The Mysterious Bell – Chapter 1042
"देखो," मीरा ने कहा, "एक लड़का, बारह-तेरह साल का, पतला, फटी कमीज़, साथ में एक बूढ़ा दादा जिसके हाथ में पुरानी परची है। कहीं सफ़ेद लिफ़ाफ़ा न दिख जाए, बस लड़के को देखो।"
टिंकू की आँखें चमकीं। "यानी मुझे गवाह ढूँढना है।"
"हाँ।"
"मैं सबसे पहले गवाह ढूँढने वाला लड़का बनूँगा," उसने कहा और भीड़ में घुस गया।
सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों पहले से भीड़ की आड़ में घूम रहे थे। टिंकू ने इशारा किया और चारों चार दिशाओं में बिखर गए, जैसे गली के जासूसों की कोई पुरानी सेना हो।
मैं वहीं खड़ा रहा और घंटी को हथेली में दबाए रखा।
वो ठंडी होने का नाम नहीं ले रही थी।
तीन मिनट बाद टिंकू लौटा, हाँफता हुआ। "मिल गया। दवा की खिड़की के पास खड़ा है। दादा के साथ। और दादा उससे कुछ पूछ रहे हैं, और वो लड़का बार-बार जेब दबा रहा है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चलो," उसने कहा।
हमने उसे वहीं घेरा नहीं। हमने उसका रास्ता नहीं रोका। हम बस उसकी तरफ़ चले, धीरे, ऐसे जैसे कोई गली में किसी के घर जाता हो, न कि किसी को पकड़ने।
वो हमें देखकर सिटकर रुक गया।
उसका दादा उसकी तरफ़ झुका, कुछ कहा, और फिर अस्पताल की सीढ़ी की तरफ़ बढ़ गया, धीरे-धीरे, घुटने सँभालते हुए।
लड़का वहीं खड़ा रह गया। अकेला।
"तेरा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
उसने होंठ हिलाए, आवाज़ नहीं निकली।
"मेरा नाम अंकुश है," मैंने कहा। "मैं यहीं की गली में साइकिल ठीक करता हूँ। तू घबरा मत। मैं कुछ पूछने नहीं आया — मैं बस चाय पिलाने आया हूँ। तूने आज सुबह से कुछ खाया है?"
उसकी आँखें भर आईं। वो फिर भी कुछ नहीं बोला।
मीरा आगे आई और उसके सामने झुक गई। उसने कैमरा कंधे से उतारकर पीछे कर दिया, और बहुत धीरे से कहा —
"सुन। अगर तेरे अब्बा की दवा बंद हो गई, तो सबको पता चलना चाहिए। इसीलिए नहीं कि हम किसी को बदनाम करना चाहते हैं। इसीलिए कि जो दवा किसी के ज़िंदा रहने की वजह है, वो किसी की जेब में बंद नहीं रह सकती।"
लड़के ने उसकी तरफ़ देखा।
और उसकी आँखों से आँसू निकल आए, चुपचाप, बिना किसी आवाज़ के, जैसे वो रोना भी नहीं चाहता हो।
"शकील," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "मेरा नाम शकील है।"
शबनम आपा की गुमटी उस वक़्त खाली थी।
लोग अस्पताल में थे। गुमटी का चूल्हा बंद था, बेंच खाली पड़ी थी, और पीतल की थाली मेज़ पर उलटी रखी थी। शबनम आपा ने हमें देखा और बिना कुछ पूछे चूल्हा जलाने लगीं।
"एक कटोरी," मैंने कहा।
"तीन जलेबियाँ," उन्होंने कहा, "और चुपचाप बैठ। जो बात हो, हो जाए।"
हम बेंच पर बैठे। शकील बीच में। उसके घुटने हिल रहे थे। उसने हाथ जेब पर रखा और फिर हटा लिया, जैसे जेब उसकी नहीं, किसी और की हो और वो उसे छूने से डरता हो।
शबनम आपा ने गरम कुल्हड़ रखा। शकील ने दोनों हाथों से पकड़ा और उँगलियाँ जल गईं, फिर भी उसने नहीं छोड़ा।
"तेरे अब्बा कौन से बेड पर हैं?" मीरा ने पूछा।
"ऊपर, पाँचवें बेड पर," उसने कहा। "साँस की दवा चल रही है। डॉक्टर इसरानी कहते हैं कि दवा रुकी तो दो दिन में हालत बिगड़ेगी।"
"और दवा रुकी है?"
"काग़ज़ साफ़ नहीं है," उसने कहा, जैसे वो लाइन उसने सौ बार दोहराई हो। "काग़ज़ साफ़ होने तक रुकी है।"
मैंने कुल्हड़ मेज़ पर रखा।
"शकील," मैंने कहा, "तेरी जेब में जो है, मुझे दिखा।"
वो सिटकर उठा। "मैंने कुछ नहीं—"
"मैं तुझे पकड़ नहीं रहा," मैंने कहा। "मैंने अपनी आँखों से देखा है। मैं तुझे सिर्फ़ बता रहा हूँ कि मैंने देखा है। अब तुझे जो करना है, कर।"
वो खड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे बैठ गया और धीरे-धीरे अपनी जेब से सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकालकर पीतल की थाली पर रख दिया।
लिफ़ाफ़े पर कोई नाम नहीं था। ऊपर एक आधी गोल मोहर थी, हल्की नीली, जिसका आधा हिस्सा ही छपा था, जैसे मोहर किसी दूसरे काग़ज़ पर भी लगी हो और यहाँ सिर्फ़ उसका किनारा आया हो।
मैंने उसे खोला।
अंदर दो चीज़ें थीं।
पहली — पाँच सौ रुपये, चार हिस्सों में मोड़े हुए, लोहे की पिन से जोड़े हुए।
और दूसरी — एक काग़ज़।
मैंने वो काग़ज़ खोला।
उस पर छपी हुई लिखाई थी, साफ़, जैसे किसी दफ़्तर में टाइप हुई हो। और उसमें लिखा था कि डॉक्टर निहाल इसरानी मरीज़ों से नीचे-ऊपर पैसे लेकर भारद्वाज ट्रस्ट की दवा और ज़मीन के काग़ज़ छिपाते हैं, कि उन्होंने जान-बूझकर दवा की खेप रोकी है, कि वो इस अस्पताल को अपनी जागीर समझते हैं और मरीज़ों को धमकाते हैं।
और सबसे नीचे, एक खाली जगह थी।
स्याही की गोली जैसी खाली जगह, जहाँ अंगूठा लगता है।
मैं वो काग़ज़ हाथ में लेकर बैठा रहा और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे हाथ में कोई ज़िंदा चीज़ है जो मुझे काट रही है।
शकील ने बहुत धीमे से कहा, "दो रोज़ पहले एक आदमी आया था। सफ़ेद कुर्ता। कहने लगा — तेरे अब्बा की दवा, तेरी माँ का इलाज, तेरे दादा की आँखों का ऑपरेशन — सब इस एक अंगूठे पर टिका है। पाँच सौ अभी, और अंगूठा लग जाने के बाद दवा पूरे महीने चलेगी। और शिकायत में तेरा नाम भी नहीं आएगा। तू बस अंगूठा लगाएगा।"
"और तूने हाँ कह दिया?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो सब था जो बारह साल का लड़का कभी ज़ुबान पर नहीं लाता।
"मेरे अब्बा दवा के बिना नहीं रह सकते," उसने कहा।
मेरे अंदर कुछ हिला।
वो गुस्सा नहीं था।
वो कुछ और था — वो पुराना, ठंडा, कसैला एहसास जो मेरे सीने में तब उठता है जब मैं देखता हूँ कि इस शहर में कोई भी चीज़ इंसान से बड़ी कर दी जाती है। पैसा नहीं। काग़ज़ नहीं। डर।
मैं जेब की तरफ़ गया। घंटी छुई।
वो गरम थी। इतनी गरम कि मेरी उँगली पर निशान छोड़ गई।
और मेरे दिमाग़ में एक ही बात आई — सौ अंक।
सच्ची ज़ुबान। सौ अंक। एक मिनट के लिए सामने वाला सिर्फ़ सच बोले।
अगर वो सफ़ेद कुर्ते वाला इस गुमटी पर आ जाए, अगर उसका नाम मेरे सामने आ जाए, अगर एक मिनट के लिए उसकी ज़ुबान खुल जाए, तो मैं पूरी गली के सामने साबित कर दूँ कि शिकायत किसकी है और अँगूठा किसका है —
मैंने घंटी हाथ में उठा ली।
मेरा अँगूठा उसके छल्ले पर था। आठवें पन्ने वाला निशान मेरे नाखून के नीचे दबा हुआ था।
और फिर मीरा का हाथ मेरे हाथ पर आ गया।
"नहीं," उसने कहा।
"मीरा—"
"नहीं, अंकुश।"
उसने घंटी मेरे हाथ से नहीं छीनी। उसने बस मेरी कलाई पकड़ ली, और उसकी पकड़ में एक अजीब-सी मज़बूती थी, जैसे वो किसी डूबते आदमी को किनारे पर खींच रही हो।
"याद है तुझे?" उसने कहा। "सौ अंक। एक मिनट का सच। और उसके बाद?"
"उसके बाद हम जीत जाएँगे।"
"नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "ये शक्ति रणवीर को नहीं तोड़ेगी। ये हमें तोड़ेगी। क्योंकि ये शक्ति किसी को नीचा दिखाने के लिए है, और तू जानता है कि जिस दिन तू किसी को नीचा दिखाने के लिए तंत्र उठाएगा, उसी दिन तेरी सबसे प्यारी याद ताले में बंद हो जाएगी।"
मैं खड़ा रहा। घंटी हाथ में गरम।
"एक और याद," उसने कहा, धीमे से। "एक और याद ताले में चली जाएगी, अंकुश। और उसके बाद तेरे पास सिर्फ़ ये एहसास बचेगा कि तूने कुछ खोया है, और तू याद भी नहीं कर पाएगा कि क्या खोया। तुझे पता है वो कैसा लगता है।"
मैं जानता था।
उफ़, मैं जानता था।
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