The Mysterious Bell – Chapter 1058
"मैं जानता था तुम लौटोगे," उन्होंने कहा। "बैठ जाओ।"
मैं बैठ गया।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "मैं आपसे चाबी माँगने नहीं आया। मैं आपसे एक वादा लेने आया हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"कैसा वादा?"
"अगर मैं आज रात उस कमरे से वो काग़ज़ ले आया," मैंने कहा, "तो आप कल सुबह रणवीर के दफ़्तार कोई चाबी नहीं भेजेंगे। न नक़ल, न रसीद, न कोई और चीज़।"
डॉक्टर इसरानी ने चश्मा उठाया, पहना, फिर उतार दिया।
"तुम्हें पता है कि अगर मैंने चाबी नहीं भेजी, तो समिति मुझ पर कार्रवाई करेगी?"
"पता है।"
"और अगर चाबी भेज दी और तुमने कुछ निकाला, तो वो काग़ज़ रणवीर के हाथ में जाएगा।"
"पता है।"
वो उठे। धीरे-धीरे, जैसे हर हड्डी उनसे अलग बात कर रही हो। फिर वो अपनी मेज़ के पीछे गए, नीचे की दराज़ खोली, और उसमें से एक चाबी निकाली।
वो चाबी पुरानी थी। लोहे की, घिसी हुई, छल्ले पर लाल रंग की रस्सी बँधी थी। और चाबी के ऊपरी हिस्से पर — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
"ये चाबी सिर्फ़ एक बार खुलेगी," उन्होंने कहा। "और उसके बाद सब कुछ सीधा होना चाहिए। मैं रणवीर से नहीं डरता। मैं इस बात से डरता हूँ कि मेरे बाद यहाँ कोई बैठेगा और उससे कहा जाएगा कि जो हुआ, अच्छा हुआ।"
मैंने चाबी ली।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आपकी बीवी का सफ़ेद कोट काजल पहन रही है। उसे पता है कि ये कोट किसका है?"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"तुमने उसे बताया?"
"नहीं। पर वो समझ गई।"
वो मुस्कुराए। पहली बार। बहुत हल्का। फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
"जाओ," उन्होंने कहा। "और याद रखना — उस कमरे में जो काग़ज़ तुम ढूँढ रहे हो, वो सबसे ऊपर नहीं है। वो सबसे नीचे है। और उसके ऊपर जो काग़ज़ हैं, वो सिर्फ़ इसलिए रखे गए हैं कि कोई ऊपर तक न पहुँचे।"
मैं उठा।
"एक बात और," उन्होंने कहा। "उस कमरे में एक दीवार है, जिस पर पुराने अस्पताल का नक़्शा टँगा है। उसमें एक जगह काली स्याही से काटी हुई है। वो जगह खाली नहीं है। वहाँ से नीचे जाने का रास्ता है।"
"आपने कभी नहीं देखा?"
"मैंने देखा," उन्होंने कहा। "पर मैं उतरा नहीं। मैं डॉक्टर हूँ, अंकुश। मैं मरीज़ों को ऊपर लाता हूँ, नीचे नहीं जाता।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मीरा और मैं बाहर आए। गलियारे में शालिनी खड़ी थी, हाथ में काली फाइल, और उसके पीछे काजल — जो अभी-अभी सल्लू चाचा के पास से आई थी।
"उस्ताद," शालिनी ने कहा, "मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तुम बाहर रहोगी। तुम्हारे पास खाता है और तुम्हारी गवाही है। अगर हम अंदर फँस गए, तो तुम वो खाता लेकर सीधे दुबे अंकल के पास जाओगी।"
शालिनी ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गई। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी पर्ची निकाली और मुझे दी।
"ये मेरे पापा की लिखाई है," उसने कहा। "आख़िरी पर्ची। मैं इसे अपने पास रखती थी। अब तुम रखो।"
मैंने पर्ची ली। उस पर सात लकीरें थीं, एक तारीख़ थी और नीचे एक शब्द — "अस्पताल"।
"शालिनी," मैंने कहा, "तुम्हारे पापा ने ये पर्ची कब लिखी थी?"
"जिस रात उन्होंने प्रेस बंद किया," उसने कहा। "और उस रात के बाद उन्होंने कभी प्रेस नहीं खोला।"
मैंने पर्ची अपनी जेब में रखी।
अब रात गहरी हो चुकी थी। अस्पताल के गलियारे खाली हो गए थे। दूर किसी वार्ड में बच्चा रो रहा था, और कहीं से बूढ़े की खाँसी आ रही थी।
मीरा गलियारे के मोड़ पर खड़ी थी, हाथ में छोटी टॉर्च। शालिनी पीछे वाले रास्ते पर थी, जहाँ से कोई भी आ सकता था।
मैं रिकॉर्ड कमरे के दरवाज़े पर पहुँचा। दरवाज़ा लोहे का था, भूरे रंग का, और उस पर पुरानी धूल की परत जमी थी।
मैंने चाबी डाली। घुमाई।
ताला खुला।
मैंने दरवाज़ा धकेला। अंदर से सीलन की गंध आई — वो गंध जो बरसों बंद कमरे में रहती है। मैंने टॉर्च जलाई।
कमरे में लोहे के रैक थे, जिन पर फाइलों के बंडल रखे थे। एक कोने में लकड़ी की मेज़ थी, जिस पर धूल मोटी थी। दीवार पर पुराना नक़्शा टँगा था, जिसका एक कोना मुड़ा हुआ था।
मैंने रैक की तरफ़ बढ़ना शुरू किया। फाइलों पर तारीख़ें लिखी थीं — पुरानी, धुँधली। मैंने उँगली से धूल हटाई और पढ़ना शुरू किया।
"मीरा," मैंने धीरे कहा, "तुम अंदर आ जाओ। मुझे तुम्हारी रोशनी चाहिए।"
वो अंदर आई। उसने अपनी टॉर्च जलाई और दीवार की तरफ़ की।
तीसरे रैक पर, सबसे नीचे, एक फाइल थी जिस पर लिखा था — "दवा सूची।"
मैंने उसे निकाला।
जैसे ही मैंने फाइल खोली, मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
फाइल के पहले पन्ने पर वही सूची थी — नाम, दवा, तारीख़। और सबसे नीचे, एक नाम के आगे, काली लकीर।
सल्लू चाचा।
पर यहाँ एक और चीज़ थी। उस काली लकीर के ठीक ऊपर, नीली मोहर लगी थी — वही गोल मोहर जो चंद्रेश के दफ़्तार की फाइलों पर होती थी।
"मीरा," मैंने कहा, "ये देखो।"
उसने टॉर्च की रोशनी फाइल पर की।
"उस्ताद, ये मोहर चंद्रेश के दफ़्तार की है।"
"हाँ," मैंने कहा। "यानी दवा सूची सिर्फ़ अस्पताल में नहीं बनती। वो दफ़्तार में भी बनती है। और किसी का नाम रद्द करने का हुक्म वहाँ से आता है।"
मैंने अगला पन्ना पलटा। उस पर एक और नाम था — इस बार कटा नहीं, पर उसके आगे लिखा था "बाकी"।
"ये क्या है?"
मीरा ने पास से देखा।
"उस्ताद, ये तो कोई नाम नहीं। ये सिर्फ़ लिखा है — बाकी।"
मैंने उस पन्ने को ध्यान से देखा। उसके ऊपर एक और लाइन थी, जो अब मिट चुकी थी। सिर्फ़ एक अक्षर बचा था — "श"।
"श," मैंने धीरे कहा। "शकील? शंकर?"
"या फिर शालिनी?" मीरा ने कहा।
मैंने सिर हिलाया।
तभी — दूर से, वार्ड की तरफ़ से — एक आवाज़ आई।
खाँसी।
बहुत धीमी। बहुत दबी हुई। पर मैं उसे पहचानता था।
माँ।
मेरे हाथ काँपने लगे। फाइल हाथ से छूटने लगी, मैंने उसे ज़ोर से पकड़ा।
"अंकुश?" मीरा ने कहा। "तुम ठीक हो?"
"हाँ," मैंने कहा। पर आवाज़ भर्रा रही थी।
मैंने फाइल वापस रैक पर रखी और बाहर की तरफ़ बढ़ा। गलियारे में टॉर्च की पीली रोशनी में माँ का पर्दा दिख रहा था। वो पर्दे के पीछे थीं, बिस्तर पर, और खाँस रही थीं।
मैं रुका।
"माँ?"
खाँसी रुकी। फिर पर्दे के पीछे से आवाज़ आई — धीमी, थकी, पर साफ़।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अंदर आ जा।"
मैंने पर्दा हटाया। माँ बिस्तर पर बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में, हाथ में पानी का गिलास। उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।
"तू रात में यहाँ क्या कर रहा है?"
"माँ, मैं—"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "काजल ने बताया। तू उस कमरे में गया है जिसकी चाबी कल रणवीर के दफ़्तार जानी थी।"
मैंने सिर नीचा कर लिया।
"माँ, अगर वो चाबी वहाँ पहुँच गई, तो सब कुछ चला जाएगा। हमारा घर, दुकान, अस्पताल — सब।"
माँ ने गिलास मेज़ पर रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझे एक बात बताऊँ?"
"हाँ।"
"जब मैं तेरे पापा से ब्याह करके आई थी, तब मेरे पास सिर्फ़ दो चीज़ें थीं — एक संदूकची और एक चुनरी। मुझे नहीं पता था कि मैं किस घर में आ रही हूँ, किस गली में, किस शहर में। बस इतना पता था कि जिस आदमी के साथ जा रही हूँ, उसके हाथ साफ़ हैं।"
वो रुकीं।
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