The Mysterious Bell – Chapter 1041
क्योंकि सही होने के लिए उन्हें मना करना पड़ेगा। और मना करने के लिए उन्हें ये सोचना पड़ेगा कि उनका बच्चा आज रात बुखार में तड़पेगा तो कहाँ जाएगा।
मैं कुछ कह ही नहीं पाया।
तभी मेरी बगल में एक हाथ आया।
डॉक्टर इसरानी का।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे धीरे से खींचा।
"आओ," उन्होंने कहा। "अंदर।"
हम पीछे हटे। मंच के पीछे, तंबू के पीछे, एक कोने में, जहाँ कोई नहीं था। वहाँ एक पुरानी बेंच थी, जिस पर धूल की मोटी परत थी। उन्होंने उसे बिना पोंछे पकड़ा और बैठ गए।
"मेरी बीवी," उन्होंने कहा।
"जी?"
"इसी अस्पताल में नर्स थी। बीस साल। इसी कमरे में बैठती थी। कहती थी — ये दीवार पीली रहेगी, यही इस अस्पताल की पहचान है। मैंने तुम्हारी माँ को यहीं जाँचा था, पहली बार। पंद्रह साल पहले।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम्हारी माँ की खाँसी," उन्होंने कहा, "बाईस साल पुरानी है। ये सिर्फ़ अस्पताल की इमारत नहीं है। ये उसकी साँस का हिसाब है। यहाँ उसकी फाइल है। यहाँ उसकी पुरानी रसीदें हैं। यहाँ वो परची है जो मैंने तुम्हारे पापा को दी थी जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे। अगर ये ज़मीन चली गई, तो ये हिसाब भी जाएगा।"
वो रुके। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे कमीज़ से पोंछा।
"मैं डर रहा हूँ, बेटा," उन्होंने कहा। "मगर मैं कलम नहीं चलाऊँगा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तुम्हें क्या पता?" उन्होंने पूछा, थोड़ी सख़्ती से।
"क्योंकि आपने कल कहा था कि जो डरने के बाद भी अपनी जगह पर खड़ा रहे, उसी को हिम्मत कहते हैं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर बहुत धीरे हँसे।
"ये तुम्हें किसने सिखाया?"
"आपने ही। पिछले महीने, तब जब आपने कहा था कि मैं दुकान नहीं चला रहा, रिश्ते जोड़ रहा हूँ।"
उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया। फिर उठे।
"काग़ज़ देने आएगा, तो मैं मना कर दूँगा। उसके बाद वो तुम्हारी तरफ़ आएगा। उस वक़्त तुम अपना काम करना।"
"मेरा काम क्या है?"
"जो तुम आज सुबह से कर रहे हो," उन्होंने कहा। "सवाल पूछना।"
जब हम वापस आए, भीड़ कुछ और घनी हो चुकी थी। कुछ लोग तंबू से बाहर जा रहे थे, कुछ अंदर आ रहे थे। रणवीर मंच पर वापस चढ़ गया था और एक नई ऐलान कर रहा था — "दोपहर में इन दो मशीनों के नाम फ़लाँ और फ़लाँ परिवार के नाम पर होगा"।
कैमरे फिर चले।
मैंने अपनी जगह ली — तंबू के किनारे पर, भीड़ के पीछे।
और तभी, बिल्कुल संयोग से, मेरी नज़र मंच के पीछे गई।
वहाँ एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता। हाथ में कोई काग़ज़ नहीं। बस खाली हाथ।
वो एक बूढ़े आदमी के पास आया, जिसके साथ एक लड़का खड़ा था। लड़का कोई बारह-तेरह साल का, पतला, छोटी फटी कमीज़ में। बूढ़े के हाथ में एक पुरानी परची थी।
उस सफ़ेद कुर्ते वाले ने बहुत धीरे से लड़के का कंधा थपथपाया।
और फिर, एक पल के लिए, उसका हाथ लड़के की जेब की तरफ़ गया।
मैंने देखा — जेब में सफ़ेद लिफ़ाफ़े का कोना घुसता हुआ।
बूढ़े ने नहीं देखा। लड़के ने देखा, और वो अपना सिर झुकाकर खड़ा रह गया, जैसे उसे अचानक बहुत शर्म आ गई हो।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो इतनी गरम थी कि मेरी हथेली जलने लगी।
"क्या है ये?" मैंने धीरे से कहा, बिना होंठ हिलाए।
और घंटी ने, पहली बार, पूरे तीन शब्द कहे।
"दूसरी तरफ़ से।"
मैंने मीरा को ढूँढा। वो कैमरे के पीछे खड़ी थी, मंच की तरफ़ रुख किए हुए।
मैंने उसका कंधा थपथपाया। "कैमरा इधर करो।"
"किधर?"
"मंच के पीछे। जहाँ आमतौर पर कोई नहीं देखता।"
उसने कैमरा घुमाया।
सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी अब लड़के से कुछ कह रहा था। धीरे से। बहुत धीरे से। लड़का सिर हिला रहा था, पहले ना में, फिर हाँ में।
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ पूछा।
और लड़के ने बहुत जल्दी जेब पर हाथ रखकर कहा — "कुछ नहीं दादा।"
तभी रणवीर की आवाज़ माइक पर गूँजी — "अब इन मरीज़ों के परिवार से एक छोटी-सी बात कहनी है। जिनको दवा चाहिए, उन्हें मेज़ पर आना है। नाम लिखवाना है। बस। कोई काग़ज़ नहीं। कोई अंगूठा नहीं।"
भीड़ हिली।
और मैंने देखा — वो लड़का उसी भीड़ में घुल गया, अपने दादा का हाथ पकड़कर, उस जेब को दबाए हुए जिसमें अभी कोई सफ़ेद लिफ़ाफ़ा गया था।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो कोने में खड़े थे, हाथ जेब में, आँखें मंच पर।
और जैसे उन्होंने सब समझ लिया हो, बिना मेरी तरफ़ देखे, उन्होंने बस इतना कहा:
"देख लिया?"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो अब पहला सवाल ये नहीं है कि वो क्या दे रहा है," उन्होंने कहा। "पहला सवाल ये है कि वो किसके हाथ में क्या रखवा रहा है।"
मैंने घंटी को फिर हथेली में भींचा।
वो अब भी गरम थी।
और उसके ऊपर, उस सुबह, आठवें पन्ने वाला निशान, साफ़ दिख रहा था — जैसे कोई उसे नाखून से खुरचकर बता रहा हो कि आज का असली दान, इस भीड़ के बीच, किसी की जेब में हो रहा है।
मैंने मीरा से कहा, "वो लड़का। जो दादा का हाथ पकड़कर गया। उसे ढूँढो।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "आज के इस मंच पर जो सबसे ज़रूरी गवाह है, वो मंच पर नहीं खड़ा। वो उस भीड़ में खड़ा है, अपनी जेब दबाए हुए।"
और तभी, मंच से रणवीर की आवाज़ आई:
"और हाँ, एक बात। आज के इस कार्यक्रम का पूरा हिसाब — कौन आया, कौन गया, किसने क्या लिया — सब लिखा जाएगा। काग़ज़ पर नहीं, किताब में। सब पारदर्शी।"
भीड़ ने तालियाँ बजाईं।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उस काग़ज़ को टटोला जिस पर रात में मैंने "जानता हूँ" लिखा था।
मैंने उसे निकाला। उसे देखा।
और बिना किसी को दिखाए, उस पर और नीचे, उसी पेंसिल से, एक और लाइन लिख दी:
"अब जानता हूँ।"
॥
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और भीड़ में आँखें दौड़ाईं।
अस्पताल का आँगन उस वक़्त किसी मेले जैसा लग रहा था। मंच के नीचे लोगों की तीन कतारें लगी थीं — एक कतार मशीनें देखने वालों की, एक दवा का नाम लिखवाने वालों की, और एक वो कतार जो सिर्फ़ खड़ी थी, कुछ नहीं माँग रही थी, बस देख रही थी कि आज यहाँ क्या हो रहा है।
मेज़ पर बैठा रणवीर का लड़का हर आदमी का नाम एक मोटी कॉपी में लिख रहा था। और उसके बगल में एक और लड़का था, जो हर नाम के आगे एक नंबर लिखकर टोकन जैसा काग़ज़ दे रहा था। भीड़ में से कोई कह रहा था — "साहब ने सच में दिल खोल दिया।" कोई कह रहा था — "दवा महीने भर में आ जाएगी।"
मैंने मुड़कर देखा।
माँ अस्पताल की खिड़की पर खड़ी थीं। दूर से दिख रही थीं, पतला हाथ, साड़ी का पल्लू कमर में। उनके हाथ में वही स्टील का डिब्बा था।
डॉक्टर इसरानी गेट के पास खड़े थे, हाथ पीछे बँधे। काजल उनके बगल में थी, सफ़ेद कोट में, गले में स्टेथोस्कोप। उसका चेहरा कह रहा था कि वो अंदर से काँप रही है और बाहर से पत्थर बनी खड़ी है।
और उस्ताद — कोने में, पीपल की छाया जैसे, हाथ जेब में, आँखें मंच पर।
मैंने मीरा का कोहना पकड़ा।
"वो लड़का," मैंने कहा। "जो दादा का हाथ पकड़कर भीड़ में घुला। उसे ढूँढना है।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया। "भीड़ में से कोई भी निकल सकता है, अंकुश। इस आँगन में इस वक़्त तीन सौ लोग हैं।"
"तो तीन सौ में से एक निकालो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और फिर वो वाली नज़र डाली जो वो तब डालती है जब वो समझ जाती है कि बहस करने का वक़्त नहीं है।
"टिंकू," उसने कहा।
टिंकू दौड़कर आया। उसने अपना कार्डबोर्ड का माइक कंधे पर टाँग रखा था, जैसे कोई पुराना हथियार हो।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno