The Mysterious Bell1054 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1054

6 min read November 5, 2026

लाल।

बड़ा।

और वो अंगूठा वही था जिसका इंतज़ार कागऔर वो अंगूठा वही था जिसका इंतज़ार काग़ज़ कर रहा था।

मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया। सुबह की धूप उस पर सीधी पड़ रही थी, और अंगूठे का लाल निशान उस धूप में ऐसे चमक रहा था जैसे अभी भीगा हो।

किसी ने अभी लगाया था। स्याही नहीं सूखी थी। मैंने उँगली लगाई तो वो मुँह पर चिपक गई।

मैंने चारों तरफ़ देखा। सफ़ेद गाड़ी से उतरे चार लोग अब अस्पताल के भीतर जा चुके थे। औरत दुपट्टा मुँह पर लपेटे हुए थी, इसलिए उसका चेहरा नहीं दिखा। दो सफ़ेद कुर्ते वाले पीछे-पीछे थे। और सबसे आगे जो काले कोट वाला था — वो किसी से भी आँख नहीं मिला रहा था।

मैंने काग़ज़ पढ़ना शुरू किया।

ऊपर लिखा था — श्रीमान थाना प्रभारी महोदय, विषय है डॉक्टर निहाल इसरानी द्वारा मरीज़ के साथ धोखा। नीचे पाँच लाइनें। बीच में दो जगह शकील का नाम, और उसके नीचे एक जगह सलीमुद्दीन का नाम।

और सबसे नीचे — काग़ज़ के बाएँ कोने में — लाल अंगूठा।

मैंने उसे गौर से देखा। अंगूठा नया था, धारियाँ साफ़ दिख रही थीं। और उसके नीचे की जगह पर बिल्कुल वैसा ही निशान था जैसा मैंने पचास जगह देखा था — दो लकीरें, बीच में एक बिंदु।

मेरी जेब में घंटी काँपी।

"नहीं," मैंने धीरे कहा। "अभी नहीं।"

मैंने सफ़ेद कुर्ते वालों को जाते देखा। वो सीधे दवा की खिड़की की तरफ़ गए थे।

और मैं उसी वक़्त समझ गया कि आज सुबह का सारा खेल दवा का नहीं था।

खेल इस काग़ज़ का था।

शकील के परिवार ने ये शिकायत दी थी। शकील का परिवार यानी उसका दादा, उसकी माँ, और शकील खुद।

मैं दौड़कर दवा की खिड़की तक गया। वहाँ एक सफ़ेद कुर्ते वाला खड़ा था और दूसरा खिड़की के अंदर झाँक रहा था। उनके पीछे वो औरत थी जो दुपट्टा मुँह पर लपेटे हुए थी, और जो सबसे आगे आई थी।

"ये अंगूठा किसका है?" मैंने उससे पूछा।

वो फिसल कर दो कदम पीछे हो गई।

"तुम कौन हो?" उसकी आवाज़ दुपट्टे के नीचे से आई, दबी हुई, जैसे किसी और की आवाज़ बोल रही हो।

"मैं वही हूँ," मैंने कहा, "जिसने तुम्हारे शकील को कल रात पाँच सौ रुपये लौटाए थे।"

वो रुक गई।

दुपट्टा उसने थोड़ा नीचे किया। चालीस के आसपास की औरत थी। आँखें सूजी हुई थीं, जैसे रात भर रोई हो।

"तुम वो लड़के हो?" उसने कहा। "जिसने कहा था कि अंगूठा नहीं लगाने दूँगा?"

"हाँ।"

वो एक पल चुप रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तो देख लो। अंगूठा लग गया। और हमें नहीं पता कि किसने लगाया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या मतलब?"

वो औरत काँपने लगी। "मेरे ससुर कल रात से बोल नहीं रहे। शकील कल शाम से गायब है। और आज सुबह जब मैं उठी, तो ससुर के तकिये के नीचे ये काग़ज़ था।" उसने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया जो मेरे हाथ में था। "और ससुर का अंगूठा लाल था। जैसे किसी ने ज़ोर से उनका हाथ पकड़कर काग़ज़ पर दबा दिया हो।"

घंटी फिर काँपी। इस बार ज़ोर से।

मैंने काग़ज़ कसकर पकड़ लिया।

"तुम्हारे ससुर कहाँ हैं?"

"अंदर।" उसने भीतर की तरफ़ इशारा किया। "पाँचवें बेड पर। और वो बोल नहीं रहे।"

मैं भीतर भागा। दवा की खिड़की से आगे, गलियारे के आख़िर में, वहाँ जहाँ कल रात सल्लू चाचा का नाम काली लकीर से रद्द किया गया था।

सल्लू चाचा पाँचवें बेड पर लेटे थे। आँखें खुली थीं, पर वो कहीं और देख रही थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। उनके दाहिने हाथ की उँगलियों पर लाल स्याही के धब्बे थे।

मैंने हाथ थामा। ठंडा था।

"चाचा," मैंने कहा। "चाचा, मैं अंकुश हूँ।"

उनकी आँखें मेरी तरफ़ घूमीं। फिर उन्होंने होंठ हिलाए। मैंने कान पास ले जाया।

"श…"

"क्या?"

"शक…"

"शकील? शकील कहाँ है चाचा?"

उन्होंने सिर हिलाया। जैसे ना कह रहे हों। फिर उँगली उठाई — काँपती हुई — और गलियारे के आख़िरी कोने की तरफ़ इशारा किया।

मैं उस तरफ़ देखने ही वाला था कि पीछे से आवाज़ आई।

"अंकुश।"

माँ की आवाज़ थी।

मैं मुड़ा। दो पर्दों के बीच से माँ का बिस्तर दिख रहा था। वो बैठी हुई थीं, और उनकी आँखें गलियारे में हो रही सारी हलचल पर थीं।

"अंदर आ," उन्होंने कहा।

मैं पर्दे के पीछे गया। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनके हाथ कंबल पर रखे थे, जैसे कुछ कसकर पकड़ रही हों।

"माँ…"

"तूने कल रात वो लड़का बचाया," उन्होंने कहा। "शकील।"

"हाँ।"

"और आज सुबह वही लड़का अपने अब्बा की दवा के लिए अपना अंगूठा देने वाला था।"

मैं चुप रहा।

"मैं जानती हूँ," माँ ने कहा। "मैं जानती हूँ कि तू क्या सोच रहा है। तू सोच रहा है कि ये सब मेरी वजह से है।"

"माँ…"

"क्योंकि अगर मैं यहाँ नहीं होती," उन्होंने कहा, "तो तू सीधे उस सफ़ेद कुर्ते वाले की गर्दन पकड़ता। पर मैं यहाँ हूँ, इसलिए तू डरता है। और डरता है तो सही करता है।"

मैंने कुछ कहने की कोशिश की। आवाज़ नहीं निकली।

"पर एक बात सुन," उन्होंने कहा। "मुझे बचाने के चक्कर में खुद को मत खो देना।"

"माँ, मैं…"

"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "जब तू कल रात रिकॉर्ड कमरे की बात कर रहा था, मैंने सुना। तूने डॉक्टर इसरानी से कहा कि तुझे आज रात उस कमरे में जाना है।"

मैंने आँखें झुकाईं।

"अंदर जा," माँ ने कहा। "पर एक बात याद रख — जो काग़ज़ रात में निकलेगा, वो सुबह नहीं मिलेगा। और जो सुबह मिला, वो रात में नहीं था। तू समझ रहा है?"

"समझ रहा हूँ।"

"तो जा। और अंकुश," उन्होंने मेरा हाथ थामा। "अगर रास्ते में कोई काग़ज़ दिखे जिस पर मेरा नाम लिखा हो — तो उसे मत छू। मुझे उस पर अपनी उँगली से ज़्यादा तेरे हाथ पर भरोसा है।"

मैंने उनका हाथ चूमा।

और बाहर निकला।

गलियारे में मीरा मिली। उसके हाथ में कैमरा था, पर उसने उसे चालू नहीं किया था।

"अंकुश," उसने धीरे कहा। "चारों लोग अंदर हैं। दो सफ़ेद, एक काला, और एक औरत। वो औरत शकील की माँ है।"

"मैं जानता हूँ।"

"और तीन और लोग आए हैं। अस्पताल के बाहर। उनके हाथ में सफ़ेद पट्टियाँ हैं।"

मैं रुक गया।

"कैसी पट्टियाँ?"

"वो पट्टियाँ," उसने कहा, "जो सील लगाने के बाद चिपकाई जाती हैं।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"कितने लोग?"

"तीन।" उसने कहा। "और उनके साथ वो मोटा आदमी है जो गुमटी पर आया था। बबलू का आदमी।"

मीरा ने अपना मोबाइल मेरी तरफ़ बढ़ाया। स्क्रीन पर अस्पताल का गेट दिख रहा था। तीन आदमी काग़ज़ों के बंडल और बाल्टी लिए खड़े थे। उनके पीछे — भीड़। और भीड़ के बीच — एक औरत जो अपना दुपट्टा मुँह पर लपेटे थी।

नहीं।

दुपट्टा मुँह पर वो औरत नहीं थी जो शकील की माँ थी। एक और औरत थी। लंबी, दुबली, और उसके हाथ में कुछ लाल था।

"ये कौन है?" मैंने पूछा।

"नहीं पता," मीरा ने कहा। "पर उसने अभी-अभी गेट पर आकर एक लाइन कही।"

"क्या कहा?"

"कहा — 'हमें यहाँ दवा नहीं, काग़ज़ चाहिए। डॉक्टर निहाल ने काग़ज़ छिपाए हैं। और हम उन्हें निकलवाकर रहेंगे।'"

मैंने मीरा को देखा।

"ये शकील के परिवार वालों की आवाज़ नहीं है," मैंने कहा। "ये किसी और की आवाज़ है जिसे शकील के परिवार की आवाज़ बनाया गया है।"

तभी गलियारे के आख़िर से शालिनी दौड़ती हुई आई।

"अंकुश," उसने कहा। "डॉक्टर इसरानी का केबिन खुला है। वो कुछ ढूँढ रहे हैं। और वो काँप रहे हैं।"

मैं दौड़ा।

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