The Mysterious Bell – Chapter 1035
"मैं तब बारह साल की थी। मैंने उन्हें पागल समझा। माँ ने उन्हें चुप कराया। मैंने कहा — पापा, यह सब बंद करो, हम चले जाएँगे, कहीं और प्रेस खोल लेंगे। और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा जैसे उन्होंने मुझे पहली बार देखा है। वो कुछ नहीं बोले। बस रसोई से निकल गए।"
वो फिर बैठ गई। इस बार बेंच के बिल्कुल किनारे।
"वो अगले महीने तक चले। फिर दिल। और उनकी जेब में जो काग़ज़ मिला — वो एक छोटी सी पर्ची थी।"
"उस पर क्या था?"
"कुछ नहीं," शालिनी ने कहा। "बस सात लकीरें। सात हाथों की, पर नाम नहीं। और नीचे एक तारीख़।"
मैं चुप बैठा रहा। रात के ग्यारह बज चुके थे, और थाने का पीला बल्ब जल रहा था।
"मैंने वो पर्ची रखी है," शालिनी ने कहा। "उनका चश्मा, उनकी कलम, वो पर्ची — सब रखा है। और जानते हो सबसे बड़ी बात क्या है? मैं पाँच साल से वकील हूँ और मैंने कभी उस पर्ची को अदालत में नहीं ले जाने दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे डर था कि अदालत कहेगी — यह कुछ नहीं है। सात लकीरें। बस। और मैं वो नहीं सुन सकती थी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं अपने पापा की आख़िरी बात को कुछ नहीं नहीं सुन सकती थी।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
"तुम्हें कुछ नहीं सुनना पड़ेगा," मैंने कहा। "तुम्हें सिर्फ़ जोड़ना पड़ेगा।"
"क्या?"
"मेरे पास दो लकीरें हैं। एक तस्वीर में है, जिसमें तीसरा आदमी काटा हुआ है। एक मेरे पास है, जो थाने के पचास साल पुराने काग़ज़ पर है। एक सात अंगूठों वाले शर्तनामे पर है, और एक दरवाज़े पर। तुम्हारे पास सात लकीरें हैं। सात लकीरें और दो लकीरें — शालिनी, यह जोड़ना है, भाषण नहीं देना।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अपनी फाइल से एक और काग़ज़ निकाला — मुड़ा, पीला, किनारे से फटा।
"यह मेरे पापा की पर्ची की फोटो है," उसने कहा। "मेरे पास हमेशा रहती है। दफ़्तार में, बैग में, हर जगह।"
उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने देखा। सात लकीरें थीं — हर लकीर किसी उँगली के आकार की, बस उँगली नहीं। और नीचे तारीख़ थी। और उस तारीख़ के ऊपर एक शब्द था, बहुत छोटा, बहुत हल्का — ऐसे जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो।
वो शब्द था — अस्पताल।
मेरा सीना ठंडा हो गया।
"यह तारीख़," मैंने कहा। "यह वही तारीख़ है।"
"कौन सी?"
"जो मेरे दादा की रसीद पर है। एक हज़ार रुपये की रसीद। जो अस्पताल के लिए दी गई थी, और जिसके पीछे लिखा है — सच कभी पुराना नहीं होता।"
शालिनी उठ खड़ी हुई। इस बार कुछ गिरा भी — उसका बैग बेंच से फिसल गया, काग़ज़ बाहर आ गए, और टिंकू दौड़कर आया।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने तो कहा था न, चेहरे ऐसे हैं जैसे कोई पंचर बिना बताए ठीक कर गया।"
"टिंकू," मैंने कहा, "काग़ज़ उठाओ। और ध्यान से।"
"मैं हमेशा ध्यान से हूँ," वो झुकते हुए बोला, "फिर भी हर बार ठोकर लगती है। यही तो ज़िंदगी है।"
मैंने शालिनी को देखा।
"अब बताओ," मैंने कहा। "क्यों उठीं?"
"क्योंकि अभी तक मैं अपने पापा के मुक़दमे को अपने पापा की बात समझ रही थी," उसने कहा। "अब समझ रही हूँ कि यह मेरे पापा का मुक़दमा नहीं था। यह अस्पताल की ज़मीन का मुक़दमा था। और मेरे पापा उसमें फँस गए।"
"कैसे?"
"क्योंकि वो प्रेस के मालिक थे," शालिनी ने कहा। "और प्रेस में कभी-कभी किसी और के काग़ज़ छप जाते हैं। बिना नाम, बिना पूछताछ। सिर्फ़ हाथ से लिखा काग़ज़ और एक हुक्म।"
"तुम कह रही हो कि तुम्हारे पापा ने…"
"मैं कह रही हूँ," उसने कहा, "कि मेरे पापा को किसी दिन ज़मीन के काग़ज़ों की एक कॉपी छापनी पड़ी होगी, और उस दिन उन्होंने देखा होगा कि सात अंगूठों पर क्या लिखा है। और उस दिन के बाद वो उस काग़ज़ को ढूँढ़ते रहे।"
वो रुकी और मेरी आँखों में देखा।
"और शायद," उसने कहा, "उन्होंने उसे ढूँढ़ भी लिया।"
मेरी घंटी ज़ोर से बजी। बिना हाथ के। बेंच पर रखी थी, और वो एक बार बजी — छोटी, धीमी, और साफ़।
शालिनी ने घंटी की तरफ़ देखा।
"यह क्या था?"
"यह मेरी घंटी है," मैंने कहा।
"उसने बजा क्या?"
"हाँ।"
"क्यों?"
मैंने घंटी उठाई। वो गरम थी — उतनी ही गरम जितनी उस रात थी जब हम पाँच बजे की सभा से लौटे थे।
और उसने एक ही बात कही।
"अब नाम नहीं। थैला।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"क्यों?" उसने फिर पूछा। "उसने क्या कहा?"
"मैं नहीं बता सकता," मैंने कहा। "पर मैं यह बता सकता हूँ कि वो किस बारे में कह रही है।"
"किस बारे में?"
"उस थैले के बारे में। असली रजिस्टर के बारे में।" मैंने उसे देखा। "तुम कह रही थीं कि रणवीर कल दान करने आएगा।"
"हाँ।"
"तो तुम्हारे पास एक ही रास्ता है। उस दान में जाओ। पर गली के लड़के की तरह नहीं। वकील की तरह जाओ।"
शालिनी कुछ देर चुप रही। फिर उसने अपना बैग उठाया, काग़ज़ समेटे, और सीधी खड़ी हो गई।
"मैं कल सुबह नौ बजे वहाँ रहूँगी," उसने कहा। "और मैं उस दान में वो सवाल पूछूँगी जो किसी ने नहीं पूछा।"
"कौन सा?"
"मैं पूछूँगी — मशीनों के साथ कौन सी ज़मीन आ रही है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अगर वो दान में ज़मीन घुसाने की कोशिश करेगा, तो वो एक ही सवाल में पकड़ा जाएगा। और अगर वो नहीं करेगा, तो भी हमें पता चल जाएगा कि वो किस चीज़ के लिए डरा हुआ है।"
"शालिनी," मैंने कहा, "एक बात।"
"क्या?"
"वो दान में तुम्हें अकेले नहीं देखना चाहेगा। वो तुम्हें भीड़ में देखना चाहेगा, क्योंकि भीड़ में एक औरत का सवाल दब जाता है।"
"तो?"
"तो वहाँ एक और औरत होगी," मैंने कहा। "जिसके हाथ में कैमरा होगा, और जिसकी आवाज़ अदालत से ज़्यादा तेज़ है।"
शालिनी ने पहली बार मुस्कुराकर देखा।
"मीरा?"
"मीरा।"
वो जाने लगी। फिर रुकी, और बिना मुड़े बोली —
"अंकुश, एक आख़िरी बात।"
"कहो।"
"कल सुबह सात बजे मशीन आएगी और ग्यारह बजे दान होगा। तुम्हारे पास दो जगह हैं और एक ही सुबह।"
"मुझे पता है।"
"तो तुम किसे चुनोगे?"
मैंने घंटी जेब में रखी। फिर आसमान की तरफ़ देखा — बिना तारे, बिना चाँद, बस धूल में लिपटा शहर।
"मैं किसी को नहीं चुनूँगा," मैंने कहा। "मैं सबको चुनूँगा।"
"यह जवाब नहीं है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर अभी यही है।"
वो हँसी, और चली गई। इस बार उसके चलने की आवाज़ में कुछ और था — चप्पल की, काग़ज़ की, और एक औरत के फ़ैसले की जो अब पूरा हो चुका था।
घर लौटते वक़्त मैंने मीरा को फोन किया।
वो तीसरी बार में उठाया — पहली दो बार में काट दिया, क्योंकि उसके हाथ में कैमरा था और वो कुछ एडिट कर रही थी।
"क्या?"
"कल सुबह ग्यारह बजे अस्पताल में रणवीर मशीनें दान कर रहा है।"
"मुझे पता है," मीरा ने कहा। "लिफ़ाफ़ा मेरे पास भी आया था। मैंने सोचा तुम्हें बताऊँ, फिर सोचा कि बबलू भी बताएगा।"
"बबलू?"
"बबलू ने आज शाम गुमटी पर आकर मुझे यही बताया। उसने कहा — साहब कल अस्पताल आ रहा है, और उसके साथ वो थैला आएगा।"
मैं रुक गया। गली के मोड़ पर, पत्थर के पुल पर खड़ा, और मेरे पीछे पीपल की छाया।
"बबलू ने खुद बताया?"
"हाँ।"
"कैसे?"
मीरा कुछ देर चुप रही।
"वो रो रहा था," उसने कहा। "और जो आदमी रोते हुए सच बोलता है, वो या तो टूट गया है या पलट गया है। मुझे नहीं पता इनमें से कौन सा।"
"बारह साल," मैंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"कुछ नहीं।"
घर पर माँ ने दवा ले ली थी और फ़र्श पर बैठी कॉपी देख रही थीं। काजल सफ़ेद कोट को इस्त्री कर रही थी — वो कल पाँच बजे पीपल पर खड़ी होने की ज़िद कर चुकी थी, और उसकी ज़िद का मतलब था कि उसे कोट साफ़ चाहिए।
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