The Mysterious Bell – Chapter 1033
"ज़ारी, ज़ब्त हो गया।"
"ज़ारी नहीं। ज़ब्त।"
वो पहली बार मुस्कुराई। आधी मुस्कान, आधी थकान।
"मैं वकील हूँ," उसने कहा। "मेरी हर दूसरी बात ग़लत होती है, फिर भी लोग मान लेते हैं। तुम ठीक कर रहे थे। ज़ब्त हो गया।"
"और इसलिए मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ जो थाने के अंदर नहीं बताई।"
"क्या?"
"खाता ज़ब्त हुआ, पर तस्वीरें नहीं। मीरा ने सिपाही के हाथ में जाने से पहले ही फोटो खींच ली थीं और माँ के नंबर पर भेज दी थीं। मेरे ईमेल पर भी। दो जगह।"
शालिनी ने मोबाइल नीचे किया।
"दो जगह," उसने धीरे से दोहराया, जैसे किसी पुरानी सौदेबाज़ी का शब्द याद आ गया हो। "मेरे पापा भी यही करते थे। हर काग़ज़ की दो कॉपी। एक अलमारी में, एक अपने सीने पर।"
"प्रिंटिंग प्रेस?" मैंने पूछा।
"तुम्हें किसने बताया?"
"किसी ने नहीं बताया। तुम्हारे जूते बता रहे थे।"
"मेरे जूते?"
"तुम्हारे जूतों के तल्ले पर स्याही का पुराना निशान है। वो प्रेस की स्याही है — थोड़ी नीली, थोड़ी लाल, और तेल जैसी चिपचिपी। मेरी दुकान पर एक अंकल आते थे जो प्रेस चलाते थे। उनके जूते हमेशा ऐसे ही होते थे। मैं ग्रीस और स्याही में फ़र्क़ कर लेता हूँ। मेरा पूरा धंधा इसी पर टिका है।"
शालिनी ने अपने जूतों की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तुम अजीब हो," उसने कहा। "थाने से निकलकर औरत के जूते देख रहे हो।"
"मैं साइकिल मरम्मत करने वाला हूँ," मैंने कहा। "जूते और साइकिल में फ़र्क़ यही है कि साइकिल में ग्रीस ज़्यादा लगती है।"
वो हँसी नहीं। उसने मोबाइल बंद कर दिया और आसमान की तरफ़ देखा, जहाँ कुछ नहीं था।
"प्रेस मेरे पापा का था," उसने कहा, और आवाज़ वही थी जो लोग तब निकालते हैं जब ज़ुबान किसी पुराने ज़ख्म को छूने से बच रही हो। "नई बस्ती के मोड़ पर। छोटा प्रेस — शादी के कार्ड, दुकान के बिल, स्कूल की कॉपी के कवर। दिन में तीन आदमी काम करते थे, चार मशीनें, और एक पुरानी गंध — स्याही और लोहे की। मुझे आज भी वो गंध किसी भी काग़ज़ से आती है तो पेट में कुछ होता है।"
वो रुकी।
"फिर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन आया। उन्हें जगह चाहिए थी। बड़ी जगह। बस टर्मिनल।"
"और प्रेस—"
"प्रेस में काग़ज़ों पर अंगूठा लगवाया गया। खाली काग़ज़ों पर।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "सुनो, खाली काग़ज़ों पर। जिन पर कुछ लिखा ही नहीं था। कुछ लिखा ही नहीं था, अंकुश।"
मेरे पेट में कुछ गिरा। जैसे कोई पुराना पेंच ट्रंक से नीचे गिरता है और तुम जानते हो कि वो कहीं खो गया।
"कैसे?"
"एक आदमी आया — सफ़ेद कुर्ता, मीठी ज़ुबान, हर बात में बेटा। कहने लगा कि सिर्फ़ एक अंगूठा है — कि प्रेस को बचाने का यही एक रास्ता है, कि काग़ज़ कल आएगा, आज सिर्फ़ अंगूठा लगाना है, यही तो गली के लोग करते आए हैं। मेरे पापा ने मना किया। तो उसने वो किया जो वो सबसे अच्छा करता है।"
"क्या?"
"उसने मेरे पापा को अकेला नहीं छोड़ा — उनका अपना आदमी खड़ा कर दिया। जो रोज़ प्रेस पर आता था। जो चाय पीता था। जिसे पापा ने अपने बेटे की तरह रखा था।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"और एक दिन," शालिनी ने कहा, "वो खाली काग़ज़ों पर अंगूठा लगवाकर ले गए। बारह दिन बाद काग़ज़ आया — भरा हुआ। प्रेस उनका। मेरे पापा के पास कुछ नहीं।"
"अदालत?"
"किस अदालत में जाते? काग़ज़ पर पापा का अंगूठा था। असली। उन्होंने लगाया था — अपनी मर्ज़ी से, खाली काग़ज़ पर। और बाद में जो लिखा गया, वो पापा नहीं पढ़ सके, क्योंकि काग़ज़ उन्हें दिखाया ही नहीं गया। बस छह महीने बाद एक दिन दुकान पर ताला लगा मिला और अंदर लोगों की आवाज़ें थीं — जो हमारे नहीं थे।"
"और तुम्हारे पापा?"
शालिनी ने हाथ की अंगूठी घुमाई। पतली सी चाँदी की अंगूठी थी, घिसी हुई।
"पापा दो साल और चले। फिर उनका दिल — उन्होंने कहा था, दिल का दौरा। मैं कहती हूँ, काग़ज़ का दौरा।"
रात की हवा ने थाने के बोर्ड को हिलाया और वो चरचराया। उस आवाज़ में कुछ था — जैसे कोई पुरानी रजिस्टर की जिल्द खुल रही हो।
टिंकू ने दूर से आवाज़ दी — "उस्ताद, चाय लाऊँ? शबनम आपा की गुमटी खुली है।"
"नहीं," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
"मैं तो लाता हूँ," टिंकू ने कहा। "आप दोनों के चेहरे ऐसे हैं जैसे किसी ने आपका पंचर बिना बताए ठीक कर दिया हो।"
वो गया।
शालिनी ने मुझे देखा।
"तुम्हारा यह लड़का बहुत बोलता है।"
"वो मेरा लड़का नहीं है," मैंने कहा। "वो मेरा छोटा सा सरदर्द है जिसे मैंने खुद पाला है।"
अंदर से दुबे अंकल निकले। नीली शर्ट, आधी आस्तीन, हाथ में स्टील का गिलास जिसमें पानी था। वो आए, बेंच के किनारे बैठे, और गिलास अपने घुटने पर रख दिया।
"मैंने सब सुन लिया," उन्होंने कहा। भावना नहीं थी आवाज़ में। बस एक जानकारी। "दीवार पतली है। और मेरी उम्र ऐसी है कि कान दीवार से ज़्यादा सुनते हैं।"
शालिनी ने उनकी तरफ़ देखा।
"अंकल, आप थाने में थे?"
"मैं थाने के बाहर बैठता हूँ," दुबे अंकल ने कहा। "पैंतीस साल से। अब नौकरी नहीं है, पर कुर्सी मेरी है। और जिसके पास अपनी कुर्सी हो, वो आदमी कम झूठ बोलता है।"
उन्होंने चाय का नहीं, पानी का घूँट लिया।
"बेटी," उन्होंने शालिनी से कहा, "तुम काग़ज़ से लड़ोगी तो वो जीतेगा।"
शालिनी ने सिर उठाया।
"क्यों?"
"क्योंकि काग़ज़ उसके पास ज़्यादा है। तुम्हारे पास बीस साल पुराना एक अंगूठा है, उसके पास कल की तारीख़ वाला एक काग़ज़ है। तुम्हारे पास फोटो है, उसके पास मोहर है। फोटो से मोहर नहीं हारती। मोहर से सच नहीं हारता — पर अदालत में यह बात किसने लिखी है, यह सवाल पहले आता है।"
शालिनी ने गर्दन हिलाई। वो जानती थी। मैं भी जानता था। पर सुनने में फ़र्क़ होता है — जब कोई और कहता है तो बात पत्थर जैसी लगती है।
"तो?" मैंने पूछा।
"तो लड़ाई काग़ज़ से नहीं," दुबे अंकल ने कहा, "गवाहों से लड़ी जाएगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, तुम्हारी गली में कितने लोग हैं?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "साठ-सत्तर घर। बच्चे अलग।"
"साठ-सत्तर घर," दुबे अंकल ने दोहराया। "मतलब सौ अस्सी-दो सौ आदमी। हर आदमी के सीने में एक बात है जो उसने किसी को नहीं बताई। और हर बात के पीछे एक काग़ज़ है जिस पर उसका अंगूठा है।"
वो उठे।
"काग़ज़ वो जब्त कर सकता है। गवाह जब्त नहीं होते।"
"अंकल," शालिनी ने कहा, "आप क्यों…"
"क्योंकि मैं एक गवाह हूँ," दुबे अंकल ने कहा। "और पचास साल से हूँ। जिस दिन मैंने यह वर्दी वाली नीली शर्ट पहनी थी, उस दिन इस गली में साइकिल के पुर्ज़ों की महक आती थी, और एक मिस्त्री था जो मुझे बिना कुछ कहे चाबी ठीक करके दे देता था। उसका नाम जगदीश यादव था।"
मेरा हाथ घंटी पर चला गया। जेब के अंदर घंटी गरम थी।
"अंकल," मैंने कहा, "आपने मुझे यह पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि तुमने पूछा नहीं," उन्होंने कहा, और अंदर चले गए।
टिंकू चाय लेकर आया। गुमटी बंद हो चुकी थी, पर शबनम आपा ने चूल्हा बंद नहीं किया था — उनका कहना था कि जिस रात लड़ाई हो, उस रात चूल्हा बंद नहीं करते। गरम चाय, और दो समोसे, जो ठंडे हो रहे थे।
शालिनी ने चाय ली, एक घूँट पिया, और फिर किसी औरत की तरह नहीं, किसी वकील की तरह बोली —
"मैं मुक़दमा लड़ूँगी।"
"क्या?"
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