Spirit of a Fighter – Chapter 992
"उसी दिन विक्रम दीवार के पीछे खड़ा था," उन्होंने कहा। "मैंने उसे देखा था, पर मैंने सोचा कि वो खुशी से देख रहा है। उसके हाथ में एक ईंट थी, और वो दीवार पर उँगली से कुछ खुरच रहा था। बाद में मैंने देखा — उसने लिखा था 'एक दिन'। बस इतना। एक दिन। उसने उसी दिन कसम खाई थी। और मैंने उसे गले लगाया था।"
उन्होंने तस्वीर अपने सीने से लगा ली। उनके कंधे हिल रहे थे। कमला देवी ने उनका कंधा थामा, पर वो नहीं रुके।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने फुसफुसाया। "बीस साल मैंने इस आदमी के साथ खाना खाया। मैंने इसके हाथ से पानी पिया। और ये मेरा दोस्त बनकर मेरे ही घर में मेरा ज़हर पकाता रहा।"
माँ आगे आईं। उन्होंने रणवीर सिंह का हाथ पकड़ा। "भैया," उन्होंने कहा, "अब रोने का वक़्त नहीं। अब गवाही का वक़्त है।"
कमला देवी ने अपनी कपड़े में लिपटी चीज़ खोली। वो एक पुरानी रसीदों की फ़ाइल थी, और उसके ऊपर रखी थी एक पीली शीशी — वैसी ही जैसी मेरे पास थी, बस छोटी।
"ये शीशी मैंने उस रात उठाई थी," उन्होंने कहा। "भवानी के हाथ से गिरी थी। मैंने इसे तीस साल अपने आँचल में छिपाकर रखा। आज मैं इस गाँव के सामने इसे खोलूँगी।"
जगत सिंह ने डंडा ज़मीन पर टिकाया।
"और मैं गवाही दूँगा," उन्होंने कहा। "मैं वो आदमी हूँ जिसे भैरव ने मार डाला था — काग़ज़ों में। मैं ज़िंदा हूँ, और मैं इस अदालत में खड़ा होकर बताऊँगा कि कैसे एक शिष्य ने अपने गुरु को कुएँ में फेंका।"
तभी ऊपर से पैरों की आवाज़ आई। तेज़। एक आदमी सीढ़ियों से गिरता-पड़ता उतरा। पुलिस की वर्दी थी, कपड़े पर धूल, माथे पर पसीना।
"इंस्पेक्टर शर्मा ने भेजा है," वो हाँफते हुए बोला। "साहब, भैरव ने… भैरव ने हिरासत में खुद को मारने की कोशिश की है।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्या?" मैंने कहा।
"कपड़े की पट्टी से," सिपाही बोला। "पर पकड़ा गया। अब वो बोल रहा है। बकने लगा है। और उसने एक चिट्ठी छोड़ी है — तकिये के नीचे। इंस्पेक्टर साहब ने पढ़ी।"
वो रुका। उसका गला सूख रहा था।
"क्या लिखा है?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी।
सिपाही ने अपनी जेब से एक पर्ची निकाली, जैसे उसे छूने से भी डर लग रहा हो।
"चिट्ठी पर बस एक नाम है, साहब। एक ही नाम।" उसने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ठाकुर महेंद्र सिंह।"
तहखाने में जैसे हवा रुक गई।
जगत सिंह ने धीरे से अपना डंडा ज़मीन पर मारा। एक आवाज़ हुई, जैसे कोई पुराना ताला टूटा हो।
"तो वो भी उसी जाल में था," उन्होंने कहा। "मुझे शक था। ठाकुर… वो आदमी जिसने मेरी आँखों के सामने मेरा नाम बेचा।"
मैंने पर्ची पकड़ी। काग़ज़ ठंडा था। और उस पर, नीली स्याही में, वो नाम लिखा था — साफ़, बड़े अक्षरों में, जैसे किसी ने लिखते वक़्त हाथ नहीं काँपा हो।
मैंने काग़ज़ सूँघा। स्याही में कुछ था — कुछ जाना-पहचाना। गुड़ की चाशनी। वही गंध जो शेराज़ के कपड़ों से आती थी।
"ये चिट्ठी भैरव ने नहीं लिखी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ शांत थी, पर मेरे अंदर कुछ ठंडा हो रहा था। "ये किसी ने उसके हाथ में थमा दी। ताकि सारा इल्ज़ाम ठाकुर पर जाए और असली आदमी बच जाए।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो असली आदमी कौन है?"
मैंने डायरी उठाई। भवानी की आवाज़, भवानी के शब्द। और उन शब्दों में एक नाम था जो मैंने अभी पढ़ा था — प्रताप सिंह। जगत सिंह का सौतेला भाई। वो आदमी जिसने शीशी बनाई, जो बाहर से आया, जिसने भवानी को ज़हर दिया।
"वो मरा नहीं," मैंने कहा। "वो कहीं बैठा है, और वो देख रहा है कि हम कहाँ पहुँचे हैं।"
तभी ऊपर से एक और आवाज़ आई — किसी के दौड़ने की, और फिर किसी के चिल्लाने की। शब्द साफ़ नहीं थे, पर उसमें डर था। असली डर।
कालू काका ने लालटेन उठाई। "ये आवाज़…" उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "ये आवाज़ अखाड़े के फाटक से आ रही है।"
मैंने डायरी अपनी धोती की जेब में डाली, तस्वीर माँ के हाथ में दी, और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
"जो भी हो," मैंने कहा, "अब पीछे नहीं हटना। आज सच बाहर आएगा — चाहे जो हो जाए।"
और जैसे ही मैंने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, ऊपर से एक आवाज़ गूँजी — भारी, मीठी, और बर्फ़ जैसी ठंडी।
"वीर सिंह! नीचे मत आ। मैं तेरे अखाड़े के फाटक पर खड़ा हूँ, और मेरे हाथ में वो चीज़ है जो तेरे पिता की आख़िरी साँस तक उनके सीने में धड़क रही थी।"
वो आवाज़ सुनकर मेरे पैर सीढ़ी पर ही जम गए। माँ ने मेरा कुर्ता पीछे से खींचा।
"वीर, रुक। अंधेरे में मत जा।"
"वो अंधेरे में नहीं है, माँ," मैंने कहा। "वो हमें रोशनी में बुला रहा है।"
जगत सिंह मेरे बगल से आगे बढ़े। उनका डंडा सीढ़ी की हर पायदान पर टक-टक करता गया, जैसे कोई गिनती कर रहा हो। "तेरा पिता," वो बड़बड़ाए, "अगर आज ज़िंदा होता, तो ये आवाज़ सुनकर सबसे पहले ऊपर भागता।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो आवाज़ उसे भी रुलाती थी। मुझे याद है — भवानी रातों को बैठकर इसी सुर में गाते थे, और तेरे पिता दीवार से टेक लगाकर सुनते रहते।"
हम ऊपर पहुँचे। अखाड़े का आँगन सुबह की धूप में नहाया खड़ा था, पर फाटक के बाहर आसमान कुछ और ही था — धूल की एक दीवार उड़ रही थी, जैसे किसी ने मिट्टी को हवा में फेंक दिया हो।
फाटक पर एक आदमी खड़ा था। लंबा, सफ़ेद कुर्ता, कंधे पर पुराना जनेऊ। चेहरा धूल में लिपटा था, और उसी धूल में उसकी आँखें चमक रही थीं। उम्र से ज़्यादा बूढ़ा लग रहा था, पर कमर सीधी थी।
उसके हाथ में एक लोहे की छड़ थी — नहीं, छड़ नहीं। एक पुराना त्रिशूल, जिसके तीनों सिरों पर ज़ंग लगी थी।
"ये है?" मैंने धीरे से पूछा।
जगत सिंह ने अपना डंडा कसकर पकड़ा। "ये है प्रताप सिंह। मेरा सौतेला भाई। जो तीस साल पहले मरे हुए लोगों की सूची में अपना नाम लिखवाकर चला गया था।"
प्रताप सिंह मुस्कुराए। उस मुस्कान में कुछ भी गर्म नहीं था — जैसे ठंडे पानी में पत्थर फेंको और लहर भी न उठे।
"भाई," उसने कहा। "तू अभी भी वही डंडा ढोता है? तीस साल से? भवानी ने तुझे बस एक डंडा दिया और तू उसे भगवान मान बैठा।"
"भवानी ने मुझे बहुत कुछ दिया।" जगत सिंह की आवाज़ में कंपन था, पर गुस्सा नहीं — कुछ और था, जो बहुत पुराना और बहुत भारी लगा। "उसने मुझे अपने घर में जगह दी जब तूने मुझे अपने घर से निकाल दिया था।"
"मैंने नहीं निकाला। तू खुद भागा था।"
"भागा नहीं। तूने मुझे मारने के लिए आदमी भेजे थे।"
प्रताप सिंह ने त्रिशूल घुमाया। ज़ंग में से एक हल्की चमक निकली। "और आज मैं खुद आया हूँ," उसने कहा। "क्योंकि आज मेरा आख़िरी काम बाकी है।"
मैंने एक कदम आगे रखा। "तुमने भैरव को ज़हर दिया। तुमने बीस साल तक उसके हाथ से पानी पिलाया। तुमने उसके पिता की मौत का बदला ऐसे लिया कि पूरा गाँव मरता रहा।"
प्रताप सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। ऐसे देखा जैसे मैं कोई चीज़ हूँ जो उसने बहुत पहले बेच दी हो।
"तेरे पिता ने मेरे पिता को हराया था," उसने कहा। "एक हार। बस एक हार। और मेरे पिता ने उस हार को अपने सीने में पाल लिया। रातों को उठकर अखाड़े की मिट्टी को कोसते रहे। मैंने उन्हें मरते देखा — हार से मरते हुए। भवानी ने उन्हें सिर्फ़ हराया था, पर उस हार ने मेरे पिता को खा लिया।"
"तो तुमने भवानी को ज़हर दिया।"
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