The Mysterious Bell – Chapter 1030
भीड़ से हल्की हँसी उठी। मोटे आदमी ने फ़ाइल बंद की।
"ठीक है," उसने कहा। "आज हस्ताक्षर नहीं। पर कल सुबह सात बजे मशीन आएगी। और मशीन काग़ज़ नहीं देखती। मशीन दीवार देखती है।"
"मशीन को पता है," मैंने कहा, "कि दीवार के पीछे क्या है?"
"क्या है?"
"लोग," मैंने कहा। "आप जाकर साहब से कहिए — मशीन की आवाज़ बड़ी होती है, और गली की आवाज़ें छोटी। पर दस साल बाद भी गली की आवाज़ें रहेंगी, मशीन नहीं।"
वो मुड़े।
और तभी शबनम आपा गुमटी से निकलीं।
पीतल की थाली हाथ में, उसमें चार कुल्हड़। भाप उठ रही थी।
"रुको," उन्होंने कहा।
मोटे आदमी ने पीछे देखा।
"मैं तुम्हें नहीं रोक रही," शबनम आपा ने कहा। "मैं चाय रोक रही हूँ। ये चार कुल्हड़ तुमने आज नहीं पिए, तो कल लोग कहेंगे कि शबनम की चाय भी नसीब नहीं हुई। और मेरी चाय से बदनामी नहीं होने दूँगी।"
"हमें देर हो रही है," दुबले आदमी ने कहा, पर उसकी नज़र कुल्हड़ पर थी।
"देर सबको हो रही है," शबनम आपा ने कहा। "चाय पीने में तीन मिनट लगते हैं। तीन मिनट में तुम्हारी मशीन नहीं पहुँच जाएगी। बैठो।"
मोटा आदमी कुछ देर खड़ा रहा।
फिर उसने कुल्हड़ उठाया — दुबले आदमी ने भी — और दोनों ने वहीं, उसी बोर्ड के पास खड़े होकर चाय पी जो उन्होंने कल मेरी दुकान पर लगवाया था।
मैंने देखा कि शबनम आपा ने थाली उस उतारे हुए बोर्ड पर रखी थी — सागौन के बोर्ड पर, जो अब दुकान पर नहीं था।
"जो बोर्ड दुकान छीनने आया था," शबनम आपा ने कहा, इतनी आवाज़ में कि पूरी गली सुने, "वो आज मेज़ बन गया। बुरा नहीं लग रहा।"
गली हँसी।
पहली बार आज हँसी।
और मैंने सोचा — यही चीज़ है जो रणवीर नहीं समझता। वो सोचता है कि डर से गली चुप हो जाती है। पर गली चुप नहीं होती। गली चाय पीती है।
दोनों चले गए। काग़ज़ मेज़ पर पड़ा रहा। टिंकू ने उसे उठाकर मोड़कर अपनी जेब में डाल लिया।
"ये क्यों रखा?" मैंने पूछा।
"सबूत," उसने कहा। "गवाह की जगह खाली है। ये हमारा सबूत है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तू बड़ा होकर क्या बनेगा?"
"वकील," उसने कहा।
"वकील?"
"नहीं," उसने कहा। "वकील का डर होता है। मैं जज बनूँगा।"
शाम साढ़े पाँच बजे गली में रोशनी कम होने लगी, और मैंने सोचा कि आज का दिन निकल गया, और कल सुबह सात बजे मशीन।
और उसी वक़्त गली के मुँह से दो खाकी आए।
उनके आते ही भीड़ हट गई। लोग दीवारों की तरफ़ सरक गए, जैसे पानी किनारों पर चला जाता है।
छोटा सिपाही आगे था, हाथ में मुड़ा काग़ज़।
"अंकुश यादव?"
"हाँ।"
"भवन में रात को घुसने और काग़ज़ चुराने की प्राथमिकी है। चलिए।"
गली में सन्नाटा। माँ का हाथ मेरी कमीज़ पर था, और उसने पकड़ छोड़ी नहीं।
"इस काग़ज़ में लिखा है," सिपाही ने कहा, "कि आप रात दस बजे के बाद भवन में थे। तीन गवाह भी हैं।"
"मैं था," मैंने कहा।
"तो चलिए।"
"चलूँगा," मैंने कहा, "पर एक बात। मैं अपने पैरों से चलूँगा। हाथ नहीं पकड़िएगा। मैं भागता नहीं।"
वो कुछ देर मुझे देखता रहा, फिर हाथ पीछे कर लिया।
मैंने माँ की तरफ़ मुड़कर देखा।
"माँ, ज़रा मेरी कमीज़ ठीक कर दीजिए।"
उनकी आँखें भर आईं, पर उन्होंने कमीज़ ठीक की।
"काजल," मैंने कहा।
"मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं। तू माँ के साथ रह।"
"अंकुश—"
"काजल," मैंने कहा। "तू सफ़ेद कोट पहने खड़ी है। आज तू सिर्फ़ बहन नहीं है। आज तू वो है जिसे लोग देखकर कहेंगे कि अस्पताल का भी कोई है। तेरी जगह यहाँ है। और मेरी जगह वहाँ।"
वो रुकी। फिर बोली, "अगर तुझे कुछ हुआ, तो मैं सारी दुनिया की खाल उतार दूँगी।"
"बस इसी लायक है तू," मैंने कहा और मुस्कुराया।
और फिर पापा आगे आए।
वो मेरी तरफ़ नहीं, सिपाही की तरफ़ बढ़े। दो कदम। रिंच उनके हाथ में थी।
"मैं भी चलूँगा," उन्होंने कहा।
आवाज़ धीमी थी, पर ऐसी कि सिपाही ने एक बार ठिठककर देखा।
"आप कौन?"
"मैं उसका पिता हूँ," पापा ने कहा। "और मैं उस रात भवन में था। बेटा नहीं।"
मेरी साँस रुक गई।
"पापा—"
"चुप," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "बाईस साल से मैंने तेरी माँ को भी चुप कराया है। अब नहीं।"
सिपाही ने दोनों को देखा और कहा, "दोनों को चलना है।"
चलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। पूरी गली खड़ी थी। मीरा का कैमरा मेरे पीछे घूम रहा था। उस्ताद अपनी कुर्सी से उठे और उन्होंने हाथ ऊपर उठाया — बस दो अंगुल — जैसे किसी को रोका जाता है, या दुआ दी जाती है।
थाने में हल्की पीली रोशनी थी। बरामदे में एक कुर्सी थी और उस कुर्सी पर — दुबे अंकल।
वो पहले से बैठे थे। जैसे वो जानते थे कि हम आएँगे।
"बैठो," उन्होंने कहा, और सिपाही की तरफ़ देखा। "पहले काग़ज़ दिखाओ।"
सिपाही ने प्राथमिकी रख दी। दुबे अंकल ने अपने पास से एक पुरानी नीली कवर वाली कॉपी निकाली — वो उनकी निजी कॉपी थी, जिसे वो थाने में कभी नहीं छोड़ते थे।
उन्होंने प्राथमिकी उठाई। धीरे-धीरे पढ़ी। फिर उसकी तारीख़ पर उँगली रखी।
फिर वो रुके।
"ये तारीख़," उन्होंने कहा, "पिछले हफ़्ते की है।"
सिपाही ने कहा, "हाँ।"
"और काग़ज़ पर लिखा है कि इस लड़के ने रात दस बजे के बाद भवन में घुसकर अलमारी और दराज़ खोली।"
"हाँ।"
दुबे अंकल ने कॉपी खोली और उलटने लगे।
"इस लड़के की माँ पिछले हफ़्ते अस्पताल में भर्ती थी। मैंने खुद उसे अस्पताल छोड़ा था। अस्पताल का रजिस्टर माँग लो। उस रात ये लड़का वहीं था — रात दो बजे तक।"
मैंने देखा — सिपाही के हाथ की पकड़ ढीली हुई।
"और ये आपका स्टेशन है," दुबे अंकल ने कहा। "जैसे ही कोई प्राथमिकी आती है, कॉपी में नंबर लगता है। ज़रा ये प्राथमिकी का नंबर इधर दो — मैमैं मिलाकर देखता हूँ," दुबे अंकल ने कहा, और उन्होंने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींच लिया।
उन्होंने कॉपी के पन्ने उलटे। उँगली एक-एक लाइन पर धीरे-धीरे चलती रही, जैसे कोई बूढ़ा मिस्त्री किसी पुरानी मशीन के पुर्ज़े गिन रहा हो। बरामदे में छत का पंखा धीरे-धीरे खड़खड़ा रहा था। बाहर से किसी कुत्ते के रोने की आवाज़ आई, फिर चुप्पी।
सिपाही खड़ा था, हाथ पीछे बाँधे। पापा मेरे बगल वाली कुर्सी पर बैठे थे — सीधे, सख़्त, आँखें सामने। और मैं अपनी हथेली घुटने पर रखे बैठा था, और उस हथेली में घंटी थी। ठंडी। एकदम बर्फ़ जैसी ठंडी। जैसे वो खुद डर गई हो।
दुबे अंकल रुके।
"ये नंबर," उन्होंने कहा, और उँगली काग़ज़ के ऊपरी कोने पर टिकी रही, "इस कॉपी में नहीं है।"
सिपाही ने गर्दन आगे की, जैसे उसे ठीक से सुनाई न दिया हो। "क्या मतलब?"
"मतलब ये कि ये प्राथमिकी दर्ज ही नहीं हुई।" दुबे अंकल ने काग़ज़ उठाया और सिपाही की तरफ़ बढ़ा दिया। "थाने में प्राथमिकी दर्ज होती है, तो उसका नंबर इस कॉपी में आता है। ये नंबर यहाँ नहीं है। तो ये काग़ज़ कहाँ से आया?"
सिपाही के चेहरे का रंग उतर गया।
"साहब ने… चंद्रेश साहब ने दिया था—"
"साहब ने दिया," दुबे अंकल ने कहा, बिना उसे पूरी बात कहने दिए। "और तुम ले आए। बिना नंबर देखे। बिना तारीख़ देखे। बिना ये देखे कि जिस लड़के को तुम पकड़कर लाए हो, वो उस रात अस्पताल में था।"
सिपाही ने एक कदम पीछे किया।
"अंकल, मैं तो आदेश पर चला था।"
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