The Mysterious Bell – Chapter 1046
किशनलाल। नसीमा बाई। भोला प्रसाद। रमेश भाई।
"और ये रकमें?" शालिनी ने कहा।
"ये रकमें नहीं हैं," उस्ताद ने कहा। "ये तारीख़ें हैं। देखो, हर रकम के आगे एक तारीख़ है, और तारीख़ के आगे एक अक्षर। कहीं य, कहीं पू, कहीं बा।"
"य मतलब यादव," मैंने कहा। "पू मतलब पूरा। बा मतलब बाक़ी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू तेज़ हो गया है," उन्होंने कहा।
"डर के मारे," मैंने कहा।
मीरा हर पन्ने की फोटो ले रही थी। उसकी फ्लैश छोटी थी, और हर फोटो के साथ गोदाम में एक सफ़ेद झटका चलता था।
और उसी सफ़ेद रोशनी में मुझे एक चीज़ दिखी।
मेज़ के कोने पर, धूल में, एक घड़ी पड़ी थी।
पुरानी घड़ी। चमड़े का पट्टा, मुड़ा हुआ, और काँच पर एक बाल जितनी दरार।
शालिनी ने उसे देखा।
उसका हाथ रुक गया। कैमरा वाले हाथ से उसने घड़ी उठाई, और अपनी कलाई पर रखकर देखा।
"ये पापा की है," उसने कहा।
उसकी आवाज़ बदल गई थी। अब वो वकील की आवाज़ नहीं थी। अब वो बेटी की आवाज़ थी।
"पापा इसे कभी नहीं उतारते थे," उसने कहा। "इस घड़ी ने मेरे पूरे बचपन में चलते रहना, बंद होना, फिर चलना — सब देखा है। और आख़िरी बार जब मैं इन्हें देखने आई थी, पापा ने इसे उतारकर मेज़ पर रख दिया था और कहा था — बेटी, ये घड़ी अब मेरे काम की नहीं है।"
वो चुप हो गई।
गोदाम में सिर्फ़ मीरा के कैमरे की हल्की सी घरघराहट बची थी, और दूर कहीं पानी के टपकने की आवाज़।
मैं उसके पास गया।
"वो क्यों बोले थे?"
शालिनी ने घड़ी को हथेली में बंद किया।
"क्योंकि उस दिन उन्होंने आख़िरी बार किसी काग़ज़ पर हस्ताक्षर किया था," उसने कहा। "और उसके बाद उन्होंने सब कुछ बंद कर दिया। प्रेस, दुकान, अपना नाम। मुझे तब लगा था कि वो हार गए हैं। बाद में समझ आया कि वो हारे नहीं थे। वो बस डर गए थे। और मैं उनके डर को उनकी कमज़ोरी समझती रही।"
उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ उन लोगों की आवाज़ में होती है जो किसी को बहुत पहले खो चुके हैं और आज भी उससे बहस कर रहे हैं।
मैंने कुछ नहीं कहा।
उस्ताद ने अपनी झोली से एक छोटी लालटेन निकाली, जलाई, और गोदाम के कोने में रख दिया। रोशनी बढ़ी तो दीवारों पर पुराने पोस्टर दिखे, जिन पर शादी के कार्ड, दुकान के बिल और स्कूल के फ़ॉर्म के नमूने छपे थे। सब फीके, सब धूल में।
"मैं एक बात कहूँ?" मैंने शालिनी से कहा।
"कहो।"
"तुम अपने पापा से आज भी नाराज़ हो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"मैंने तुम्हें दो बार देखा है," मैंने कहा। "एक बार थाने में, जब तुमने कहा कि तुम्हारे पापा सात अंगूठों वाला काग़ज़ ढूँढते हुए मरे। और दूसरी बार अभी, जब तुमने ये घड़ी हाथ में ली। दोनों बार तुम्हारी आवाज़ में सवाल था, गुस्सा नहीं। तुम पूछना चाहती हो कि वो मुझे साथ क्यों नहीं ले गए।"
शालिनी ने घड़ी को जेब में रख लिया।
"मैं वकील हूँ," उसने कहा। "मैं सवाल पूछकर पैसे कमाती हूँ।"
"और यहाँ पैसे नहीं हैं," मैंने कहा। "यहाँ सिर्फ़ एक बेटी है जो अपने पापा से एक बात पूछना चाहती है और वो कभी जवाब नहीं देते।"
मीरा ने हल्के से मेरी तरफ़ देखा, जैसे कहे — बस, ज़्यादा मत बोल।
पर मैं रुका नहीं। मैं था भी कहाँ रुकने वाला?
"मैंने बाईस साल अपने पापा से बात नहीं की," मैंने कहा। "बाईस साल। तुम सोचोगी कि ये बहुत लंबा वक़्त है। पर सच ये है कि इतने सालों में मैंने जितनी बार उनसे बोलने की सोची, उतनी बार मुझे लगा कि पहले वो बोलें। और उन्हें लगा कि पहले मैं बोलूँ। और बीच में जो खाली जगह बची, वो किसी ने नहीं भरी। वो हम दोनों के बीच पड़ी रही, और मैं उसे सिर्फ़ मेज़ पर रखी काग़ज़ों की तरह देखता रहा।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"और अब?"
"अब मैं उस खाली जगह को काग़ज़ समझकर उठा लेता हूँ," मैंने कहा। "क्योंकि वो काग़ज़ नहीं है। वो मैं हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। न हाथ मिलाने के लिए, न हिम्मत देने के लिए। बस।
"माफ़ी माँगने से कोई कमज़ोर नहीं होता," मैंने कहा। "कमज़ोर वो होता है जो सारी उम्र ये सोचता रहता है कि माफ़ी किसने पहले माँगनी चाहिए।"
शालिनी ने पहली बार मुस्कुराने की कोशिश की।
बहुत छोटी-सी। होंठों के एक कोने पर। पर वो थी।
"तुम अजीब आदमी हो," उसने कहा।
"मैं साइकिल मिस्त्री हूँ," मैंने कहा। "अजीब तो हूँ ही।"
उस्ताद ने हल्की खाँसी बनाई और मेज़ की तरफ़ इशारा किया।
"बातें बाद में," उन्होंने कहा। "पहले ये देखो।"
उन्होंने खाते के आख़िरी बचे हुए पन्ने की तरफ़ उँगली रखी।
वो पन्ना आधा जला हुआ था। ऊपर का हिस्सा राख में बदल चुका था, और नीचे का हिस्सा बचा था। जले किनारे पर स्याही फैली हुई थी, जैसे किसी ने पन्ने को जलते हुए पानी में डुबो दिया हो।
पर जो बचा था, वो साफ़ पढ़ा जा सकता था।
एक नंबर था।
"ये ज़मीन का नंबर है," शालिनी ने कहा। उसकी आवाज़ फिर वकील वाली हो गई थी। "मैंने ऐसे नंबर दफ़्तारों में हज़ार बार देखे हैं।"
"कौन सी ज़मीन?" मैंने पूछा।
उसने पन्ने को करीब किया। उसकी उँगली जले किनारे के ऊपर घूमी।
"यहाँ लिखा है," उसने कहा, "यह ज़मीन नूर अस्पताल के नाम पर है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा सा हुआ।
"नूर अस्पताल," मैंने दोहराया।
"हाँ। और ये बाईस साल पुराना हिसाब है, अंकुश। ये वो हिसाब है जिसमें हर गली के आदमी का नाम है और हर नाम के आगे अस्पताल का हिस्सा।"
उस्ताद ने पन्ने को अपनी तरफ़ घुमाया।
और फिर उनका चेहरा बदला।
"यहाँ कुछ और है," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"नीचे," उन्होंने कहा। "बहुत नीचे। कोने पर।"
मैंने लालटेन उठाई और पन्ने के उस कोने पर रोशनी डाली।
वहाँ, स्याही की एक पतली लकीर के नीचे, दो शब्द लिखे थे।
"यह ज़मीन नूर अस्पताल के नाम पर है।"
और उसके नीचे।
उसके नीचे, वही लाइन अभी भी खत्म नहीं हुई थी।
किसी ने उसे आगे बढ़ाया था।
एक दूसरी स्याही से। गाढ़ी, काली, और साफ़। और वो जले किनारे से बची हुई थी, जैसे उसे बहुत बाद में, जब पन्ना जल चुका था, किसी ने जोड़ा हो।
"भारद्वाज"।
बस एक शब्द।
पर वो शब्द पढ़ते ही शालिनी की साँस रुक गई।
"यह…" उसने कहा, और फिर रुक गई।
मीरा ने कैमरा करीब किया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "ये लाइन नीचे लिखी है — 'यह ज़मीन नूर अस्पताल के नाम पर है और भारद्वाज के नाम पर भी है'। पर 'नूर अस्पताल' वाला हिस्सा बाईस साल पुराना है, और 'भारद्वाज' वाला हिस्सा नया है।"
"कितना नया?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने पन्ने को उँगली से सहलाया।
"इतना नया," उन्होंने कहा, "कि स्याही अभी चमक रही है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो अभी भी ठंडी थी। भारी थी। उस पर मेरे नाम के ऊपर वो काली लकीर अभी भी थी।
पर जैसे ही मैंने उस पन्ने पर हाथ रखा, घंटी में एक झुरझुरी सी हुई।
बहुत छोटी। एक पल के लिए।
और फिर उसने कहा, दो शब्द।
"नाम आधा।"
मैंने उसे हथेली पर रखकर देखा।
"नाम आधा?" मैंने कहा।
कोई जवाब नहीं आया।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "इसका मतलब तू समझ रहा है?"
"मैं समझ रहा हूँ कि इस ज़मीन पर दो नाम लिखे गए थे," मैंने कहा। "एक ज़ाहिर में, एक छुपा हुआ। और छुपा हुआ नाम बाद में जोड़ा गया, ताकि कोई ये न कह सके कि ज़मीन कभी अस्पताल की नहीं थी।"
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