The Mysterious Bell – Chapter 1043
वो कैसा लगता है — ये मैं किसी को नहीं बता सकता। ये ऐसा है जैसे किसी कमरे में तू जाता है और तुझे लगता है कि इस कोने में कुछ रखा था। कुछ था यहाँ। कोई था यहाँ। पर तुझे नाम याद नहीं आता, चेहरा याद नहीं आता, और जब तू बहुत ज़ोर लगाता है तो सिर्फ़ एक खालीपन बचता है, जो तेरे सीने में बैठकर हर वक़्त एक ही बात कहता है — कुछ खो गया है। कुछ खो गया है।
मैंने घंटी धीरे से वापस जेब में रखी।
और मेरे हाथ से एक आवाज़ निकली, जो मुझे पसंद नहीं आई — एक थकी हुई, हारी हुई आवाज़।
"तो फिर क्या करें?" मैंने कहा। "उसका अब्बा मर जाए? ये काग़ज़ नीचे जाए, ये अँगूठा लग जाए, और डॉक्टर इसरानी को गली छोड़नी पड़े, और गली की सबसे पुरानी दवाखाना बिक जाए — और हम बैठे रहें क्योंकि हमारे पास एक शक्ति है जो हम इस्तेमाल नहीं कर सकते?"
मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"हम शक्ति इस्तेमाल करेंगे," उसने कहा। "पर गुस्से से नहीं। गुस्से से इस्तेमाल हुई हर चीज़ आख़िर में उसी की हो जाती है जो गुस्सा फैलाता है। तूने खुद मुझे ये सिखाया था।"
शकील हमारी बात सुन रहा था, और मुझे लगा कि वो समझ नहीं रहा। फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ में वो शांति थी जो बच्चों में तब आ जाती है जब उन्होंने अपना मन बना लिया हो।
"मैं अंगूठा लगा दूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"शकील—"
"मैंने सोच लिया है," उसने कहा। "मुझे नहीं पता डॉक्टर साहब अच्छे हैं या बुरे। मुझे ये भी नहीं पता कि ये काग़ज़ झूठा है या सच। मुझे बस इतना पता है कि अगर दवा रुकी, तो अगले हफ़्ते मेरे अब्बा यहाँ नहीं होंगे। और मेरे पास अंगूठे के सिवा कुछ नहीं है।"
गुमटी पर चुप्पी छा गई।
शबनम आपा चूल्हे के पास खड़ी थीं, पीठ हमारी तरफ़, और उनका हाथ चिमटी पर रुका हुआ था।
मैं उठा। मैंने अपनी कुर्सी खिसकाई, उसके सामने बैठा, और मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।
"शकील," मैंने कहा। "मैं तुझे एक बात कहता हूँ, और मैं ये बात तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा, क्योंकि मैं झूठ नहीं बोल सकता — मेरे पास एक चीज़ है, एक छोटी सी चीज़, जो कभी-कभी मरम्मत कर देती है। पर वो बिना वजह कुछ नहीं करती। वो मुफ़्त में कुछ नहीं देती।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तेरे अब्बा की दवा का रास्ता निकालूँगा," मैंने कहा। "मैं नहीं जानता कैसे। आज रात तक मुझे नहीं पता। पर मैं निकालूँगा। पर उसके लिए मुझे तुझसे एक चीज़ चाहिए।"
"क्या?"
"तू झूठ का हिस्सा नहीं बनेगा।"
उसकी आँखें फिर भर आईं।
"पर—"
"सुन," मैंने कहा। "जब कोई झूठ किसी के इलाज से जुड़ जाता है, तो फिर वो झूठ कभी अकेला नहीं रहता। कल वो तुझसे कहेगा — अब एक और काग़ज़ पर अंगूठा लगा। फिर कहेगा — अब चुप रह। फिर कहेगा — अब अपने दादा को भी ले आ। और एक दिन तू खुद उस काग़ज़ में लिखा हुआ होगा जिस पर कोई और अंगूठा लगा रहा है। तेरे अब्बा की दवा के पैसे उस दिन शायद आ रहे होंगे, पर तेरे हाथ में सिर्फ़ एक अंगूठा बचेगा जो हर महीने किसी और का होता जाएगा।"
वो रोया।
सच में रोया, बिना छिपाए, दोनों हाथों से मुँह ढँककर, और शबनम आपा ने मुँह फेर लिया और चिमटी उठाकर तवे पर पटक दी, बहुत ज़ोर से, जैसे उन्हें कुछ तोड़ना था और तोड़ने को कुछ और नहीं मिला।
मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"तेरे अब्बा का नाम क्या है?" उसने पूछा।
"सलीमुद्दीन," उसने कहा, रोते हुए। "पर सब उन्हें सल्लू चाचा कहते हैं।"
"तो अब सल्लू चाचा की दवा हमारी ज़िम्मेदारी है," मीरा ने कहा। "और मैं तुझे एक बात बता दूँ — मैं पत्रकार हूँ। मैंने पाँच साल पहले एक आधी सच खबर छापकर एक घर बिखेर दिया था। मैं वो गलती दोबारा नहीं करूँगी। इसलिए मैं तुझसे वादा नहीं कर रही कि सब ठीक हो जाएगा। मैं सिर्फ़ इतना कह रही हूँ कि जब तक सच नहीं मिलता, मैं उस काग़ज़ को छापूँगी नहीं और किसी को नहीं दिखाऊँगी।"
शकील ने हाथ नीचे किए।
"तो मैं क्या करूँ?" उसने पूछा। "मुझे कल अंगूठा लगाने को कहा गया है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे मेज़ पर रख दिया।
"तू कल अंगूठा लगाने जाएगा," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, चौंककर।
"अंकुश—"
"तू जाएगा," मैंने कहा, "पर उस काग़ज़ पर नहीं।"
शकील ने सिर उठाया।
"मुझे वो लिफ़ाफ़ा दे दे," मैंने कहा। "और वो पाँच सौ रुपये भी। मैं उस काग़ज़ की जगह एक और काग़ज़ रखूँगा — एक जैसा दिखने वाला, एक जैसा मोड़ा हुआ, एक जैसी स्याही। और उस पर तेरा अंगूठा नहीं, कुछ और होगा।"
"क्या?"
"एक सवाल," मैंने कहा। "शिकायत की जगह एक सवाल, जिसे पढ़कर वो आदमी खुद कहेगा कि यह काग़ज़ उसका नहीं है।"
शबनम आपा ने पलटकर देखा।
और फिर उन्होंने कहा, बहुत शांत आवाज़ में, "काग़ज़ बदलने का काम तेरा नहीं है, अंकुश। काग़ज़ बदलने का काम उसका है। तेरा काम है कि तू उसके हाथ में वो काग़ज़ दे जिसे उसने खुद बनाया हो।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मतलब?" मैंने कहा।
उन्होंने चिमटी नीचे रखी और आकर मेज़ के किनारे पर खड़ी हो गईं।
"मतलब ये कि अगर तू उसकी जगह अपना काग़ज़ रखेगा, तो झूठ तेरे खाते में जाएगा," उन्होंने कहा। "और तेरे खाते में झूठ की जगह नहीं है। पर अगर वो आदमी खुद अपने हाथ से एक काग़ज़ दे और वो काग़ज़ पकड़ा जाए, तो फिर वो जाल उसी की गर्दन पर आ जाता है।"
मीरा ने धीरे से कहा, "दूसरी तरफ़ से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"घंटी ने यही कहा था," उसने कहा। "दूसरी तरफ़ से। यानी हम जिस तरफ़ से सोच रहे हैं, वो गलत तरफ़ है।"
मैंने उस लड़के की तरफ़ देखा, जो अब भी रोया हुआ बैठा था, अपनी फटी कमीज़ में, अपने अंगूठे को देखता हुआ।
"शकील," मैंने कहा। "तेरे अब्बा का इलाज मुझ पर। मैं तुझसे वादा नहीं कर रहा कि सब आसान होगा। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तेरे अब्बा की दवा को किसी के अंगूठे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ ऐसा हुआ जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — उसने मेरी बात पर यक़ीन किया।
बारह साल का लड़का, जिसके पास कुछ नहीं था, जिसका बाप अस्पताल में था, जिसके दादा की आँखें जा रही थीं, उसने एक साइकिल ठीक करने वाले की बात पर यक़ीन किया।
मुझे उस वक़्त ऐसा लगा कि मैं उस यक़ीन के क़ाबिल नहीं हूँ।
मैं उठा और बाहर गया और मैंने आसमान की तरफ़ देखा और मैंने धीरे से कहा, "यार, अगर तू सुन रहा है, तो आज रात कुछ ऐसा कर जो मेरे बस में न हो।"
घंटी मेरी जेब में एक बार हिली।
और उसका जवाब सिर्फ़ तीन शब्द था।
"पहले नाम।"
शाम को उस्ताद की दुकान पर पाँच लोग बैठे थे।
मैं, मीरा, उस्ताद, कौशल्या और मंसूर चाचा। बाहर टिंकू पहरा दे रहा था, जो अब उसका पक्का काम हो गया था।
मैंने सबको शकील की बात सुनाई। लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था, पर खुला नहीं। शकील के जाने के बाद मैंने उसे फिर बंद कर दिया था, जैसे उसमें जो लिखा है वो अभी पढ़ने लायक न हो।
"नाम," कौशल्या ने कहा। "उसने पहले नाम कहा।"
"किसका नाम?" मीरा ने पूछा।
"जिसने शकील को ये लिफ़ाफ़ा पकड़ाया," उस्ताद ने कहा। "उसका नाम। सफ़ेद कुर्ते वाले का। क्योंकि जब तक नाम नहीं जानते, तब तक यह काग़ज़ सिर्फ़ एक काग़ज़ है। और जब नाम आ जाए, तो यह गवाही बन जाता है।"
मंसूर चाचा ने अपनी लाठी मेज़ के सहारे टिकाई।
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