"
"नहीं?" वो आगे आई। "तुमने इन दोनों को रुला दिया। ये पचास साल से नहीं बोले। तुमने इन्हें एक घंटे में रुला दिया। और तुम्हें लगता है ये असली है?"
"मीरा, ये असली है।"
"असली?" वो हँसी। "तुम्हारे पास क्या है? एक पुरानी घंटी। जो तुम्हारी जेब में बजती है। और तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाते हो कि यह जादू है।"
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