The Mysterious Bell – Chapter 1040
और सबसे आगे, एक सफ़ेद गाड़ी से, उतरा रणवीर भारद्वाज।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद पायजामा। चमकते जूते। गले में माला, जो किसी ने पहनाई थी। और चेहरे पर वो मुस्कान, जो मुझे हर बार ऐसे लगती है जैसे कोई दरवाज़ा खुला है — और उसके पीछे कोई और दरवाज़ा है।
उसने मंच पर चढ़ते हुए हाथ जोड़े।
कैमरे चले। फ्लैश जले।
"ये मोहल्ला मेरा नहीं है," उसने कहा, आवाज़ में वो नरमी जो वो सिर्फ़ माइक के सामने लाता है। "ये मोहल्ला मेरे बड़ों का है। मेरे बाप ने इसी गली में साइकिल ठीक की थी। मैं यहाँ का हूँ। और जो अपना होता है, वो अपने के लिए कुछ करता है।"
भीड़ में तालियाँ बजीं। कुछ लोगों ने बजाईं। ज़्यादातर ने नहीं।
"आज मैं इस अस्पताल को दो नई मशीनें दे रहा हूँ। दस नए बेड दे रहा हूँ। तीन महीने की दवा दे रहा हूँ। और मेरी एक ही शर्त है — ये अस्पताल चलता रहे। मरीज़ आते रहें।"
मीरा मेरे कान के पास आई। "देखा? कितना साफ़ शब्द है — मरीज़ आते रहें।"
"हाँ," मैंने कहा। "मरीज़ आते रहें। ज़मीन उसके नाम हो जाए, फिर मरीज़ों का क्या…"
मैंने बात अधूरी छोड़ दी, क्योंकि तभी मेरी नज़र डॉक्टर इसरानी पर पड़ी।
वो सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे।
धीरे। सीधे। अपने घिसे सफ़ेद कोट में। उनके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई कलम नहीं थी। बस वो खुद थे।
रणवीर ने उन्हें देखा और मुस्कुराहट चौड़ी कर ली।
"आइए डॉक्टर साहब! आइए! ये सब आपके लिए ही है। ये मशीनें आपके हाथों में चाहिए।"
डॉक्टर इसरानी मंच के पास पहुँचे। उन्होंने भीड़ को देखा। कैमरों को देखा। फिर रणवीर को देखा।
"मशीनें रख दीजिए," उन्होंने कहा। "मरीज़ों को फ़र्क़ पड़ेगा।"
भीड़ में हल्की बेचैनी हुई।
"पर काग़ज़?" रणवीर ने मुस्कुराते हुए, बहुत प्यार से पूछा।
"काग़ज़ पर मैं कलम नहीं चलाऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये ज़मीन अकेले मेरी नहीं है।"
शांत। बिना गुस्से। बिना ऊँची आवाज़। जैसे कोई मरीज़ को बता रहा हो कि उसे रोज़ दो गोली लेनी है।
रणवीर ने माइक अपने मुँह से थोड़ा दूर किया। उसकी आवाज़ बदली — वो मिठास कुछ कम हुई।
"डॉक्टर साहब," उसने कहा, "आप मना करेंगे, ये ठीक है। आपकी मर्ज़ी। मगर मैं एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"जिनके घर में कोई बीमार है — वो भी यही कहेंगे? या वो कहेंगे कि हमें मशीनें चाहिए, बेड चाहिए, दवा चाहिए, और अगर इसके लिए एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाना पड़े, तो लगा देंगे?"
भीड़ में कुछ लोगों ने सिर हिलाया।
मैंने देखा — एक औरत जिसके गोद में बच्चा था। एक बूढ़ा जो लाठी के सहारे खड़ा था। एक आदमी जिसकी कमीज़ पर मिट्टी लगी थी। ये वही लोग थे जो मेरे पास काग़ज़ लेकर आए थे — नसीमा बाई, हरी दुपट्टे वाली औरत, बच्चों वाली माँ।
वो सब यहाँ थे।
और वो सब सच में मशीनें चाहते थे।
क्योंकि उनके बच्चे बीमार पड़ते थे और उनके पास शहर के दूसरे छोर तक जाने का पैसा नहीं था।
मैंने उस वक़्त अपनी कमीज़ के नीचे घंटी को दबाया।
वो जल रही थी।
तभी एक आवाज़ आई। ऊँची। पतली। बिल्कुल बेशर्म।
"उस्ताद!"
सब पीछे मुड़े।
टिंकू था। सफ़ेद कुर्ता, बाल बिखरे, और हाथ में वो कार्डबोर्ड का माइक, जिस पर उसने पेंसिल से लिखा था — जोड़ स्कूल।
वो आगे आया। भीड़ उसे रास्ता देती गई।
"मुझे एक सवाल पूछना है," उसने कहा, आवाज़ में थोड़ी काँप, पर सिर बिल्कुल सीधा।
रणवीर हँसा। "पूछो बेटा। नाम क्या है तुम्हारा?"
"पहले जवाब," टिंकू ने कहा, "फिर नाम।"
भीड़ में हँसी फूटी। किसी ने ताली बजाई।
"जो दवा आप दे रहे हैं," टिंकू ने कहा, "उसका बिल कौन भरेगा?"
मंच पर एक पल चुप्पी छाई।
"मतलब?"
"मतलब — दवा तीन महीने के लिए है। तीन महीने के बाद? और जब इसी दवा का नया बैच आएगा और उसका दाम बढ़ जाएगा, तब कौन भरेगा? आप?"
फ्लैश जले। कैमरे घूमे।
"बेटा, पहले काम तो होने दो—"
"काम हो रहा है या सिर्फ़ करने का नाटक?" टिंकू ने कहा।
तालियाँ फिर बजीं। इस बार ज़्यादा लोगों ने बजाईं।
मैंने टिंकू को देखा और मेरा गला भर आया। ये वही बच्चा है जिसने तीन महीने पहले मेरी दुकान का पेचकस बेचा था, डर के मारे। और आज वो पूरी गली के सामने, कैमरों के सामने खड़ा है।
तभी शबनम आपा आगे आईं।
उनके हाथ में गरम समोसे से भरा काग़ज़ी पुड़िया था। उन्होंने वो पुड़िया अपने ही हाथ में रखी हुई थी, जैसे कोई हथियार हो।
"सुन लो सब," उन्होंने कहा, आवाज़ गुमटी की तरह गरम। "बड़े दान वाले जब खाता खोलते हैं, तो उसका पहला पन्ना होता है — बड़ा दान। और आख़िरी पन्ना होता है — छोटे लोगों के पेट। इनके यहाँ बड़ा नाम लिखा जाता है। और छोटे लोगों की थाली में पानी डाला जाता है। आज मशीन आएगी, कल बिल आएगा, और परसों किसी की दुकान जाएगी। किसान का बैल जाएगा, मज़दूर की बीवी की दवा जाएगी, और सब के सब इनके काग़ज़ में अपने अंगूठे का निशान छोड़ जाएँगे।"
उन्होंने पुड़िया मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ले, खा। गरम है।"
मैंने लिया। समोसा सच में गरम था, और उस गरमी में मुझे अचानक ऐसे हौसला मिला जैसे किसी ने मेरी रीढ़ को तार कर दिया हो।
रणवीर ने हँसकर अपनी दोनों हथेलियाँ उठाईं। "अरे, कोई बात नहीं। मैं किसी से कुछ नहीं माँग रहा। मैं सिर्फ़ यह चाहता हूँ कि इस अस्पताल का काग़ज़ साफ़ हो जाए, ताकि आगे जो नई इमारत बनेगी… "
वो ठिठका।
"… नई सुविधा बनेगी," उसने खुद को सँभाला, "उसका रास्ता खुल जाए।"
"आपने नई इमारत कहा," मैंने कहा।
मैं आगे बढ़ा। भीड़ ने रास्ता दिया।
"अभी नहीं," रणवीर ने मुस्कुराते हुए कहा। "आपको ग़लत सुना होगा।"
"मैंने ठीक सुना," मैंने कहा। "और आपको बता दूँ — मुझे आपकी मशीनों से कोई दुश्मनी नहीं है। मशीनें रहें। मरीज़ों को फ़र्क़ पड़ता है तो रहने दीजिए। पर काग़ज़ पर मैं भी आज कलम नहीं चलने दूँगा।"
"और तुम कौन हो?" रणवीर ने पूछा, फिर भी मुस्कुराते हुए, पर आवाज़ में वो पतला सा तिनका आ गया जो पिछले कुछ दिनों में उसकी आवाज़ का हिस्सा बनता जा रहा है।
"मैं वो लड़का हूँ," मैंने कहा, "जिसकी गली में आपने सुबह सात बजे मशीन भेजी थी।"
भीड़ में सनसनी फैली।
रणवीर ने देखा कि लोगों के चेहरे क्या कह रहे हैं। उसने तुरंत अपनी आवाज़ बदली। वो हथेलियाँ फिर जोड़े।
"भाइयों, बहनों — मैं यहाँ किसी से लड़ने नहीं आया। मैं यहाँ देने आया हूँ। मैं आपका ही आदमी हूँ। मेरा दरवाज़ा हमेशा खुला है।"
वो मंच से नीचे उतरा और सीधे डॉक्टर इसरानी के पास गया। उसने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा — दोस्ताना, नरम, जैसे कोई बड़ा भाई।
"डॉक्टर साहब," उसने धीरे कहा, पर माइक ने सब सुन लिया, "आपके पास एक काग़ज़ है, मेरे पास दो लाख की मशीनें हैं। आप मना करेंगे तो भी ठीक है। मगर अपने मरीज़ों को एक बार तो पूछ लीजिए।"
फिर उसने मुड़कर भीड़ को देखा।
"किसको मशीनें चाहिए?"
चुप्पी।
फिर एक हाथ उठा। फिर दूसरा। फिर दस।
मैंने देखा — वो औरत जिसके गोद में बच्चा था। वो बूढ़ा जो लाठी के सहारे खड़ा था। वो आदमी जिसकी कमीज़ पर मिट्टी लगी थी।
उन्होंने हाथ उठा दिए।
और मुझे उस वक़्त लगा — सच में, अंदर तक लगा — कि सही होने से ज़्यादा मुश्किल है, भीड़ के सामने सही होना।
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