The Mysterious Bell – Chapter 1057
वो रुकी। उसके होंठ काँपे।
"मैंने नहीं लगवाया।"
"तो फिर किसने?"
वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से आवाज़ आई।
"मैंने।"
हम सब मुड़े।
शकील खड़ा था। उसके कपड़े धूल भरे थे, आँखें लाल थीं, और उसके हाथ में एक काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, पीला।
"शकील!" मैंने कहा।
वो आगे आया। भीड़ चीरता हुआ। सीधे मेरे पास।
"उस्ताद," उसने कहा। "माफ़ करना।"
"किस बात के लिए?"
"उस रात," उसने कहा, "जब आपने मुझे पाँच सौ रुपये लौटाए थे, मैंने आपसे कहा था कि मैं अंगूठा नहीं लगाऊँगा।"
"हाँ।"
"पर मैंने लगा दिया।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये वो काग़ज़ है। मेरे अब्बा के अंगूठे के साथ। मैंने आज सुबह इसे उस औरत से छीन लिया।"
मैंने काग़ज़ लिया।
वही शिकायत थी। वही लाल अंगूठा। पर अब — नीचे — एक नई लाइन थी।
"मैंने अपना अंगूठा नहीं लगाया। मेरे अब्बा का अंगूठा ज़ोर से दबाया गया। जब मैंने मना किया, तो मुझे डराया गया कि अगर मैंने किसी को बताया, तो अगले महीने मेरे अब्बा की दवा बंद हो जाएगी।"
और उसके ननीचे की लाइन पढ़कर मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"मेरे अब्बा का अंगूठा ज़ोर से दबाया गया। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की, पर उस औरत ने कहा कि अगर मैंने आवाज़ उठाई, तो अगले महीने की दवा काग़ज़ में नहीं, किसी और के नाम पर लिखी जाएगी।"
मैंने शकील की तरफ़ देखा। उसके होंठ सूखे थे, आँखों के नीचे काली लकीरें थीं, और उसकी कमीज़ की जेब से एक नीली स्याही की डिब्बी झाँक रही थी — वही डिब्बी जो उसने कल रात मुझसे छिपाई थी।
"शकील," मैंने धीरे कहा, "ये लाइन तुमने लिखी है?"
"हाँ।"
"अपने हाथ से?"
"हाँ।"
"तो फिर ये काग़ज़ तुम्हारे हाथ का गवाह है," मैंने कहा। "और गवाही वो होती है जो खुद बोले। तुमने खुद लिखा — ये सबसे मज़बूत बात है।"
शकील ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ फँस गई। वो गला साफ़ करने लगा।
तभी पीछे से वो औरत बोली। "तुमने ये किया? तुमने मेरे काग़ज़ पर—"
"ये तुम्हारा काग़ज़ नहीं है," मैंने कहा, बिना मुड़े। "ये शकील के अब्बा का अंगूठा है। और अंगूठा जिसका है, काग़ज़ उसका है। तुम सिर्फ़ ले जाने वाली हो।"
वो औरत मेरी तरफ़ बढ़ी, पर डॉक्टर इसरानी ने अपनी लाठी ज़ोर से ज़मीन पर टिका दी।
"बस," उन्होंने कहा। "अस्पताल में चिल्लाना मना है। और तुम अब यहाँ से जाओ। जब मरीज़ का परिवार खुद बोल दे, तो दलाल की ज़रूरत नहीं रहती।"
वो औरत रुकी। उसने चारों तरफ़ देखा — भीड़ को, शकील को, मुझे — और फिर अपना दुपट्टा सँभालकर तेज़ी से बाहर निकल गई।
भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी। कुछ लोग शकील को देख रहे थे, कुछ मुझे। कुछ ऐसे भी थे जो अब भी नहीं समझ पाए थे कि असल में हुआ क्या।
शबनम आपा ने आकर शकील के कंधे पर हाथ रखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तूने अपने अब्बा के अंगूठे पर मुहर लगने नहीं दी। ये बहुत बड़ी बात है। बहुत बड़ी।"
शकील ने सिर नीचा कर लिया।
"आपा," उसने कहा, "मुझे डर लग रहा है। वो औरत कह रही थी कि अगर मैंने किसी को बताया, तो मेरे अब्बा की दवा बंद हो जाएगी। और आज सुबह खिड़की पर सिर्फ़ दो पत्ते बचे थे।"
मैंने अपनी जेब से वो पीला काग़ज़ निकाला — जो डॉक्टर इसरानी ने मुझे दिया था, नाम की जगह खाली।
"शकील," मैंने कहा, "तुम्हारे अब्बा की दवा कल सुबह तक की है, या कल दोपहर तक?"
"सुबह तक," उसने कहा। "दो पत्ते हैं। एक कल सुबह, एक कल रात। उसके बाद—"
"उसके बाद कुछ नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि उसके बाद नई खेप आ जाएगी। और नई खेप आने से पहले मैं वो काग़ज़ निकालकर लाऊँगा जिस पर तुम्हारे अब्बा का नाम रद्द करके लिखा गया है — रद्द करने वाले का नाम भी।"
डॉक्टर इसरानी मेरी तरफ़ मुड़े।
"तुम वो काग़ज़ निकालना चाहते हो जिसका ज़िक्र मैंने अभी तुमसे किया?"
"हाँ।"
"और तुम्हें यह भी पता है कि उस कमरे की चाबी एक बार खुलेगी?"
"आपने ही कहा था," मैंने कहा, "कि उस पर वही निशान है जो मंसूर चाचा के ताले पर, चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर और पाँच साल पहले के काग़ज़ों पर। तो फिर सवाल ये है — चाबी एक बार खुलेगी, या उसका इस्तेमाल एक बार होगा?"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। लंबी साँस ली।
"दोनों में फ़र्क़ है," उन्होंने कहा। "चाबी जितनी बार घुमाओगे, ताला उतनी बार खुलेगा। पर जिस कमरे में हम जा रहे हैं, वो एक ही दरवाज़ा नहीं है। वहाँ एक और दरवाज़ा है, अंदर। और वो बंद है।"
"तो हम पहले वाला खोलेंगे," मैंने कहा।
"और दूसरे का क्या?"
"दूसरे के लिए," मैंने कहा, "कल सुबह देखेंगे।"
अस्पताल के गलियारे में शाम ढल चुकी थी। पीली दीवारों पर अब लाल रंग की लकीरें पड़ने लगी थीं, और दूर किसी वार्ड से बजने वाले पंखे की घरघराहट आ रही थी। डॉक्टर इसरानी अपने केबिन में लौट गए थे और शकील अपने अब्बा के बिस्तर के पास चला गया था।
मैं अस्पताल के आँगन में खड़ा था।
मीरा आई। उसके हाथ में कैमरा था, बंद। बैटरी खत्म हो गई थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने सब रिकॉर्ड कर लिया। पर एक बात समझ नहीं आई। वो औरत अचानक क्यों भागी? अगर उसके पास काग़ज़ था, तो उसे लड़ना चाहिए था।"
"क्योंकि उसका काग़ज़ अब हमारे पास है," मैंने कहा। "और वो जानती है कि हमें ये काग़ज़ कहाँ से मिला — शकील के हाथ से। यानी जिस डर से वो शकील को दबा रही थी, वो डर अब टूट गया।"
"पर उसने पैसे किसके लिए लिए?"
"शायद पैसे नहीं," मैंने कहा। "शायद वादा। शायद किसी खास चीज़ का वादा — जैसे अस्पताल में अंदर आने-जाने की छूट। या अपने किसी का नाम दवा सूची में ऊपर करने का वादा।"
मीरा ने कुछ सोचा।
"उस्ताद," उसने कहा, "तुम रात में उस कमरे में जाना चाहते हो। पर डॉक्टर इसरानी की चाबी कल सुबह नौ बजे रणवीर के दफ़्तार जाएगी। अगर हम आज रात वो काम नहीं कर पाए, तो कल सुबह हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।"
"हम आज रात वो करेंगे," मैंने कहा। "पर पहले मुझे कुछ चाहिए।"
"क्या?"
"डॉक्टर इसरानी को उस कमरे की चाबी मुझे देनी होगी। और वो खुद नहीं देंगे अगर उन्हें लगा कि मैं अकेले जा रहा हूँ। इसलिए मुझे उनसे ऐसी बात करनी है जो उन्हें याद दिलाए कि वो चालीस साल से इंतज़ार कर रहे हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुमने उनकी तस्वीर देखी थी?"
"हाँ।" मैंने कहा। "दरवाज़े के पीछे टँगी। जिसमें वो जवान थे, और साथ में एक और आदमी था — जवान शिवनारायण यादव। और उनके हाथ में एक रजिस्टर था और उस रजिस्टर के ऊपर रखी थी वो पीतल की घंटी।"
मीरा की आँखें बड़ी हुईं।
"उस्ताद, वो घंटी तो तुम्हारी है।"
"घंटी मेरी है," मैंने कहा। "पर उस तस्वीर में वो घंटी डॉक्टर इसरानी के हाथ में थी। यानी वो जानते हैं कि ये घंटी क्या है। वो चालीस साल से चुप हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अगर उन्होंने कुछ कहा तो अस्पताल नहीं रहेगा। और आज जब उन्होंने अपनी बीवी का कोट काजल को दिया, मुझे लगा कि वो अंदर से थक चुके हैं।"
मीरा ने कैमरा अपने बैग में रखा।
"तो फिर चलो," उसने कहा। "मैं बाहर रहूँगी। अगर कोई आया, तो खाँसूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तुम अंदर आओगी। मुझे गवाह चाहिए — सिर्फ़ काग़ज़ का नहीं, इंसान का।"
हम डॉक्टर इसरानी के केबिन में पहुँचे। वो अपनी कुर्सी पर बैठे थे, मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर था, और उनके आधे पानी के गिलास के पास एक टूटा हुआ चश्मा पड़ा था।
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