The Mysterious Bell – Chapter 102
"मैंने कुछ नहीं किया, चाचा," मैंने कहा। "आपने एक-दूसरे को देखा। बस।"
"पचास साल बाद," श्यामलाल काका ने कहा। "पचास साल हम एक ही गली में रहे, एक ही पीपल की छाया में बैठे, और एक-दूसरे से दो शब्द नहीं बोले।"
"क्यों?" सानिया ने पूछा। बच्चों में यही बात थी — जो बड़े नहीं पूछते, वो पूछ लेते थे।
नबी चाचा ने उसकी तरफ़ देखा, जैसे पहली बार देखा हो। फिर बोले, "क्योंकि हम दोनों ने एक बात मान ली थी जो सच नहीं थी।"
"कौन सी बात?"
"ये कि हम एक-दूसरे के दुश्मन हैं," श्यामलाल काका ने कहा। "और जब आदमी किसी बात को पचास साल तक मान ले, तो वो सच हो जाती है। भले ही वो झूठ हो।"
शबनम आपा ने गहरी साँस ली और चिमटी को स्टैंड पर रख दिया। "अब मेरी बात सुनो," उसने कहा। "तुम दोनों यहीं बैठो। मैं चाय लाती हूँ। और अंकुश, तू भी बैठ। तेरी जेब में जो बज रहा है, वो बाद में। पहले चाय।"
"आपा, मुझे—"
"बैठ," उसने कहा। वो शब्द इतने सीधे थे कि मैं बैठ गया।
वो गुमटी के अंदर गई और मैंने देखा कि उसके हाथ थोड़े काँप रहे थे। उसने कटोरी से चाय के पत्ते निकाले, चीनी डाली, और फिर एक पल के लिए रुकी। उसकी आँखें कहीं और थीं। मैंने सोचा, क्या उसे भी कुछ याद आया? क्या उसकी बहन से पंद्रह साल की चुप्पी का कोई धागा इस घंटी से जुड़ा है?
पर मैंने पूछा नहीं। कभी-कभी तंत्र का सबसे बड़ा नियम यही होता है — जो सामने है, उसे पहले होने दो।
चाय आई। मिट्टी के कुल्हड़ों में। भाप उठ रही थी। नबी चाचा ने कुल्हड़ दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई बच्चा गिलास पकड़ता है। श्यामलाल काका ने पहली घूँट ली और आँखें बंद कर लीं।
"शबनम," श्यामलाल काका ने कहा, "तेरी चाय में आज कुछ और है।"
"क्या है?" शबनम आपा ने पूछा।
"माफ़ी की महक," उन्होंने कहा।
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। बस मुड़कर अपने बर्तन समेटने लगी। पर मैंने देखा कि उसने आँख का कोना साफ़ किया।
और तभी घंटी फिर बजी।
इस बार मेरी जेब में नहीं थी। मैंने उसे जेब से निकालकर हथेली पर रख लिया था। वो मेरी हथेली में बजी। एक बार। छोटी सी आवाज़, जैसे किसी ने दूर से प्यार से बुलाया हो।
सब रुक गए।
"बजी," चिंटू ने आँखें बड़ी करके कहा। "अंकुश भैया, फिर बजी। बिना हाथ लगाए।"
और फिर घंटी ने कहा। मेरी हथेली में, इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ मैंने सुना। पर बच्चों ने मेरी आँखें देखीं और समझ गए कि कुछ कहा गया है।
"क्या कहा?" सानिया ने फुसफुसाकर पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बच्चों से झूठ नहीं बोलना चाहिए, पर तंत्र की बात भी हर किसी से नहीं कही जाती। मैंने कहा, "कुछ ऐसा जो मैं समझ नहीं पाया।"
घंटी ने कहा था — "पचास। दो हाथ। अब घर।"
पचास क्या? पचास साल? पचास अंक? दो हाथ — नबी चाचा और श्यामलाल काका के? या उस्ताद के? और "अब घर" — कौन सा घर? मेरा घर? या यह पीपल? या गली?
मैंने हथेली बंद कर ली। घंटी ठंडी होने लगी थी।
"अंकुश," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ अब सख़्त थी। "तेरी जेब में जो चीज़ है, उसे कभी दुकान के बोर्ड पर मत टाँगना। और किसी के हाथ में मत देना।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मेरी दादी कहती थीं," उसने कहा, "कि जो चीज़ बिना हाथ लगाए बजे, वो या तो बहुत पुरानी है या बहुत भूखी। और दोनों से बचकर रहना चाहिए।"
"भूखी?" गुड्डू ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर था।
"भूखी मतलब जो भूखी हो," चिंटू ने कहा, बड़े होने का नाटक करते हुए। "जैसे मैं समोसे के लिए भूखा हूँ।"
"तू सबसे ज़्यादा भूखा है," रफ़ीक़ ने कहा, "पर तू बजता नहीं।"
"चुप करो," शबनम आपा ने कहा, और बच्चे चुप हो गए। "अंकुश, तू मेरी बात सुन। ये जो बुज़ुर्गों को तू जोड़ रहा है, ये अच्छा काम है। पर इस गली में ऐसे भी लोग हैं जो जोड़ना नहीं, तोड़ना चाहते हैं। और वो तेरी घंटी सुन सकते हैं। तू उसे छिपाकर रख।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने उसे जेब में डाला, पर पहले एक बार उसकी सतह देखी। पीतल। जंग लगा। जैसे किसी बहुत पुराने हाथ ने इसे बनाया हो और फिर भूल दिया हो।
नबी चाचा ने चाय खत्म की और कुल्हड़ रखा। "बेटा," उन्होंने कहा, "अब मुझे जाना होगा। मेरी बीवी इंतज़ार कर रही होगी।"
"और मुझे भी," श्यामलाल काका ने कहा। "पर सुन, कल सुबह मैं तेरी दुकान पर आऊँगा। मेरी साइकिल का पिछला पहिया घिस गया है।"
"मैं ठीक कर दूँगा, काका," मैंने कहा।
"पैसे लेगा?"
"पैसे तो लूँगा," मैंने कहा। "पर एक शर्त पर। कल जब आए, तो नबी चाचा को भी साथ लाए। दोनों की साइकिलें साथ रखेंगे।"
दोनों हँसे। पचास साल बाद। और वो हँसी देखकर लगा कि घंटी ठंडी क्यों हो गई — उसका काम हो गया था।
बच्चे उन्हें छोड़ने गए। सानिया ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "अंकुश भैया, हम कल सुबह आएँ?"
"आओ," मैंने कहा। "पर पहले शबनम आपा की गुमटी से समोसे का हिसाब चुकाना।"
"अंकुश!" शबनम आपा ने कहा, पर वो मुस्कुरा रही थी।
बच्चे भाग गए। चिंटू ने भागते हुए कहा, "आपा, कल का हिसाब कल देखेंगे।"
"देखेंगे," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो प्यार था जो गली की औरतें बच्चों पर बरसाती हैं, चाहे ज़ुबान कितनी भी तेज़ हो।
मैं उठा और अपनी दुकान की तरफ़ बढ़ा। शाम हो रही थी और गली में छाया गहरी हो रही थी। मुझे मीरा के सवालों का जवाब देना था। मैंने सोचा कि घर जाऊँ, पापा से बात करूँ, तैयारी करूँ।
पर तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आईपर तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई — "अंकुश, ज़रा अंदर आ।"
रुक गया। आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर उसमें एक वज़न था। मैं मुड़ा और उनकी दुकान की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। सिलाई मशीन चुप थी। उस्ताद छोटे से स्टूल पर बैठे थे, चश्मा उतारकर आँखें मल रहे थे।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं उनके सामने फर्श पर बैठ गया।
उन्होंने देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, "तूने आज घंटी बजाई?"
"नहीं, उस्ताद। घंटी अपने आप बजी।"
"अपने आप?" वो आगे झुके। "कब?"
"जब नबी चाचा और श्यामलाल काका मिले।"
उन्होंने धीरे से सिर हिलाया। "मुझे लगा था। मैं दुकान पर था। सिलाई मशीन चला रहा था। तभी मेरे कान में एक आवाज़ आई। बहुत हल्की। जैसे कोई दूर से घंटी बजा रहा हो। मैंने मशीन रोक दी। फिर सुना। फिर तू आया।"
वो उठे। दरवाज़े तक गए और बाहर गली को देखने लगे। मैंने भी देखा। गली खाली थी। शाम की छाया लंबी हो रही थी।
"अंकुश," उन्होंने बिना मुड़े कहा, "ये घंटी किसी की मिरासी है।"
"आपने पहले भी कहा था।"
"पहले मैंने सिर्फ़ इशारा किया था। अब पूरी बात सुन।" वो मुड़े। "मिरासी का मतलब होता है विरासत। पर हर विरासत खुशी की नहीं होती। कुछ विरासतें ज़िम्मेदारी की होती हैं। और जो ज़िम्मेदारी की हो, उसका हिसाब भारी होता है।"
वो वापस आकर बैठ गए। "ये घंटी किसी एक आदमी की नहीं है। ये दो हाथों की मिरासी है। दो लोगों ने इसे बनाया। दो लोगों ने इसे चलाया। और जब वो अलग हुए, तो घंटी भी आधी रह गई — आधी कहीं, आधी कहीं। तेरे हाथ में जो है, वो एक हिस्सा है। दूसरा किसी और के पास है।"
"किसके पास?"
"ये मैं अभी नहीं बता सकता।" उन्होंने हाथ उठाया। "क्योंकि अभी तेरे लिए ये जानना ठीक नहीं। अभी तू जितना जानेगा, उससे तेरा काम बढ़ेगा, घटेगा नहीं।"
"उस्ताद—"
"सुन।" उनकी आवाज़ तेज़ थी। "ये जो तू आज कर रहा है, ये अच्छा है। पर एक बात सुन ले। जो घंटी सारे मोहल्ले को सुना दे, वो अपना घर क्यों नहीं सुन पाती?"
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