The Mysterious Bell – Chapter 1027
"तो," मीरा ने कहा, "यह चाबी जो आप हवा में घुमा रहे हैं — इसे हमारे सामने रखिए। और यह जो काग़ज़ आप अंकुश से हस्ताक्षर करवाना चाहते हैं — यह भी हमें दिखाइए। ताकि गली जान सके कि आपने किस कीमत पर यह सब बेचा है।"
गली में हलचल हुई। शबनम आपा एक कदम आगे आईं। उनके पीछे उस्ताद आए। फिर भोला भाई आगे आए। फिर किशनलाल काका, नसीमा बाई, दुबे अंकल।
पूरी गली एक-एक कदम आगे आ रही थी। धीरे-धीरे।
जैसे किसी कोशिश में, कोई रस्सी खींच रहा हो और सब उसे पकड़ रहे हों।
रणवीर ने गली को देखा। उसकी मुस्कान अब भी थी, पर वो मुस्कान पतली हो गई थी, जैसे कोई चीज़ अंदर से चटक गई हो।
"अच्छा," उसने कहा। "तो अब यह तमाशा है।" उसने हाथ उठाया और मीरा के कैमरे की तरफ़ इशारा किया।
"मीरा जी," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो कभी शहद जैसी लगती है और कभी ज़हर जैसी। "आपने अपने चैनल पर पाँच साल पहले एक खबर चलाई थी। रमा मैडम के बारे में। मुझे याद है। आप उस वक़्त मेरे दफ़्तर में आई थीं। और मैंने आपको कुछ काग़ज़ दिखाए थे। और आपने उन काग़ज़ों को सच मान लिया था। और उसके बाद — आपने कभी मेरे पास आकर पूछा नहीं कि मैंने वो काग़ज़ क्यों दिए थे।"
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
मैंने उसे देखा। उसका हाथ कैमरे पर काँपा, पर वो रुका नहीं।
"हाँ," उसने कहा, धीरे से। "मैंने पूछा नहीं। यह मेरी ग़लती थी। और यह ग़लती मैं आज पूरी गली के सामने कबूल कर रही हूँ। पर आज जो सवाल है, वो मेरी ग़लती का नहीं है। आज सवाल यह है कि यह चाबी किस ताले की है, और आप इस काग़ज़ पर हस्ताक्षर क्यों चाहते हैं।"
गली में एक शांत, लंबी सन्नाटा छा गई।
और तभी उस्ताद अली बक़्श आगे आए।
उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"रणवीर बेटा," उन्होंने कहा, और उनका हाथ अपनी लाठी पर टिका हुआ था, "मैं तुम्हें तब से जानता हूँ जब तुम इस गली में पहली बार आए थे। तुम्हारे बाप खलील भारद्वाज भी साइकिल ठीक करते थे। यह गली उनकी थी। तुम्हारा बचपन यहीं का है। तुम्हारी पहली साइकिल यहीं ठीक हुई थी — मेरी दुकान से चार कदम दूर, शंकर यादव के हाथ से। तो यह मुझे बताओ — तुम आज जो कर रहे हो, वो अपने बाप की गली के साथ कर रहे हो। तुम्हारे बाप को क्या जवाब दोगे?"
रणवीर उसकी तरफ़ मुड़ा। और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — नाराज़गी नहीं, थकान।
"उस्ताद," उसने कहा। "मेरे बाप ने यह गली छोड़ी थी। मैंने नहीं छोड़ी। मैंने यहाँ बड़ी इमारतें खड़ी कीं। मैंने सड़कें बनवाईं। मैंने स्कूल बनवाए। मेरे बाप ने सिर्फ़ साइकिल ठीक की थी। गली को आगे बढ़ाना मेरा काम है।"
"आगे बढ़ाना?" उस्ताद ने धीरे से दोहराया। "या अपने बाप की जगह लेना?"
रणवीर के चेहरे पर पहली बार कुछ टूटा। एक पल के लिए। बस एक पल।
फिर उसने मुस्कान वापस लगाई और सीधा मेरी तरफ़ आया, और मेरे सामने खड़ा होकर चाबी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"पाँच बजे तक का वक़्त," उसने कहा। "धोखा नहीं। बस जवाब — हाँ या ना। हाँ कहो तो चाबी तुम्हारी। ना कहो तो यह चाबी आज से उस ताले में हमेशा के लिए घूम जाएगी।"
उसने चाबी हवा में घुमाई। और मैंने उसे देखा — वो लोहे की चाबी — मेरे हाथ में आने के बस इतनी दूर।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
और मन में वो सब आया जो रात को आया था। माँ का डिब्बा। सात सौ इकहत्तर रुपये। माँ की चिट्ठी — "पैसा सब कुछ नहीं होता।" टिंकू का कार्डबोर्ड माइक, जिस पर उसने लिखा था — "जोड़ स्कूल"।
जोड़ स्कूल।
जोड़।
मैंने अपनी आँखें खोलीं।
"रणवीर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब बिल्कुल शांत थी। "मुझे वो याद चाहिए। सच में चाहिए। पर मैं तुमसे नहीं लूँगा।"
उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"क्योंकि यह याद," मैंने कहा, और अपने सीने पर हाथ रखा, "यह जो याद है न, यह कभी किसी दुकान से नहीं लौटेगी। यह जो खोई है, यह किसी ताले में नहीं है। यह मेरे रिश्तों में है। और रिश्ते ताले से नहीं खुलते — सच बोलने से खुलते हैं।"
मैंने रुककर उसकी आँखों में देखा।
"मैं बोर्ड को हाथ नहीं लगाऊँगा। यह तुम्हारा है। पर मैं चाबी भी नहीं लूँगा। क्योंकि जो याद मैं खुद जीतकर लौटाऊँगा, वो मेरी होगी। और जो चाबी से लौटेगी… वो तुम्हारी होगी। तुम्हारी जेब में बंद। हमेशा।"
गली में सन्नाटा छा गया।
माँ की आवाज़ आई, हल्की सी। "अंकुश…"
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्योंकि अगर देखा, तो कहीं ना कहीं हिल जाऊँगा, और अभी हिलने का वक़्त नहीं था।
रणवीर ने चाबी को देखा। फिर मुझे देखा। फिर गली को। उसकी मुस्कान अब भी थी, पर उसके पीछे कुछ और था — कुछ ऐसा जो पहले कभी नहीं था।
"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी थी। "तो तुम सोचते हो कि तुम अपनी याद वापस पा सकते हो। बिना मेरे? बिना इस चाबी के?"
"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "पर मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारे ताले से मुझे याद नहीं मिलेगी — बस तुम्हारा एहसान मिलेगा। और मुझे तुम्हारा एहसान नहीं चाहिए।"
रणवीर ने चाबी जेब में डाली। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाकर नए बोर्ड पर हल्की सी थपकी दी — जैसे कोई अपने नए फ़र्नीचर को सहलाता हो।
"ठीक है," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में मिठास नहीं थी। सिर्फ़ एक ठंडी सी शांति थी। "पर एक बात याद रखो। आज शाम पाँच बजे तक अगर हमारा काम नहीं हुआ, तो कल सुबह सात बजे मशीन आएगी। और अगली बार जब मैं वापस आऊँगा, तो यह गली, यह दुकान, यह बोर्ड — सब कुछ काग़ज़ों में मेरा होगा। और तुम्हारी याद — वो ताले में हमेशा के लिए बंद रहेगी।"
वो मुड़ा।
और फिर, जाते वक़्त, उसने पीछे मुड़कर कहा — और यह बात उसने पूरी गली से कही, मुझसे नहीं।
"आप सब सुन लीजिए। मैंने यह गली खरीदी नहीं थी। मैंने इस गली को बनाया है। और आज से यह गली मेरी है। जो मेरे साथ है, उसका साथ है। और जो मेरे खिलाफ़ है… वो अपने को सँभाल ले।"
वो चला गया। उसके पीछे उसके आदमी चले।
गली में लोग खड़े रहे, साँस नहीं ले रहे थे, जैसे कोई तूफ़ान गुज़र गया हो और उन्हें पता नहीं कि तूफ़ान लौटेगा या नहीं।
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब भी ठंडी थी।
और मैंने मन में सोचा — रणवीर ने कहा, आज शाम पाँच बजे। और वो यह भूल गया… कि पाँच बजे से पहले हमें दस बजे दफ़्तार भी जाना है।
और दस बजे से पहले सात बजे वाली मशीन भी रोकनी है।
तीन जंग, एक दिन।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर वापस आ गया था जो कल रात गया था।
"डर मत," मैंने कहा, और उसके सिर पर हाथ रखा। "याद रख — बोर्ड बदला, दुकान नहीं। दुकान वो है जहाँ हम औज़ार टाँगते हैं। और आज हमें अपने औज़ार टाँगने हैं।"
मैंने बोर्ड की तरफ़ आख़िरी बार देखा।
सागौन की लकड़ी। अच्छी लकड़ी। पर लकड़ी में दरारें पड़ती हैं। और मैं उन दरारों को जोड़ना जानता हूँ — तोड़ना नहीं।
क्योंकि मैं साइकिल मरम्मत करने वाला हूँ।
और साइकिल कभी एक बार में ठीक नहीं होती।
एक-एक पहिया। एक-एक पेंच।
आज पहला पहिया।
आज माँ का डिब्बा, पापा की रिंच, मीरा का कैमरा, उस्ताद की सुई, टिंकू का माइक, भोला की दवा, और इस गली का हर चेहरा — सब एक साथ।
और मशीन सात बजे आएगी।
पर आज सात बजे से पहले, एक बात होगी, जो रणवीर नहीं जानता।
क्योंकि रणवीर ने सिर्फ़ बोर्ड बदला है।
गली नहीं।
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