The Mysterious Bell – Chapter 1036
पापा चूल्हे के पास बैठे थे। रिंच उनके हाथ में थी। वो उसे पोंछ रहे थे, बार-बार।
"पापा।"
"हूँ।"
"कल सुबह सात बजे मशीन। ग्यारह बजे अस्पताल में रणवीर का दान।"
वो रुके। रिंच मेज़ पर रखी।
"ग्यारह बजे?"
"हाँ।"
"तो मशीन को साढ़े नौ बजे तक रुकना पड़ेगा," उन्होंने कहा।
मैंने उन्हें देखा।
"कैसे?"
"वो मशीन मरे हुए पहिये वाली नहीं है," पापा ने कहा। "मैंने आज शाम उसके टायर देखे थे। फ़ोरमैन भी देखा था। दो पहियों में हवा कम थी, और तीसरे में वाल्व ढीला था। अगर सुबह सात बजे वो चलेगी, तो दस बजे तक एक पहिया बैठ जाएगा।"
मैं मुस्कुराया।
"पापा, आपने मशीन के टायर देखे?"
"मैंने पूरी मशीन देखी," उन्होंने कहा। "हर पेंच। हर बोल्ट। जहाँ से वो मज़बूत दिखती है, वहाँ वो कमज़ोर है। दीवार के सामने मज़बूत है, पहियों पर कमज़ोर।"
"और अगर वो वाल्व ढीला है तो?"
"तो मशीन सात बजे आएगी," पापा ने कहा, "दीवार को छुएगी, और फिर रुक जाएगी। बस दो घंटे। दो घंटे मुझे चाहिए।"
मैंने उनका हाथ देखा। रिंच पकड़े हुए, ग्रीस से काला, और उँगलियों पर एक पुराना सफ़ेद निशान — वो निशान जो पीतल के टुकड़े से जुड़ने पर आया था।
"पापा," मैंने कहा, "आप कल पाँच बजे आने वाले थे। अब साढ़े नौ बजे की बात कर रहे हैं।"
उन्होंने रिंच उठाई और अपने औज़ारों के ट्रंक की तरफ़ चल दिए।
"बेटा," उन्होंने बिना मुड़े कहा, "पुराना आदमी दो वक़्त पर नहीं आता। वो एक वक़्त पर आता है, पर एक घंटे पहले।"
रात केरात के ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर मैं घर से निकला। माँ सो चुकी थीं। काजल ने सफ़ेद कोट तकिये के नीचे रख दिया था। पापा औज़ारों के ट्रंक के पास बैठे थे, और मैंने दरवाज़ा बंद करते वक़्त उनकी तरफ़ देखा — वो रिंच पोंछ रहे थे, बार-बार। जैसे उन्हें वो औज़ार नहीं, कोई पुरानी बात पोंछनी हो।
गली में पीपल के नीचे चिमनी अब भी जल रही थी। कोई बुज़ुर्ग वहाँ बैठा था — मैंने चेहरा नहीं देखा, बस परछाईं देखी, जो आग में हिल रही थी। और उस परछाईं के पीछे, दूर, थाने का पीला बल्ब जल रहा था।
मैं उसी बल्ब की तरफ़ चला।
रास्ते में मैंने घंटी जेब से निकाली। वो गरम थी। बहुत गरम नहीं — बस इतनी कि जैसे किसी ने उसे थोड़ी देर हाथ में पकड़ा हो और छोड़ दिया हो।
थाने के सामने पहुँचा तो बेंच पर एक औरत बैठी थी।
शालिनी दीक्षित। वो वकील जो रात में आई थी — "मेरा भी दुश्मन वही है" कहकर गई थी, अपना मक़सद बाद में बताने की बात कहकर।
वो अब भी वहीं बैठी थी। जाने की जगह नहीं गई थी। शायद वो कभी गई ही नहीं — शायद मेरे जाने के बाद वो लौटी और यहीं बैठ गई।
उसके हाथ में एक मोबाइल था। उस मोबाइल की स्क्रीन पर जले हुए खाते की तस्वीर थी — वही जली, फटी, भूरी जिल्द वाली कॉपी, जिसे भोला भाई ने साल भर पहले जलते काग़ज़ों से निकाला था और जिसे आज चंद्रेश के सिपाही ने अपने बगल में दबाकर ले जाकर सरकारी हिरासत में डाल दिया था।
शालिनी की उँगली स्क्रीन पर चल रही थी। धीरे-धीरे। ऊपर से नीचे। और फिर रुकी — उस जगह पर, जहाँ नाम के आख़िरी अक्षर आधे जले थे और उसके आगे बस एक काला धुआँ बचा था।
उसने अपनी उँगली वहाँ रखी।
"यहाँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ पहले से हल्की थी — वो थकी हुई थी, पर उसके थकने में वो किसी और चीज़ का भी नाम था। "तुम्हारे पापा का नाम। और यहाँ —" उसने उँगली थोड़ी दाहिनी तरफ़ खिसकाई, "— यहाँ पूरा हिस्सा जला है। फिर भी नाम बचा है।"
मैंने कहा — "खाता ज़ब्त हो गया।"
"मुझे पता है।"
"पर —"
"अंकुश," उसने मेरी बात काटी, "मुझे बताना मत कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। तुरंत बताओ — क्या है तुम्हारे पास?"
मैंने एक पल रुककर सोचा। फिर बेंच पर उसके पास बैठ गया।
"मीरा के पास," मैंने कहा, "इस खाते की आठ तस्वीरें हैं। दोनों तरफ़ की। हर नाम, हर रकम, हर तारीख़। और वो तस्वीरें उसने सिपाही के खाता उठाने से पहले खींच ली थीं।"
शालिनी की उँगली रुक गई।
"कहाँ हैं वो तस्वीरें?"
"तीन जगह," मैंने कहा। "मीरा के फ़ोन में। माँ के फ़ोन में — उसे भेज दी थीं। और मीरा के ईमेल में, जिसका पासवर्ड अब मेरे पास है।"
शालिनी ने मोबाइल बंद किया।
"तीन जगह। अच्छा किया।" वो एक पल चुप रही। फिर बोली — "और कुछ?"
"जले खाते का मूल सिपाही के पास है। पर उसमें जो नाम हैं, वो हमें याद हैं। किशनलाल। नसीमा बाई। भोला प्रसाद। रमेश भाई। उस्ताद अली बक्श। और —"
"और शंकर यादव," उसने पूरा किया। "दुकान सात — बाक़ी।"
"आपको कैसे —"
"तुमने छह भी नहीं गिनाए थे," उसने कहा, "फिर भी मैंने आख़िरी नाम बोला। क्यों?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि उसी नाम से मैं आई हूँ," उसने कहा। "और उसी नाम से मैं जाना नहीं चाहती।"
वो उठी। बेंच से नहीं — बस टेक लगाकर खड़ी हुई, जैसे उसके पैर उसे अभी भरोसा नहीं दे रहे थे। फिर वो थाने की दीवार के पास गई, दीवार की तरफ़ मुँह किया, और बोली — बिना मेरी तरफ़ देखे:
"मेरे पापा के पास प्रिंटिंग प्रेस था। नए बाज़ार में। नाम बड़ा नहीं था — छोटा था, चार मशीनें थीं, नौ आदमी काम करते थे। हमने वो प्रेस अपनी मेहनत से खड़ा किया था। पापा रात में भी छापते, सुबह भी — कभी-कभी मुझे स्कूल से लेने भी नहीं आ पाते थे। मैं नाराज़ होती थी। और अब सोचती हूँ कि वो मुझे स्कूल से इसलिए नहीं लाने आ पाते थे क्योंकि वो मेरे स्कूल की फ़ीस कमाने में लगे थे।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"फिर रणवीर आया। एक दिन वो प्रेस पर कुछ काग़ज़ छपवाने आया — कुछ इलाक़े की पंचायत का, कुछ फ़ॉर्म। पापा खुश हुए। बड़ा आदमी था, नाम था। दो-तीन महीने में उसने पापा को यक़ीन दिला दिया कि वो प्रेस में हिस्सेदारी देगा, मशीनें बढ़वाएगा, नाम भी जुड़ेगा। पापा ने कहा — 'बेटा, बहुत बड़ा आदमी है, कोई ग़लती मत कर देना।'"
वो रुकी। मुझे लगा कि उसकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, पर जब वो फिर बोली, उसमें कुछ और था — नमी नहीं, थकान नहीं, कुछ और। जैसे किसी दरवाज़े को खोलने के लिए वो खुद को तैयार कर रही हो।
"फिर एक दिन पापा घर आए। हाथ में एक काग़ज़ था। बोले — 'शालिनी, यह देख।' उस पर पापा का अंगूठा था। बिना पढ़े। रणवीर के आदमी ने कहा — 'सिर्फ़ रजिस्ट्री के काग़ज़ हैं, प्रेस के काग़ज़ बदलने हैं।' पापा ने अंगूठा लगा दिया।"
"और?" मैंने पूछा।
"और उस काग़ज़ पर प्रेस बिकी हुई थी," शालिनी ने कहा। "पूरी। मशीनें नहीं — प्रेस। ज़मीन। लाइसेंस। नाम।"
वो मुड़ी।
"अब मैं जो कहूँगी, वो मैंने किसी को नहीं कहा," उसने कहा। "मेरे पास कोई सबूत नहीं। वो काग़ज़ नहीं है — मैंने बीस बार ढूँढा, सब जगह। पापा के काग़ज़ों में, प्रेस के रजिस्टर में, उनके पुराने दराज़ों में। कोई काग़ज़ नहीं। बस एक चीज़ बची है — याद। याद कि पापा ने वो अंगूठा कहाँ लगाया था। याद कि वो किस वक़्त अंगूठा लगाया था। याद कि अंगूठा लगाने के बाद पापा ने मुझे क्या कहा था। 'बेटी, यह अंगूठा धो नहीं सकता। यह बैठ गया है।'"
वो हँसी। हँसी में कुछ कड़वा था।
"इसलिए जब तुमने मुझे यह फोटो दिखाई — यह जला खाता, यह नाम, यह अंगूठा — मुझे लगा कि मैं अपने पापा की आवाज़ सुन रही हूँ।"
हम दोनों चुप हो गए।
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