The Mysterious Bell – Chapter 1038
वो गरम थी।
बहुत गरम नहीं। पर गरम थी।
और उसने कुछ नहीं कहा — जैसे उसने भी कह दिया हो कि बात पक्की है और अब उसे बोलने की ज़रूरत नहीं।
दुबे अंकल उठे। अपनी कुर्सी की तरफ़ गए, अपना पुराना रूमाल उठाया और उसे मोड़कर नीली शर्ट की जेब में रखा।
"कल सुबह," उन्होंने कहा, "मुँह अंधेरे में मैं यहाँ नहीं मिलूँगा। मैं पीपल के नीचे मिलूँगा। पाँच बजे।"
शालिनी ने उनकी तरफ़ देखा।
"दुबे जी, आप —"
"मैं रिटायर हूँ, बेटी," उन्होंने कहा। "रिटायर आदमी का कोई वक़्त नहीं होता। फ़र्ज़ है तो पाँच बजे भी आएगा, रात के ग्यारह बजे भी।"
वो थाने के अंदर चले गए।
मैं घर लौटा तो रास्ते में गुमटी के पास से गुज़रा। शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा बुझ चुका था, पर पीछे के कमरे में एक मिट्टी का दीया जल रहा था। और उस दीये की रोशनी में, एक साया दिखा।
रज़िया।
वो अब भी जाग रही थी। शायद शबनम आपा के साथ बैठी थी, शायद अकेली। मैंने आवाज़ नहीं दी। मैं आगे बढ़ गया।
घर के आँगन में पापा की रिंच अब भी मेज़ पर रखी थी — पर उनकी चारपाई से खर्राटे की आवाज़ आ रही थी। वो सो रहे थे। आख़िरकार सोए थे।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। ट्रंक खोला। घंटी को उसमें रखा — नहीं, रखा नहीं, उस पर। फिर उस पर एक कपड़ा डाल दिया।
और मैं बैठ गया।
काग़ज़ निकाले — एक पीला काग़ज़, जो मैंने आज शाम तैयार किया था। उस पर मैंने पेंसिल से एक टेबल बनाई — नाम, जगह, क्या।
फिर मैंने पहली लाइन लिखी।
"शालिनी दीक्षित — वकील। सुबह दस बजे, चंद्रेश दफ़्तार।"
दूसरी।
"दुबे अंकल — थाना। पाँच बजे, पीपल।"
तीसरी।
"मीरा — कैमरा। ग्यारह बजे, अस्पताल।"
चौथी।
"मैं।"
फिर मैंने पेंसिल रख दी।
क्योंकि मुझे पता था कि पाँचवीं लाइन किसकी होगी, और उसका नाम मुझे नहीं पता था।
पाँचवाँ वो आदमी था जो हर महीने के तीसरे बुधवार दादा की दुकान पर आता था। और जिसका नाम आठवें पन्ने पर लिखा था।
मैंने उस खाली लाइन पर एक पेंसिल का निशान बनाया — बस एक छोटा डैश, जैसे लिखने से पहले हाथ ठहर गया हो।
फिर मैंने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा।
सुबह पाँच बजे से पहले मैं उठ गया। चार बजे।
घर में अँधेरा था। माँ की खाँसी कमरे से आई — एक बार, फिर चुप। काजल अपनी चारपाई पर करवट ले रही थी।
मैं दरवाज़े तक गया। बाहर झाँका।
गली में कोहरा था। और उस कोहरे में, पीपल के नीचे, एक चिमनी जल रही थी — जैसे वो रात भर जली हो और किसी ने उसे बुझाया न हो।
पर उस चिमनी के पास कोई नहीं बैठा था।
तभी मेरी जेब में घंटी हिली।
खुद नहीं बजी — बस हिली। जैसे किसी ने उसे जगाया हो।
मैंने निकालकर हथेली पर रखा।
वो गरम थी — और उस गरमी के साथ, घंटी के पीतल पर एक लकीर उभर आई थी। एक नई लकीर, जो सुबह तक वहाँ नहीं थी।
एक सीधी लकीर, और उसके नीचे एक छोटी टेढ़ी लकीर — जैसे कोई बाएँ कोने पर निशान बना रहा हो।
वही निशान।
आठवें पन्ने वाला।
मैंने घंटी को हथेली में भींचा।
"तो तूने भी सुन लिया," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर उसका गरम होना काफ़ी था।
मैंने दरवाज़ा बंद किया, चप्पल पहनी, और गली की तरफ़ चल दिया। रास्ते में मैंने पीपल के नीचे झाँका — चिमनी के पास कोई नहीं, बस ठंडी राख।
पर राख पर एक पैर का निशान था। एक, दो — तीन।
और तीनों निशान पीपल के उस पत्थर की तरफ़ जा रहे थे जहाँ कभी दो बुज़ुर्ग बैठते थे।
मैं वहाँ गया।
पत्थर के नीचे कुछ दबा था — एक काग़ज़, जो आधा बाहर निकला था।
मैंने उसे उठाया। छोटा काग़ज़ था, सफ़ेद, और उस पर इतना ही लिखा था:
"आज सुबह नौ बजे से पहले। तुम्हारा दुश्मन जो तुम्हें खोज रहा है, वो नहीं — जो तुम्हें याद है, उसे खोज रहा है।"
कोई हस्ताक्षर नहीं।
बस नीचे, कोने पर, एक छोटी सी लकीर — बाएँ कोने पर — और उसके नीचे एक टेढ़ी रेखा।
वही निशान।
आठवाँ पन्ना।
मैं दुकान पहुँचा तो पाँच बज रहे थे।
पीपल के नीचे पहले से तीन लोग बैठे थे — उस्ताद अली बक्श अपनी सिलाई की दुकान की कुर्सी लेकर आए थे और उसे सीधे पीपल के नीचे रखकर उस पर बैठे थे। उनके बगल में मंसूर चाचा थे, अपनी लाठी के सहारे। और उनके बगल में, एक काले कपड़े में लिपटी, कोई औरत — जिसे मैंने पहले नहीं देखा था।
मैं रुका। महसूस किया — यह वही औरत है जो कल थाने के बाहर बैठी थी, कौशल्या।
वो मेरी तरफ़ मुड़ी।
"अंकुश," उसने कहा। "तू आ गया।"
पर मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने उसके हाथ में देखा — उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था। मैला, पीला, मोड़ा हुआ।
"यह क्या है?"
उसने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया।
"यह कल रात थाने के बाहर मिला," उसने कहा। "मैंने पहले नहीं दिया क्योंकि तेरे पास और भी बातें थीं।"
"किसने दिया?"
"कोई नहीं दिया," उसने कहा। "पाया। बेंच के नीचे।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक पतला काग़ज़ था। और उस पर, नीली स्याही में, सिर्फ़ एक लाइन:
"जो पन्ना तुम ढूँढ रहे हो, वो मेरे पास है।"
और उसके नीचे — वही निशान।
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।
फिर मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने बस इतना कहा:
"तो अब सिर्फ़ दो सवाल बाक़ी हैं — वो कौन है, और वो क्या चाहता है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब भी गरम थी।
और उसने कहा — सिर्फ़ दो शब्द, बहुत धीमे, बहुत दूर से, जैसे कोई बहुत पुरानी आवाज़ मेरी ही जेब में बोल रही हो:
"दोनों एक ही है।"
मैंने पीपल के नीचे बैठे लोगों की तरफ़ देखा। उस्ताद, मंसूर, कौशल्या।
फिर मैंने अपने काग़ज़ को जेब से निकाला, उस पर वो टेबल जो रात में बनाई थी, और उस खाली लाइन पर — पाँचवें नाम वाली जगह पर — एक नाम लिख दिया।
बस एक शब्द:
"जानता हूँ।"
पर वो सच नहीं था।
सच यह था कि मैं अब भी नहीं जानता था।
पर शालिनी ने कहा था — अब लड़ाई गवाहों से लड़ी जाएगी।
और मेरा पहला गवाह, मेरी जेब में गरम था।
दूसरा गवाह, मेरे सामने पीपल के नीचे बैठा था।
तीसरा गवाह, अस्पताल की उस पीली दीवार पर राख से लिखा हुआ था।
और चौथा गवाह, मेरे पापा थे — जो आज पाँच बजे आने वाले थे, पर एक घंटे पहले आ चुके थे।
मैंने बेंच पर बैठे लोगों की तरफ़ देखा।
"दस मिनट," मैंने कहा। "फिर हम चलते हैं।"
उस्ताद ने सुई उठाई। मंसूर ने लाठी। कौशल्या ने मुँह पर काली ओढ़नी खींची।
और सूरज, धीरे-धीरे, गली के मुँह पर उतर आया।
कल का "कल" खत्म हो चुका था।
आज का "आज" शुरू हो रहा था।
और उस "आज" में, अभी भी, एक पन्ना था जिसे मैंने नहीं देखा था, एक अंगूठा था जिसका नाम मैं नहीं जानता था, और एक औरत थी जो बहुत पुरानी लड़ाई से लौटकर आई थी।
पर उस "आज" में एक बात पक्की थी — थाने के बाहर बेंच पर बैठी शालिनी दीक्षित।
और उसने कहा था — ग्यारह बजे, अस्पताल में, रणवीर मशीनें दान करेगा, और उस वक़्त उसका काला थैला उसके पास होगा।
अब मुझे बस एक चीज़ चाहिए थी।
वो थैला।
पर वो थैला मिलने से पहले, मुझे एक और चीज़ चाहिए थी — जो उस थैले को खोल सके।
और वो चीज़, मेरी जेब में, गरम हो रही थी।
घंटी।
और उस घंटी पर, उस सुबह, एक नई लकीर उभरी थी — वही निशान, आठवें पन्ने का।
जो कह रहा था कि वो पन्ना अब सिर्फ़ एक पुरानी बात नहीं है।
वो पन्ना अब मेरे और रणवीर के बीच में है।
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