Spirit of a Fighter993 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 993

7 min read November 5, 2026

"मैंने भवानी को नहीं, भवानी के नाम को ज़हर दिया।" उसकी आवाज़ पत्थर पर पत्थर रगड़ने जैसी हो गई। "देख, आज गाँव भवानी का नाम सुनकर सिर झुकाता है, पर उसकी डायरी में जो लिखा है, वो कोई नहीं जानता। वो जानता था कि मैं क्या कर रहा हूँ। पिछले कुछ महीने से वो मेरी गंध पहचानने लगा था।"

"और तुमने उसे चुप करवा दिया," मैंने कहा। "तुमने उस पर भी ज़हर चढ़ाया।"

"हर आदमी को ख़ामोशी का दाम पता होता है," प्रताप सिंह बोला। "तेरे पिता को मैंने सस्ते में खरीदा था।"

मेरे अंदर कुछ टूटा। मैंने कदम बढ़ाया, पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ सख़्त थी, और उनकी आवाज़ मेरे कान में बहुत पास से आई — "बेटा, यही वो चाहता है। तुझे गुस्सा चाहिए। उसे तेरा गुस्सा चाहिए, तेरी ताक़त नहीं।"

मैं रुका। मेरी साँस तेज़ थी, हाथ काँप रहे थे।

कमला देवी आगे आईं। उनके हाथ में वो पीली शीशी थी। उन्होंने उसे धूप में उठाया।

"प्रताप," उन्होंने कहा। "ये शीशी मैंने तीस साल पहले उसी रात उठाई थी। उस रात तूने अपना चेहरा ढका था। पर तेरे हाथ नहीं छिपे थे। तेरी उँगली पर वो ज़ख़्म था जो भवानी के लोहे के कड़े से लगा था। आज भी है?"

प्रताप सिंह की उँगली त्रिशूल पर कस गई।

"आज तक नहीं भरा," कमला देवी ने कहा। "भगवान का दिया हुआ ज़ख़्म भर जाता है। इंसान का दिया नहीं।"

उसी पल रणवीर सिंह सीढ़ी से ऊपर आए। उनके हाथ में वो छोटी तस्वीर थी। उन्होंने उसे धूप में उठाया और प्रताप सिंह की तरफ़ बढ़ा दिया।

"देख," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भर्राई हुई थी, बस एक ही शब्द निकला। फिर उन्होंने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया, और उनकी आँखों से पानी बहने लगा। छोटे-छोटे बच्चों की तरह, बिना आवाज़।

"ये तो वो दिन है," वो फूट-फूटकर बोले, "जब भवानी ने मुझे अखाड़े का मालिक बनाया था। मेरे हाथ में मिट्टी डाली और कहा — 'आज से ये अखाड़ा तेरा।' मैंने उस दिन सोचा था कि मेरी ज़िंदगी बन गई।"

उन्होंने तस्वीर को सहलाया।

"और उसी दिन, उसी शाम, विक्रम ने कसम खाई थी। मैंने उसे अखाड़े के बाहर खड़े देखा था — अंधेरे में, मिट्टी में हाथ डालकर। मुझे लगा वो रो रहा है। मैंने सोचा, बेचारा। मैं उसके पास गया भी था, उसे चाय पिलाने के लिए।"

उनका गला रुंध गया।

"उसने मना कर दिया था। कहा — 'भाई, आज मेरे हिस्से की चाय नहीं। आज मैं तेरे हिस्से की कसम खा रहा हूँ।' मैं हँसा था। मैं हँसा था, वीर। मैंने उसकी बात को मज़ाक समझा।"

रणवीर सिंह तस्वीर को सीने से लगाए खड़े रहे, और उनका शरीर ऐसे हिल रहा था जैसे बाहर बारिश हो रही हो और वो भीग रहे हों।

प्रताप सिंह ने एक कदम पीछे लिया। उसका चेहरा बदल रहा था — पहली बार, उस ठंडी मुस्कान में एक दरार पड़ी।

"बीस साल," जगत सिंह ने कहा। उन्होंने डंडा ज़मीन पर मारा, और आवाज़ पूरे आँगन में गूँजी। "बीस साल तूने इस गाँव के बच्चों को अपना पानी पिलाया। तूने उनके पिताओं को ख़त्म किया। तूने भैरव को ज़हर का आदी बनाया, और आज तू खुद भैरव के नाम से ठाकुर को फँसा रहा है।"

"ठाकुर ने मुझे पैसे दिए," प्रताप सिंह ने कहा। पर उसकी आवाज़ का पत्थर अब वैसा नहीं था। "मैंने उसका काम किया। उसने मुझे ज़मीन दी, नाम दिया, बीस साल तक मेरे नाम की धूल उड़ाने से बचाया।"

"और भैरव?"

"भैरव मेरा हथियार था। जो हाथ चलाए, वो कलम नहीं जानता। मैंने उसे बस चलाना सिखाया।"

॥

"मैंने उसे बस चलाना सिखाया।"

ये शब्द हवा में लटके रह गए। अखाड़े के आँगन में जितने लोग खड़े थे, सब सन्न। किसी ने साँस तक नहीं ली। दूर कहीं नीम के पेड़ पर कौवा बोला, और वो आवाज़ इतनी ज़ोर से आई कि लगा किसी ने आँगन में चीख दी हो।

प्रताप सिंह की उँगली त्रिशूल पर से हटी। उसने उसे ज़मीन में टिकाया और दोनों हाथ उसके सिरे पर रख दिए। मुद्रा ऐसी कि कोई पुजारी मंदिर के दरवाज़े पर खड़ा हो।

"अब जो करना है कर लो," वो बोला। "मैंने अपनी बात कह दी। जो बीज मैंने बोया, वो उग चुका। अब फसल काटो।"

रणवीर सिंह ने तस्वीर सीने से नहीं हटाई। उनकी आँखों से पानी सूख चुका था, पर चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने अंदर से सब खाली कर दिया हो। उन्होंने धीरे से कहा, "मैं जानता था। बीस साल से जानता था कि वो अकेला नहीं था। भैरव में इतनी अक्ल नहीं थी कि इतना बड़ा जाल अकेला बुन ले। पर मुझे नाम नहीं पता था। और बिना नाम के आरोप लगाना… बिना नाम के आरोप लगाना तो अपने ही हाथ काटने जैसा है।"

"अब नाम है," जगत सिंह ने कहा। उनका डंडा फिर ज़मीन पर पड़ा, और इस बार आवाज़ कम थी, पर भारी।

मीरा ने अपना बैग खोला। उसके हाथ तेज़ थे, पर काँप रहे थे। उसने अंदर से एक भूरी डायरी निकाली और उसके पन्ने पलटने लगी।

"अब हमें ठाकुर के पास जाना है," वो बोली। "पर इस बार खाली हाथ नहीं। इस बार पूरा रिकॉर्ड, पूरे नाम, पूरी तारीख़ें। जो कुछ भवानी जी ने लिखा, जो कुछ मुंशीजी के काग़ज़ों में है, जो गंगा देवी ने कबूला — सब एक जगह।"

"नहीं।"

सबने मेरी तरफ़ देखा। मैंने एक कदम आगे रखा। मेरे अंदर कुछ ठंडा हो रहा था — गुस्सा नहीं, कुछ और। जैसे नहर का पानी सर्दी में जम जाता है, ऊपर से शांत दिखता है, नीचे बहता रहता है।

"पहले भैरव से मिलना होगा।"

"वीर," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो झिड़की थी जो अब मैं पहचानने लगा था, "वो जेल में है। उसने खुद को मारने की कोशिश की है। वो कुछ नहीं बोलेगा।"

"वो बोलेगा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वो सिर्फ़ एक आदमी के सामने बोलेगा। और वो आदमी मैं हूँ।"

प्रताप सिंह हँसा। एक छोटी, सूखी हँसी। "बेटा, तू अभी भी समझा नहीं। भैरव मेरा हाथ था। हाथ कट जाए तो दर्द होता है, पर आदमी ज़िंदा रहता है। तू हाथ से लड़ रहा है, और साँप तेरे सामने बैठा मुस्कुरा रहा है।"

"तो साँप को भी उतार लेंगे," मैंने कहा। "पर पहले हाथ से पूछ लेंगे कि साँप कहाँ छुपा है।"

जगत सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी अंधी आँखें किसी को नहीं देखती थीं, पर उनका चेहरा मेरी तरफ़ था — ठीक उसी तरह जैसे कोई सुनने वाला अपना कान आगे करता है।

"ये लड़का," उन्होंने धीरे से कहा, "भवानी की मिट्टी से बना है।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने आगे आकर कहा, "प्रताप सिंह, तुम्हें गिरफ़्तार करना पड़ेगा।" उनके सिपाही उसकी तरफ़ बढ़े। प्रताप सिंह ने त्रिशूल नहीं छोड़ा, पर विरोध भी नहीं किया। उसने बस उसे सिपाही के हाथ में दे दिया, जैसे कोई पुरानी लाठी किसी को सौंपता है।

जाते वक़्त वो रुका। उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।

"एक बात सुन ले, वीर सिंह।" उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी, बस थकान थी। "तेरे पिता ने आख़िरी साँस तक मुझे माफ़ नहीं किया। उसने मरते वक़्त भी कहा था — 'मैं तुझे माफ़ नहीं करता, पर मैं तेरे पीछे नहीं पड़ूँगा। मेरा बेटा पड़ेगा।' मैं बीस साल उस बेटे से डरता रहा। आज देख लिया। तू उससे भी ख़तरनाक है।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि वो गुस्से में मरा," प्रताप सिंह ने कहा। "तू अभी तक गुस्से में नहीं आया। और जो आदमी गुस्से में नहीं आता, वो हिसाब रखता है। हिसाब वाला आदमी सबसे ख़तरनाक होता है।"

सिपाही उसे ले गए। उसकी परछाईं आँगन की दीवार पर बड़ी होती गई और फिर फाटक के बाहर गायब हो गई।

माँ ने मेरा हाथ छोड़ा। उन्होंने अपनी आँखें मलीं, जैसे कोई सोकर उठा हो और सपना सच हो गया हो। गुड़िया मेरी कमर से चिपकी खड़ी थी। उसने मेरी धोती पकड़ रखी थी, और उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

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