The Mysterious Bell – Chapter 1034
"अस्पताल की ज़मीन का, तुम्हारी दुकान का, भोला की नौकरी का, और जो काग़ज़ ज़ब्त हुआ — उसका।" वो सीधी बैठ गई। "मेरे पास लाइसेंस है। मेरे पास तीन साल की प्रैक्टिस है। और मेरे पास एक कारण है, जो किसी मुक़दमे से ज़्यादा मज़बूत चीज़ है।"
"क्या?"
"गुस्सा।"
"गुस्सा अदालत में कमज़ोर गवाह है," मैंने कहा।
"इसीलिए मैं उसे अंदर नहीं लाती," शालिनी ने कहा। "मैं उसे बाहर खड़ा रखती हूँ, और अंदर सिर्फ़ तारीख़ें ले जाती हूँ।"
फिर उसकी आवाज़ बदली।
"पर एक बात साफ़ है, अंकुश। असली रजिस्टर के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी। फोटो, खाता, फ़र्ज़ी प्राथमिकी, गवाह — यह सब एक कमरे में घुस सकता है, पर वो कमरा तब तक खाली रहेगा जब तक असली काग़ज़ नहीं आता। जिस काग़ज़ पर सबके अंगूठे हों।"
मैंने चाय रख दी।
"रजिस्टर के बारे में तुम क्या जानती हो?"
"जो तुमने थाने में कहा — साहब के काले जले किनारे वाले थैले में है। और भोला भाई के मुताबिक़ साहब उसे हर हफ़्ते कहीं ले जाते हैं और ज़्यादा ठंडे लौटते हैं।"
"हाँ।"
"तो वो रजिस्टर किसी अलमारी में नहीं है। वो हिलता-डुलता रहता है। और जो काग़ज़ हिलता-डुलता है, उसे पकड़ना मुश्किल नहीं होता। पर उसे पकड़ने के लिए तुम्हें उस वक़्त वहाँ होना पड़ता है जब वो बाहर निकले।"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ था — वो झटका जो वकील को तब होता है जब मुक़दमा अचानक काग़ज़ से निकलकर आदमी की तरफ़ मुड़ जाए।
"तुम्हारे पास कुछ है," मैंने कहा। "तुमने यह बात इस तरह नहीं कही जैसे कोई सुझाव दे रही हो। तुमने ऐसे कहा जैसे कोई तारीख़ जानती हो।"
शालिनी ने अपनी फाइल खोली। मोटी काली फाइल, किनारे फटे हुए, जिस पर सफ़ेद अक्षरों में एक नाम लिखा था — उसका अपना।
उसने एक काग़ज़ निकाला। सादा सा, पर नीली मोहर वाला।
"यह आज शाम को मुझे मिला," उसने कहा। "मेरे दफ़्तार में। लिफ़ाफ़े पर मेरा नाम था और भेजने वाले का नहीं।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। भारद्वाज ट्रस्ट। कल सुबह ग्यारह बजे। नूर अस्पताल। मशीनें दान। मरीज़ों के लिए, जाँच के लिए, दो नई मशीनें और एक ऐंबुलेंस, और नीचे रणवीर भारद्वाज का नाम।
"कल सुबह ग्यारह बजे," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"मशीन सात बजे आएगी।"
"हाँ।"
"और वो ग्यारह बजे अस्पताल में दान करेगा।"
"हाँ।"
"यह दोनों वक़्त—"
"एक ही सुबह के हैं," शालिनी ने कहा। "और तुम्हें पता है क्यों? क्योंकि वो जानता है कि तुम्हारे पास एक ही सुबह है। वो तुम्हें दो जगह खींचेगा — मशीन की तरफ़ और दान की तरफ़ — और जब तुम दो जगह दौड़ोगे, तब वो तीसरी जगह चला जाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तीसरी जगह?"
शालिनी ने उँगली काग़ज़ पर रखी।
"तीसरी जगह वही है जहाँ वो अपना थैला छोड़कर दान करने जाएगा। अंकुश, वो कभी अपना थैला अकेला नहीं छोड़ता। मैंने उसके आदमियों को देखा है — जब वो किसी सभा में बोलने जाता है, तो एक आदमी हमेशा उसके पीछे खड़ा होता है, हाथ में कुछ नहीं, पर आँखें सिर्फ़ उस पर। और दूसरा आदमी उसके पास वो थैला पकड़े रहता है।"
"थैला पकड़े?"
"हाँ," शालिनी ने कहा। "क्योंकि जो आदमी अपने काग़ज़ को अपने हाथ से अलग नहीं करता, वो उसे किसी के भरोसे नहीं छोड़ता। और जिस दिन वो दान करने जाएगा — मशीनों के सामने, कैमरों के सामने, बड़े साहब के सामने — उस दिन उसका हाथ खाली होगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि मशीन दान करने के लिए दोनों हाथ चाहिए," शालिनी ने कहा। "रिबन काटने के लिए भी। ताली बजाने के लिए भी।"
वो रुकी और मेरी आँखों में देखा।
"और उस एक पल के लिए — जब उसके दोनों हाथ मशीन पर होंगे और थैला किसी और के हाथ में होगा — हमें उस थैले के अंदर होना पड़ेगा।"
मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया। चाय ठंडी हो गई थी, पर मैंने फिर भी पी ली। ठंडी चाय का भी अपना स्वाद होता है — बस उसे गरम चाय की तरह नहीं पीना चाहिए।
"तुम्हारा मतलब है," मैंने कहा, "कि हमें कल सुबह सात बजे मशीन भी रोकनी है, और ग्यारह बजे दान के वक़्त असली रजिस्टर भी देखना है।"
"हाँ।"
"और तुम्हें पता है कि ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि मशीन गली के उस मोड़ पर होगी और दान अस्पताल के गेट पर। बीच में पाँच मिनट का रास्ता है, और पाँच मिनट में—"
"पाँच मिनट में बहुत कुछ होता है," शालिनी ने कहा। "मैंने पाँच मिनट में एक केस जीता था।"
"कैसे?"
"जज ने कहा — पाँच मिनट में चाय लाओ। मैं तीन मिनट में ले आई। उन्होंने कहा — अब सुनाओ। मैंने कहा — जो सुनाना था, वो चाय के साथ सुन चुके। उन्होंने मुक़दमा मेरे हक़ में कर दिया।"
मैं हँस पड़ा।
"तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त यही है," मैंने कहा। "तुम्हारे पास जवाब हमेशा तैयार रहता है।"
"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ एकाएक भारी हो गई। "मेरी सबसे बड़ी ताक़त यह है कि मैं जानती हूँ कि जवाब होने और सच होने में फ़र्क़ होता है। मेरे पापा के पास भी जवाब थे। सब जवाब थे। फिर भी प्रेस चला गया।"
उसने फाइल बंद कर दी।
"अब मैं तुमसे एक बात पूछूँगी," उसने कहा। "और मुझे सच चाहिए। जो तुमने थाने में नहीं कहा।"
"पूछो।"
"तुम्हारे पास जो काग़ज़ हैं — असली या नक़ली — उनमें ऐसा कुछ है जो सबको जोड़ सकता है?"
मैंने घंटी जेब से निकाली। ठंडी नहीं थी। गरम भी नहीं थी। बस वही थी जो हमेशा होती थी — छोटी, पीतल की, थोड़ी घिसी।
और फिर मैंने सब कह दिया।
"अस्पताल की ज़मीन का एक पुराना शर्तनामा है," मैंने कहा। "पचास साल पुराना। जिस पर गली के सात लोगों के अंगूठे हैं। उसमें लिखा है — ज़मीन किसी एक की नहीं, सबकी। बेचना मना, गिरवी रखना मना। और सबसे आख़िरी लाइन — शर्त बोलेगी।"
शालिनी सीधी हो गई।
"सात अंगूठे?"
"हाँ।"
"और वो काग़ज़ कहाँ है?"
"मेरे दादा के पास था। फिर मेरे पापा के पास। फिर वो किसी दराज़ में बंद हो गया। और अब — अब मुझे पता है कि उसका एक पन्ना कटा है। एक पन्ना अलग है। एक आठवाँ अंगूठा है।"
"आठवाँ?"
"हाँ। अलग पन्ना। अलग अंगूठा। अलग छुपाया हुआ। किसी ने उसे जान-बूझकर अलग रखा — जिससे सात अंगूठों वाला काग़ज़ पूरा न हो सके। क्योंकि जिस दिन सातों अंगूठे एक जगह होंगे, उस दिन ज़मीन किसी की नहीं रहेगी।"
शालिनी उठ खड़ी हुई। एकदम। जैसे किसी ने उसकी कुर्सी खींच ली हो।
"दोहराओ," उसने कहा।
"क्या?"
"सात अंगूठे। सात लोग। ज़मीन किसी एक की नहीं।"
"हाँ।"
वो बेंच के पास खड़ी रही। उसका हाथ फाइल पर था, पर उँगलियाँ हिल रही थीं — जैसे किसी पुराने पन्ने को पकड़कर उसे महसूस कर रही हो।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "मेरे पापा की आख़िरी बहस याद है मुझे। बिल्कुल याद है। वो रसोई में खड़े थे, मैं दरवाज़े पर, और वो कह रहे थे कि मैं मरने से पहले वो काग़ज़ ढूँढूँगा।"
"कौन सा काग़ज़?"
"मुझे तब पता नहीं था। पर वो एक ही बात दोहरा रहे थे।" उसने आँखें बंद कर लीं। "कह रहे थे — बेटी, अगर किसी काग़ज़ पर सात अंगूठे हों, तो वो काग़ज़ किसी एक का नहीं होता। और जो उसे बेचता है, वो सबसे पहले उस अंगूठे को मिटाता है जो सबसे सच्चा है।"
मेरे हाथ में घंटी काँपी।
शालिनी ने आँखें खोलीं।
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