The Mysterious Bell1055 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1055

7 min read November 5, 2026

डॉक्टर इसरानी का केबिन वैसा ही था जैसा कल — काग़ज़ों के ढेर, आधे पानी के गिलास, टूटा चश्मा। पर आज उनकी मेज़ पर एक और चीज़ थी।

मेरी खाली रसीद थी।

वो मुझे दे चुके थे। और अब वो फिर मेज़ पर थी — पर इस बार उस पर एक नाम लिखा था।

मैंने नाम पढ़ा। "शकील कुमार"

मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो दराज़ में कुछ ढूँढ रहे थे, हाथ काँप रहे थे।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "ये रसीद आपने भर दी?"

वो रुके। फिर धीरे से मुड़े।

"नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने इसे खाली छोड़ा था। पर आज सुबह जब मैं आया, तो ये मेज़ पर रखी थी — और इस पर ये नाम लिखा था।"

"किसकी लिखाई है?"

"मुझे नहीं पता।" उन्होंने अपना टेप बँधा चश्मा पहना। "पर इतना जानता हूँ — ये नाम मेरी लिखाई नहीं है, और ये काग़ज़ मेरे दफ़्तार का भी नहीं है। ये वही काग़ज़ है जो मैंने कल तुम्हें दिया था।"

मैंने रसीद उठाई।

नीचे — ठीक वहीं जहाँ कल खाली जगह थी — उभरे हुए अक्षरों में नाम था, और उसके नीचे, उसी लाल स्याही में, वही अंगूठा था।

और अंगूठे के बगल में — बिल्कुल छोटे अक्षरों में — कुछ लिखा था।

मैंने झुककर पढ़ा।

"आख़िरी दवा।"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। बर्फ़ जैसी ठंडी।

फिर उसने एक शब्द कहा।

"डर।"

"क्या?" मैंने धीरे पूछा।

"डर," घंटी ने फिर कहा। "आज रात डर से एक काग़ज़ पर अंगूठा लगेगा। और वो काग़ज़ इस अस्पताल को अपने साथ ले जाएगा।"

मैंने रसीद मेज़ पर रख दी।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "कल रात की बात याद है? रिकॉर्ड कमरे की चाबी?"

वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।

"तुम अभी भी उस कमरे में जाना चाहते हो?"

"मुझे जाना है," मैंने कहा। "आज रात। कल सुबह नौ बजे चाबी चली जाएगी। उसके बाद कमरा उसके हाथ में होगा। मुझे उस कमरे में जाना है — आज रात, आपके साथ या आपके बिना।"

डॉक्टर इसरानी एक पल चुप रहे। फिर वो उठे — धीरे, बहुत धीरे — और मेज़ की सबसे नीचे वाली दराज़ के पास गए। उसे खोला। उसमें से एक चीज़ निकाली।

चाबी थी। पुरानी, घिसी हुई, और उसके छल्ले पर एक पीली पड़ी रस्सी बँधी थी।

"ये सिर्फ़ एक बार खुलेगी," उन्होंने कहा। "उसके बाद सब कुछ सीधा होना चाहिए। अगर तुमने इसे खोला और अंदर से कुछ निकाला, तो मुझे उम्मीद है वो चीज़ इतनी बड़ी होगी कि मैं अपनी बाक़ी ज़िंदगी में उस कमरे की तरफ़ न देखूँ।"

मैंने चाबी ली।

वो भारी थी। बहुत भारी।

"एक बात और," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा। मैं बाहर बैठूँगा। अगर मैंने अंदर जाकर कुछ देखा, तो कल सुबह मैं झूठ नहीं बोल पाऊँगा। और मुझे झूठ बोलने की आदत नहीं है।"

"ठीक है," मैंने कहा।

"और एक आख़िरी बात," उन्होंने कहा। "उस कमरे में जो कुछ भी मिले — पहले उसे देखना, फिर उसे छूना। क्योंकि काग़ज़ पढ़ने से पहले उसका वक़्त पढ़ना पड़ता है।"

मैंने सिर हिलाया।

और बाहर निकला।

गलियारे में मीरा खड़ी थी। शालिनी उसके पास थी। और काजल — काजल भी वहीं थी, बिना बताए आई थी।

"तू यहाँ क्यों है?" मैंने पूछा।

"क्योंकि मुझे पता है," काजल ने कहा, "कि जब तू कुछ बड़ा करता है, तो तू अकेले करता है। और मैं अकेले नहीं छोड़ूँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो बचपन में होती थी — जब वो मेरी साइकिल की पिछली सीट पर बैठने की ज़िद करती थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "तू बाहर रुक। मीरा के साथ।"

"अंदर कौन जाएगा?"

"मैं," मैंने कहा। "और उस्ताद।"

"उस्ताद कहाँ हैं?"

"रास्ते में," मैंने कहा। "मैंने उन्हें बुला लिया है।"

तभी गलियारे के मोड़ पर उस्ताद अली बक्श दिखे। उनके हाथ में वो पुरानी सिलाई मशीन की सुई थी, और काँधे पर कपड़े का एक थैला।

"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "कि तू अकेले जाएगा। इसलिए मैं आ गया।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "उस्ताद, आपको किसने बताया?"

"किसी ने नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने खुद सुना। घंटी की आवाज़ मुझे आज सुबह तब आई जब मैं दुकान पर बैठा था। उसने कहा — अंकुश को दो हाथ चाहिए। एक हाथ चाबी के लिए, और एक हाथ काग़ज़ के लिए।"

मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।

"आप ठीक हैं?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "पर मैं यहाँ हूँ। यही काफ़ी है।"

हम दोनों रिकॉर्ड कमरे की तरफ़ बढ़े। अस्पताल का पिछला हिस्सा रात में और भी सुनसान लगता है। दीवारों पर पुराने प्लास्टर के धब्बे थे, और फर्श पर सीमेंट की धूल जमी थी। रिकॉर्ड कमरे का दरवाज़ा लोहे का था, और उस पर एक पुराना ताला लगा था।

मैंने चाबी डाली।

ताला खुला। चरचराता हुआ।

दरवाज़ा खोला।

अंदर अंधेरा था। मैंने टॉर्च जलाई — वही जो टिंकू ने दी थी। रोशनी अंदर गई, और पहली चीज़ जो दिखी, वो थी रैक। लोहे के रैक, जिन पर फाइलों के ढेर रखे थे। कुछ फाइलें जली हुई थीं, कुछ पर धूल इतनी थी कि उनके रंग पहचाने नहीं जा रहे थे।

"कहाँ से शुरू करें?" उस्ताद ने पूछा।

"उस चीज़ से," मैंने कहा, "जो सबसे नई लगे।"

हमने रैक खँगालने शुरू किए। मैंने ऊपर वाली शेल्फ़ से एक फाइल निकाली — उस पर साल लिखा था, पर पढ़ा नहीं गया। खोली तो अंदर काग़ज़ नहीं थे। सिर्फ़ धूल थी।

दूसरी फाइल — उसमें भूरे काग़ज़ थे, जिन पर नीली स्याही फैली थी।

तीसरी फाइल — जली हुई।

"अंकुश," उस्ताद ने कहा। वो नीचे वाली शेल्फ़ के पास बैठे थे और कुछ ढूँढ रहे थे। "ये देख।"

मैं गया।

उनके हाथ में एक काग़ज़ था। पीला। मुड़ा हुआ। और उस पर — ऊपर दाएँ कोने में — एक गोल मोहर थी।

नीली।

मैंने काग़ज़ खोला।

सबसे ऊपर लिखा था — "सूची — दवा वितरण।"

नीचे — नामों की सूची। सोलह नाम। और हर नाम के आगे — दवा का नाम, मात्रा, और तारीख़।

मैंने उँगली सरकाई।

सातवें नंबर पर — सलीमुद्दीन।

उसके आगे — "साँस की दवा — रोकी गई।"

रोकी गई। पर किसने रोकी?

मैंने काग़ज़ को पलटा। पीछे — नीली स्याही में छह लाइनें थीं और नीचे — चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार की मोहर।

वो मोहर मैंने पहले भी देखी थी। उसी मोहर का आधा हिस्सा खाते के जले पन्ने पर भी था।

"ये दवा की सूची नहीं है," उस्ताद ने धीरे कहा। "ये काग़ज़ है जो बताता है कि दवा कहाँ जाती है और कहाँ रुकती है।"

"और किसके हाथ से?"

"उसी के," उस्ताद ने कहा। "जिसके हाथ में चाबी है।"

तभी — बाहर से — एक आवाज़ आई।

खाँसी।

माँ की खाँसी।

मेरे हाथ काँपने लगे। काग़ज़ मेरे हाथ से फिसलने लगा।

"अंकुश," उस्ताद ने कहा। "संभल।"

"माँ…"

"वो अंदर है," उन्होंने कहा। "वो सुरक्षित है। तू यहाँ है। अपने काम पर ध्यान दे।"

पर मेरे हाथ काँप रहे थे। और काग़ज़ काँप रहा था। और मेरी आँखों के सामने — कल रात का दृश्य घूमने लगा।

कल रात।

डॉक्टर इसरानी के केबिन में बैठा था। समय — रात के करीब ग्यारह बजे। मैंने उनसे कहा था — "डॉक्टर साहब, चाबी जाने से पहले मुझे रिकॉर्ड कमरे में जाना है।"

वो पहले मना कर रहे थे। "ये सही नहीं है। ये अस्पताल का काग़ज़ है। इसे मेरी मर्ज़ी के बिना नहीं निकाला जा सकता।"

"आपकी मर्ज़ी क्या है?"

"मेरी मर्ज़ी ये है," उन्होंने कहा, "कि ये अस्पताल कल भी खुला रहे। और परसों भी। और उसके बाद भी।"

"तो मुझे जाने दीजिए।"

वो एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने कहा — "एक शर्त पर। तुम कुछ नहीं तोड़ोगे। कुछ नहीं जलाओगे। और जो मिलेगा, उसे मेरे सामने रखोगे।"

"ठीक है।"

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