The Mysterious Bell1028 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1028

7 min read November 5, 2026

उसके जाने के बाद गली ने साँस लेनी चाही, पर साँस गले में ही फँस गई।

मैं वहीं खड़ा रहा — नए बोर्ड के नीचे। सागौन की लकड़ी, चमकदार, किनारे गोल किए हुए, ऊपर नीली पुताई में मेरी जगह किसी और का नाम। किसी ने मेहनत से लगाया था। चार लंबे पेंच, दो लोहे के कोने, नीचे तक सीधी लकीर। मुझे हँसी आई। मेरी दुकान पर मेहनत किसी और ने की — और वो भी मेरा नाम मिटाने के लिए।

फिर माँ की आवाज़ आई, थोड़ी पास से। "अंकुश, आ जा बेटा। धूप सिर पर है।"

मैं मुड़ा।

माँ काजल के सहारे खड़ी थीं। बैसाखी हाथ में, साड़ी का पल्लू कमर में, चेहरे पर वो थकान जो बीमारी की नहीं, डर की थी। उनके पीछे पापा खड़े थे — पुरानी नीली शर्ट, हाथ में रिंच। वो रिंच आज सुबह से उनके हाथ से नहीं छूटी थी। जैसे किसी ने उनसे कह दिया हो — अब तुम्हारे पास बोलने की जगह सिर्फ़ औज़ार है।

और उनके पीछे — पूरी गली।

शबनम आपा हाथ में लोहे की चिमटी लिए, उस्ताद अली बक्श अपनी सिलाई की कुर्सी उठाए, भोला भाई जिनका शटर आज सुबह से आधा गिरा था, किशनलाल काका जो चने का लोटा भी साथ लाए थे, नसीमा बाई, दुबे अंकल नीली शर्ट में, और पीपल की चबूतरी पर चारों जासूस — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।

गुमटी के किवाड़े के पीछे से एक चेहरा झाँक रहा था — रज़िया।

और सबसे आगे मीरा खड़ी थी। कैमरा चालू। लाल बत्ती जल रही थी।

मैंने कैमरे की तरफ़ देखा और हाथ उठाकर कहा, "मीरा, ये बंद कर दे।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज मैं कुछ ऐसा कहने वाला हूँ जो मैं कैमरे के लिए नहीं, इन लोगों के लिए कहना चाहता हूँ।"

मीरा ने एक पल मुझे देखा, फिर कैमरा नीचे किया। बत्ती बुझी। और मुझे लगा कि हवा फिर से चलने लगी है।

मैं चबूतरी की तरफ़ गया। पत्थर पर चढ़ा। मेरी जेब में घंटी थी — अब भी ठंडी, बर्फ़ जैसी।

"सुनो," मैंने कहा। आवाज़ ज़ोर से नहीं, बस इतनी कि आख़िरी कतार तक पहुँच जाए। "जो अभी हुआ, वो सबने देखा। बोर्ड बदल गया। नाम मिट गया। साहब ने कह दिया कि ये गली उसने बनाई है।"

किसी ने कुछ नहीं कहा।

"मैं इतना ही कहूँगा," मैंने कहा। "मैंने ये गली नहीं बनाई। ये गली मेरे दादा ने भी नहीं बनाई। ये गली उन लोगों ने बनाई है जो रोज़ सुबह उठकर यहाँ चूल्हा जलाते हैं, शटर उठाते हैं, बच्चों को स्कूल भेजते हैं, बीमार के लिए दवा लाते हैं। साहब ने दीवारें नहीं बनाईं — साहब ने दीवारों में काग़ज़ ठोके हैं।"

किशनलाल काका ने चने का लोटा नीचे किया।

"आज पाँच बजे कोई काग़ज़ आएगा," मैंने कहा। "उस पर मेरे हस्ताक्षर माँगे जाएँगे। मैं साफ़ कह देता हूँ — मैं हस्ताक्षर नहीं करूँगा। और मैं ये भी नहीं कहूँगा कि आप लोग भी मत करना। क्योंकि आप बड़े हैं, आपको अपना घर चलाना है, आपका डर असली है।"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए थे और आँखें बंद करके सुन रहे थे, जैसे कोई पुराना राग सुन रहे हों।

"पर एक बात," मैंने कहा। "जो आज काग़ज़ पर कुछ लिखेगा, उसके लिए मैं इतना करूँगा — मैं उसका नाम याद रखूँगा। हमेशा के लिए। क्योंकि मैं लोगों को भूलता नहीं। मैं साइकिल ठीक करता हूँ, और जो पुर्ज़ा जहाँ लगा था, वो मुझे हमेशा याद रहता है।"

ये सुनकर भोला भाई ने आँखें पोंछीं।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"मीरा का कैमरा ले और पूरी गली की एक तस्वीर खींच। आज की तारीख़ काग़ज़ पर लिखकर पीछे चिपका दे।"

"क्यों?"

"क्योंकि आगे किसी दिन कोई कहेगा कि इस दिन इस गली में इतने लोग नहीं थे। और हम उसे तस्वीर दिखा देंगे।"

टिंकू ने कैमरा दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई तीर्थ का घड़ा पकड़ता है। और मैंने देखा — वो आज पहली बार ख़ुश हुआ।

दोपहर ढलने लगी। गली खाली नहीं हुई, पर चुप हो गई। लोग अपनी दुकानों पर लौट गए, पर जैसे कोई सेना युद्ध से पहले अपनी जगह लेती है।

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। गुनगुनाता बल्ब, चारपाई, औज़ारों का ट्रंक, लोहे की अलमारी। माँ ने रोटी का टिफ़िन फ़र्श पर रख दिया और बिना कुछ कहे चली गईं। मैंने ढक्कन खोला — दो रोटियाँ, आलू, अचार। और एक पर्ची — "खा लेना। बहाना मत बनाना।"

मैं हँसा। बीमार माँ भी पहले मेरी भूख देखती है, फिर अपनी दवा।

टिंकू दौड़कर आया। "उस्ताद, भोला भाई की बेटी आरज़ू — उसकी दवा सिर्फ़ आज रात तक है। भोला भाई कह रहे थे कि वो अस्पताल जाएँगे।"

मैंने रोटी नीचे रख दी।

"काजल कहाँ है?"

"अस्पताल गई है। कह रही थी कि फार्मेसी वाले से बात करेगी।"

"अकेली?"

"माँ के साथ।"

मैं उठा। "टिंकू, दुकान बंद मत करना। कोई आए तो कहना — उस्ताद ज़रूरी काम से गए हैं, पंद्रह मिनट में लौटेंगे।"

"उस्ताद, आप पंद्रह मिनट में कभी नहीं लौटते।"

"तो कहना — लौटेंगे।"

मैं निकला। गली में धूप तिरछी हो गई थी। पीपल की छाया लंबी हो रही थी, जैसे कोई हाथ फैलाकर गली को थाम रहा हो।

अस्पताल के गेट पर गोविंद भाई खड़े थे। हाथ में नींबू-मिर्ची का हार, हाथ काँपता हुआ। मुझे देखकर उन्होंने हार थोड़ा ऊपर उठाया, फिर नीचे कर दिया, जैसे शर्मिंदा हों।

"गोविंद भाई," मैंने कहा। "आप रोज़ यहाँ खड़े क्यों होते हैं?"

"मुझे नींद नहीं आती," उन्होंने कहा। आवाज़ रेत जैसी। "मैं सोचता हूँ कि कल रात कोई और होता तो… क्या वो भी अंगूठा लगा देता?"

"नहीं," मैंने कहा।

"आप कैसे कह सकते हैं?"

"क्योंकि आज सुबह पूरी गली खड़ी थी और किसी ने हाथ नहीं उठाया। बस इतना ही काफ़ी है, गोविंद भाई।"

वो कुछ देर मेरा चेहरा देखते रहे। फिर उन्होंने हार मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये मैंने… अपने लिए लाया था।"

"अपने लिए हार क्यों?"

"क्योंकि जब भी मैं अंदर जाता हूँ, मुझे लगता है कि मेरा हाथ पकड़ा जाएगा।"

मैंने हार लिया और उनके हाथ में वापस रख दिया। "आज मत पहनो। आज आपको हार नहीं चाहिए। आज आपको हिम्मत चाहिए। शाम को गुमटी पर आ जाओ।"

वो सिर हिलाकर चले गए। जाते-जाते दो बार पीछे मुड़कर देखा, जैसे कोई अभी भी सोच रहा हो कि मैं उसे बुला लूँगा।

अस्पताल के अंदर दवा की खिड़की पर रजिस्टर वाला आदमी थका हुआ बैठा था।

"काजल?" मैंने पूछा।

"डॉक्टर साहब के कमरे में हैं।"

मैं ऊपर गया। सीढ़ियों पर धूल थी और किसी की चप्पल का निशान। सीढ़ी के पास वही काग़ज़ चिपका था जो दो दिन पहले लगा था — "आज रात बारह बजे से सीढ़ी बंद।"

आज रात बारह।

मैंने आज की तारीख़ देखी — काग़ज़ पर आज की तारीख़ नहीं, कल की थी। यानी मेरे पास एक रात का वक़्त और था।

डॉक्टर इसरानी के कमरे में काजल सफ़ेद कोट पहने खड़ी थी। बड़ा कोट, कंधों से फिसलता हुआ — उनकी ही बीवी का पुराना कोट, जिसे वो पहनती थीं, और अब काजल पहनती थी, इतने बड़े हाथ जो थे उनके।

"दो पत्ते," काजल ने कहा। "बस दो पत्ते। कल सुबह तक की दवा।"

"और फार्मेसी वाले ने क्या कहा?"

"कह रहा है — काग़ज़ साफ़ होने तक नई खेप रुकी है।"

डॉक्टर इसरानी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा। "बेटा, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। मैंने शिकायत लिखी थी — अपने हाथ से, नीली स्याही से। वो किसी और को देनी थी, अपने हाथ से देनी थी। पर मैंने दी नहीं। आज तक।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं डरा हुआ आदमी हूँ," उन्होंने कहा, और ये उन्होंने इतने आराम से कहा जैसे कोई रोज़ का सच बता रहा हो। "मैंने इस अस्पताल में इतने लोगों को ठीक किया, पर एक काग़ज़ से नहीं जीत सका। और अब जब पूरी गली चलेगी, तो शायद मेरी शिकायत भी चले।"

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