The Mysterious Bell – Chapter 1047
"आधा नाम," शालिनी ने धीरे से दोहराया।
"आधा नाम," मैंने कहा, "मतलब एक नाम ऐसा जो अभी पूरा नहीं लिखा गया। किसी ने 'भारद्वाज' तो लिख दिया, पर आगे क्या लिखना है, वो नहीं लिखा।"
मीरा ने कैमरा बंद किया और मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों नहीं लिखा?"
मैंने पन्ने को उठाया और लालटेन की रोशनी में देखा।
और फिर मुझे वो दिखा जो मैं ढूँढ रहा था।
पन्ने के बिल्कुल नीचे, जले हुए किनारे के पार, एक छोटी सी खाली जगह थी। स्याही की गोली जैसी। जैसे किसी ने कलम रखी हो, और फिर उठा ली हो।
"क्योंकि," मैंने कहा, "आगे जो नाम आना था, वो इस वक़्त ज़िंदा था।"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "रखवाला।"
हम सबने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?" शालिनी ने कहा।
"रणवीर ने खुद कहा था, उस दिन बक्से के सामने," उस्ताद ने कहा। "उसने कहा था — मैं इस बक्से का मालिक नहीं हूँ, रखवाला हूँ। अब समझ आया। वो मालिक नहीं है, क्योंकि मालिक का नाम अभी पूरा लिखा ही नहीं गया। वो सिर्फ़ उस चीज़ को सँभाल रहा है जिसे कोई और लिखेगा।"
गोदाम में एक लंबी चुप्पी आई।
और उस चुप्पी में, दूर, गली की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
लोहे के जूतों की नहीं।
लकड़ी की नहीं।
किसी गाड़ी के दरवाज़े बंद होने की। बहुत दूर। बहुत हल्की।
मीरा ने फौरन टॉर्च बुझाई।
हम सब अंधेरे में खड़े रह गए, और शालिनी ने बहुत धीरे से कहा, "मैंने किसी को नहीं बताया कि मैं आज यहाँ आ रही हूँ।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
वो अभी भी ठंडी थी। पर अब उसका वज़न कुछ बदल गया था, जैसे उसने कोई बोझ उठा लिया हो।
"अब क्या?" मीरा ने फुसफुसाया।
मैंने उस आधे जले पन्ने को अपनी जेब में डाला, और खाते के बाकी पन्नों को रुमाल में लपेटकर शालिनी की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये तुम रखो," मैंने कहा। "ये तुम्हारे पापा का खाता है।"
वो काँपती उँगलियों से रुमाल ले गई।
"और अब?" उसने कहा।
"अब हम बाहर निकलते हैं," मैंने कहा, "और सुबह दस बजे से पहले ये खाता उस मेज़ पर रखना है जिसके पीछे चंद्रेश बैठता है। और उस वक़्त तुम्हारे साथ सिर्फ़ तुम्हारी ज़ुबान नहीं होनी चाहिए।"
"तो क्या होना चाहिए?"
मैंने गोदाम के आख़िरी कोने में रखी लालटेन की तरफ़ देखा, जो अभी भी जल रही थी और जिसकी रोशनी दीवार पर पड़ रहे उन पुराने पोस्टरों को ऐसे दिखा रही थी जैसे वो सब अभी भी मौजूद हों।
"तुम्हारे पापा का नाम," मैंने कहा। "और उस नाम के नीचे ये सवाल — कि इस ज़मीन पर 'भारद्वाज' किसने जोड़ा, और जोड़ने वाले का नाम पूरा क्यों नहीं लिखा गया।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
और इस बार उसकी आँखों में वो सवाल नहीं था जो थाने में था।
इस बार उसमें वो चीज़ थी जो बंद दरवाज़े के पीछे पहली बार खुलती है — माफ़ी की नहीं, अब जवाब की भूख।
हम गोदाम से बाहर निकले।
पीछे, लकड़ी की मेज़ पर, खाते की जगह अब सिर्फ़ एक चौकोर धूल-रहित जगह बची थी।
और उस जगह के ठीक ऊपर, मेरी जेब में, वो आधा जला पन्ना था, जिस पर एक नाम पूरा था और दूसरा आधा।
घंटी ने जेब के अंदर धीरे से एक बार हिलकर कहा, इतना धीमे कि शायद मैंने ही सुना —
"अब दूसरा आधा।"
बाहर गली में हवा चल रही थी, और गेट के बाहर खड़ी स्कूटर पर धूल की पतली परत बैठ गई थी।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"सुबह दस बजे," मैंने कहा।
"सुबह दस बजे," उसने कहा।
और हम गली के मोड़ की तरफ़ चल पड़े, जहाँ पीपल की छाया अंधेरे में और बड़ी लग रही थी।
॥
गली के मोड़ पर पहुँचते-पहुँचते रात का वो आख़िरी हिस्सा भी हमारे साथ चल रहा था, जैसे कोई हमारे पीछे-पीछे आ रहा हो और जान-बूझकर पैरों की आवाज़ न कर रहा हो।
शालिनी ने रुमाल में लिपटा खाता सीने से लगा रखा था। मीरा ने कैमरा बैग के अंदर कर दिया था। उस्ताद चुप थे, और उनका चुप रहना मुझे हमेशा से एक पूरे भाषण जैसा लगता है।
"कल सुबह दस बजे," शालिनी ने फिर कहा। तीसरी बार। मुझे लगा वो खुद को याद दिला रही है, मुझे नहीं।
"दस बजे," मैंने कहा। "पर उससे पहले एक काम है।"
"क्या?"
"उस काग़ज़ को देखने वाले को पता होना चाहिए कि वो अकेला नहीं है। अकेला आदमी बात करते-करते डर जाता है। भीड़ में खड़ा आदमी नहीं डरता।"
उस्ताद ने पहली बार उस रात कुछ कहा। "भीड़ नहीं, गली," उन्होंने कहा। "भीड़ को कोई भी बुला लेता है। गली को बुलाना पड़ता है।"
और फिर वो अपनी दुकान की तरफ़ मुड़ गए, बिना मुझसे कुछ और पूछे।
घर पहुँचा तो माँ जाग रही थीं। स्टोव पर चाय नहीं थी, बस एक बर्तन में पानी गरम हो रहा था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, मेरी जेब की तरफ़ देखा, और कुछ नहीं पूछा।
बस इतना कहा, "कुछ खा ले।"
"माँ, सुबह जल्दी उठना है।"
"तो उठ जाना।" उन्होंने कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी। "भूखा आदमी सुबह-सुबह सिर्फ़ गुस्सा करता है, दिमाग़ नहीं।"
मैं हँस पड़ा। थकान में हँसी अजीब लगती है, जैसे किसी और की आवाज़ निकल रही हो। माँ ने मेरा सिर देखा और कहा, "कल तेरी आँखों में जो था, वो आज नहीं है।"
"क्या था?"
"डर।" वो उठ गईं। "आज सिर्फ़ ज़िद है। और ज़िद वाला आदमी या तो बहुत बड़ा काम करता है, या बहुत बड़ी गलती।"
रात में मैंने घंटी तकिये के नीचे नहीं रखी। मैंने उसे अपने सीने पर रखा, जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी खिलौने की गाड़ी अपने पास रखता है। वो ठंडी थी, पर उस ठंडक में अब वो चुभन नहीं थी जो पहले थी। अब वो ऐसी थी जैसे बर्फ़ पिघलने से पहले आख़िरी बार साँस ले रही हो।
सुबह छह बजे मैंने टिंकू के घर की तरफ़ सीटी बजाई। वो सीटी हमारी पुरानी भाषा है। टिंकू उसे सुनकर खिड़की से सिर निकालता है, और अगर उसकी माँ पीछे खड़ी हों तो वो सिर अंदर करके कुछ देर बाद निकलता है, जैसे मासूम बच्चा सुबह की हवा लेने निकला हो।
आज वो सीधा निकला। हाथ में एक टाट का थैला था, जिसे वो ऐसे पकड़े था जैसे उसमें सोना हो।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने रात भर सोचा, और फिर सो गया। पर उठते ही सब तैयार था।"
"क्या तैयार था?"
उसने थैला खोला।
उसमें रस्सी थी। सफ़ेद चाक की एक डिब्बी थी। टूटा आईना था, जो अब भी किनारे से पकड़ने पर उँगली काट सकता था। और एक पुराना कार्डबोर्ड था, जिस पर किसी बच्चे ने कभी कार्टून बनाया था और जिसका आधा हिस्सा बारिश से फूल गया था।
"ये किसलिए?" मैंने पूछा।
"रस्सी," उसने गिनाना शुरू किया, "दो जगह के बीच का फ़ासला नापने के लिए। आईना, कोने से देखने के लिए — सीधे सिर निकालो तो पकड़े जाओ। कार्डबोर्ड, अगर कुछ लिखना पड़े या किसी का चेहरा छिपाना पड़े।"
मैंने उसे देखा।
"और सफ़ेद चाक?"
"वो सबसे ज़रूरी है, उस्ताद।" उसने गंभीरता से कहा। "जो जगहें हम देखेंगे, वहाँ चाक से निशान लगाएँगे। और अगर कोई हमें पकड़े, तो हम कहेंगे कि हम रास्ता भूल गए थे और रास्ता याद रखने के लिए चाक से निशान बना रहे थे।"
"तूने ये सब सोचा?"
"मैंने ये सब सुना है।" उसने कंधे उचकाए। "बड़े लोग जो करते हैं, वही बच्चे बाद में खेल में करते हैं।"
मुझे उस पर हँसी आई, पर अंदर से डर भी लगा। ये बच्चे जितने छोटे हैं, उतना ही वो चीज़ें पकड़ लेते हैं जो हम बड़े अपनी थकान में छोड़ देते हैं।
सात बजे मैंने बाकी टोली को पीपल के नीचे बुलाया।
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