The Mysterious Bell – Chapter 1031
"आदेश पर तो सब चलते हैं," दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो शांति थी जो गुस्से से ज़्यादा डराती है। "पर 'आदेश पर चला था' काग़ज़ पर नहीं लिखा जाता। काग़ज़ पर सिर्फ़ तुम्हारा हस्ताक्षर लिखा होता है। और आज ये प्राथमिकी अगर सच में दर्ज होती, तो इसका नंबर मेरी इस कॉपी में होता। और मेरी कॉपी में ये नहीं है।"
उन्होंने कॉपी बंद कर दी। आवाज़ आई — थप। यह आवाज़ एक किताब बंद होने की थी, पर मुझे लगा जैसे किसी मुकदमे का फ़ैसला सुनाया गया हो।
"आज कोई हिरासत नहीं होगी," दुबे अंकल ने कहा।
सिपाही ने कुछ कहना चाहा। दुबे अंकल ने हाथ उठा दिया।
"सुन लो। कल सुबह तुम्हारे साहब दस बजे इस लड़के को दफ़्तार बुला रहे हैं। वहाँ जाएगा। जब उसका नाम आएगा। पर आज रात इस थाने की हवा में अगर ये लड़का रहा, तो कल मेरी कलम से एक ऐसी लाइन निकलेगी जो तुम्हारे साहब के सारे काग़ज़ धो देगी। समझे?"
सिपाही ने गर्दन हिला दी। और उसने प्राथमिकी काग़ज़ वापस उठाया — धीरे से, जैसे वो अब गरम हो गया हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी आँखें सामने थीं। पर उनके होठ काँप रहे थे। और उनका हाथ — जो घुटने पर रखा था — वो हाथ धीरे-धीरे मुट्ठी बन रहा था, फिर खुल रहा था, फिर मुट्ठी।
कुछ कहना था उन्हें। पर बाईस साल की चुप्पी एक ही बार में नहीं टूटती। वो एक-एक हड्डी से टूटती है।
"अंकल," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ हल्की रखी, क्योंकि उस कमरे में हल्की आवाज़ की ज़रूरत थी। "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"जो काग़ज़ अपने आप घर में आ जाए, और जिसे कोई कहीं दर्ज न करे — वो काग़ज़ क्या होता है?"
दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — जैसे वो बहुत पहले से मेरे सवाल का जवाब जानते हों और सिर्फ़ इंतज़ार कर रहे हों कि कोई पूछे।
"वो काग़ज़," उन्होंने कहा, "डर बनाने के लिए बनाया जाता है। तारीख़, नंबर, मुहर — सब दिखावा होता है। असली मक़सद काग़ज़ नहीं होता। असली मक़सद ये होता है कि आदमी उसे पढ़ते ही झुक जाए। डर के आगे काग़ज़ सच लगने लगता है।"
मैंने सिर हिलाया।
"तो फिर ऐसे काग़ज़ का इलाज क्या है?"
दुबे अंकल मुस्कुराए। वो मुस्कान उनके चेहरे पर अजीब लगी — जैसे किसी पुराने सिपाही ने बहुत साल बाद अपनी याददाश्त से निकालकर पहनी हो।
"इलाज एक ही है, बेटा," उन्होंने कहा। "जब कोई दिखावे का काग़ज़ दिखाए, तो तुम असली काग़ज़ दिखा दो। दिखावा असली के सामने नहीं टिकता। स्याही स्याही से हारती है — पर सच स्याही से नहीं हारता।"
वो अपनी कुर्सी से उठे। कुर्सी के पैर के नीचे पुरानी ईंट का टुकड़ा था, जिससे उन्होंने उसे हिलने से रोका हुआ था। उन्होंने धीरे से ईंट सरका दी और कुर्सी एक बार फिर हिल गई — जैसे थाना खुद थोड़ा काँप गया हो।
"जाओ," उन्होंने कहा। "घर जाओ। कल सुबह का सामना अभी से करने लगो तो रात नहीं कटेगी।"
हम उठे।
पापा ने उठते वक़्त मेरा कंधा थाम लिया — बस इतना, कुछ कहा नहीं। पर उस पकड़ में जो था, वो बाईस साल की चुप्पी से ज़्यादा बोल रहा था।
बाहर निकले तो रात पूरी तरह उतर आई थी। बरामदे की पीली रोशनी के बाहर अंधेरा मोटा था, और उस अंधेरे में गली के लोग खड़े थे। किसी ने कुछ नहीं पूछा। बस खड़े रहे। और उस खड़े रहने में ही सब सवाल के जवाब थे।
माँ सबसे आगे थीं।
उन्होंने मुझे देखते ही अपना हाथ बढ़ाया — कुछ कहा नहीं, बस हाथ बढ़ाया। मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनकी हथेली ठंडी थी, पर मज़बूत थी। अस्पताल से लौटी माँ की हथेली। पर उसमें वो ताक़त अभी भी थी जो मुझे बचपन में पकड़कर स्कूल की गली से घर तक खींच लाती थी।
"माँ—"
"बाद में," उन्होंने कहा, और आवाज़ सिर्फ़ दो लोगों के लिए रखी। "पहले बता — चोट?"
"नहीं माँ।"
"अच्छा," उन्होंने कहा, और मेरा हाथ छोड़ दिया, जैसे उन्हें जो चाहिए था मिल गया और अब दुनिया का बाक़ी काम देखा जा सकता है।
उस्ताद अली बक्श दुकान की चौखट पर खड़े थे, हाथ में सिलाई की सुई — नई सुई, चमकती सुई, जो दूर से भी दिख रही थी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस सुई को उँगली और अँगूठे के बीच फुटball-size घुमाया — और मुझे लगा कि वो सुई नहीं, कोई इशारा है।
काजल मेरे पास आई और बिना कुछ कहे मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। टिंकू मेरे पैरों के पास बैठा था, जैसे अभी भी यक़ीन नहीं आ रहा कि मैं वापस आ गया। मीरा का कैमरा जल रहा था — रात में उसकी लाल बत्ती और भी लाल लग रही थी।
मैंने घंटी जेब से निकाली। ठंडी थी, वैसी ही ठंडी जैसी थाने में थी।
"ठीक है," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ गली की आवाज़ से मिला दी। "सब घर जाओ। सुबह पाँच बजे मेरी दुकान पर। मशीन सात बजे आएगी, पर हम उससे पहले वहाँ होंगे।"
किसी ने कुछ नहीं पूछा। लोग बिखरने लगे। और जब लोग बिखरने लगे, तभी—
वो आई।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में मोटी फ़ाइल, कंधे पर एक ऐसा बैग जो बहुत साल से चल रहा था और जिसकी सिलाई हर बार हाथ से मरम्मत की गई थी। कद मझोला, चाल में वो जल्दबाज़ी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जो रोज़ कोई जंग जीतकर सोते हैं।
वो रुकी। मुझे देखा। फिर मेरे हाथ में घंटी देखी। फिर वो मुस्कुराई — और उस मुस्कान में कुछ था जो रणवीर की मुस्कान से बिल्कुल उल्टा था। रणवीर की मुस्कान ऊपर से आती थी। ये नीचे से आ रही थी।
"अंकुश यादव?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"शालिनी दीक्षित," उसने कहा, और फ़ाइल एक हाथ से दूसरे हाथ में बदली। "वकील। रात का वक़्त है, माफ़ी चाहूँगी। पर मुझे लगा अगर सुबह तक रुकी, तो सौदा पक्का हो जाएगा।"
सिपाही जो अभी जाने को था, रुक गया। उसका हाथ प्राथमिकी पर था। वो शालिनी को देख रहा था, जैसे रात को कोई भूत दिख गया हो।
"मैडम—"
"तुम रहो," शालिनी ने कहा, बिना उसकी तरफ़ देखे। "तुम्हारा काम अभी बाक़ी है। मुझे इस लड़के से बात करनी है, और तुम्हें मेरी बात पहले सुननी है।"
वो मेरे पास आई। फ़ाइल खोली। और उसमें से एक पन्ना निकाला — वही पन्ना जो अभी दुबे अंकल ने देखा था। प्राथमिकी की नकल।
"तुम्हारी कॉपी है?" उसने पूछा।
"क्या?"
"प्राथमिकी की नकल। तुम्हारे पास है क्या?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने अपना फ़ोन उठाया। उसमें प्राथमिकी की तस्वीर थी — अभी थाने में ही उतारी थी।
शालिनी ने तस्वीर देखी और हल्का सा होंठ काटा।
"अच्छा है," उसने कहा। "तुमने तस्वीर ले ली। सोच-समझ वाले लोग हो।" उसने फिर मेरी तरफ़ देखा। "अब सुनो। ये प्राथमिकी फ़र्ज़ी है। नंबर नहीं है। तारीख़ ग़लत है। और जिस तारीख़ को ये घटना बताई गई है, उस रात तुम अस्पताल में थे। तुम्हारे पास सबूत भी है — दुबे अंकल का, अस्पताल का रजिस्टर।"
"तो फिर?" मैंने कहा।
"तो फिर ये मुक़दमा जीतने के लिए दो चीज़ें चाहिए।" उसने दो उँगलियाँ उठाईं। "पहली — इन पर एक ऐसा हस्ताक्षर जमा हो जाए जो झूठा साबित हो। और दूसरी —" उसने फ़ाइल बंद कर दी, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "— असली रजिस्टर।"
मैं चुप रहा।
शालिनी ने मेरे चेहरे को पढ़ा। वकील होती हैं — चेहरा पढ़ने की आदत होती है।
"तुम्हें पता है ना," उसने कहा, "कि असली रजिस्टर कहाँ है?"
"पता है," मैंने कहा। और यह कहते वक़्त मेरी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई। "पर वो किसी के पास नहीं है। असली रजिस्टर… वो अपने पास है।"
शालिनी की आँखें सिकुड़ीं।
"मतलब?"
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