Spirit of a Fighter – Chapter 994
"भैया," उसने फुसफुसाया, "वो बूढ़ा जो तहखाने में था… वो सच बोल रहा था?"
"हाँ।"
"तो तुम्हारे पापा को… उसने ही…"
"हाँ।"
गुड़िया ने अपना चेहरा मेरी धोती में छुपा लिया। उसका शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था। मैंने उसका सिर सहलाया और कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप्पी ही सबसे बड़ी बात होती है।
टिंकू मेरे पास आया। उसका चेहरा पसीने से भीगा था और उसकी टोपी तिरछी हो गई थी। उसने धीरे से कहा, "भाई, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"जेल में तो सिपाही होंगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुराना डर था — वो डर जो हर उस आदमी की आँखों में होता है जिसने बचपन में दुकान की खिड़की से बाहर झाँककर दुनिया देखी है। मैं मुस्कुराया।
"तू मिठाई लेकर चल," मैंने कहा। "सिपाही भी इंसान हैं।"
टिंकू का चेहरा एक पल के लिए खुला, फिर फिर बंद हो गया। "मिठाई क्यों?"
"क्योंकि तेरी मिठाई खाकर इंसान नरम पड़ जाता है। और नरम आदमी से बात करना आसान होता है।"
"अरे, ये तो मुझे पहले बताना था," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी चहक लौटी। "मैं तो वैसे भी सोच रहा था कि दुकान पर आज की मिठाई बच गई है।"
"बची नहीं होगी," मैंने कहा। "तूने आधी रास्ते में खा ली होगी।"
"भाई, ये क्या बात हुई।"
हल्की हँसी आँगन में फैली। छोटी-सी, थकी हुई, पर असली। कभी-कभी हँसी भी दुआ जैसी होती है — जब सब कुछ टूट रहा हो, तब एक हँसी पूरा आसमान सहारा दे जाती है।
रात को हम तीन निकले। माँ ने दरवाज़े तक छोड़ा। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा और कुछ नहीं कहा। उनके हाथ की गंध — हल्दी, चक्की की धूल, और वो पुरानी दाल की खुशबू — मेरे साथ चल पड़ी।
रास्ता सूनसान था। चाँद आधा था और बादल उसे बार-बार ढक रहे थे। जेल गाँव से बाहर, पुराने पीपल के पेड़ के पीछे थी। जब हम पहुँचे तो दरवाज़े पर एक सिपाही चारपाई पर बैठा था और उसके हाथ में लोटा था।
टिंकू ने अपनी डिब्बी खोली। मिठाई की गंध — घी, इलायची, और उसमें मिली हुई गुड़ की चाशनी — रात की हवा में फैल गई।
सिपाही ने सिर उठाया।
"कौन?"
"सर," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठाई वाले की आवाज़ आ गई, "ठंडी रात है। ये लड्डू अभी-अभी बने हैं। आप खाइए, मन लगेगा।"
सिपाही ने डिब्बी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदला। मिठाई वाले की गंध किसी भी इंसान को उसके बचपन में ले जाती है।
"मैं ड्यूटी पर हूँ।"
"मैं भी," टिंकू ने कहा। "मैं भी ड्यूटी पर हूँ। मेरी ड्यूटी मिठाई बनाना है। और आपकी ड्यूटी ये दरवाज़ा देखना है। दोनों ड्यूटी वाले हैं। एक लड्डू से क्या फ़र्क पड़ेगा?"
सिपाही हँसा। छोटी-सी हँसी। उसने एक लड्डू उठाया और मुँह में रखा। फिर उसने पीछे मुड़कर देखा और धीरे से कहा, "भैरव सिंह अंदर है। तीसरे कमरे में। पर साहब ने कहा है कि किसी को मिलने नहीं देना।"
मैंने कहा, "सर, मैं उससे सिर्फ़ पाँच मिनट बात करूँगा। आप बाहर खड़े रहिए। अगर कुछ गड़बड़ हो तो आप अंदर आ जाइए।"
सिपाही ने मुझे देखा। रात में चेहरा ठीक से नहीं दिखता, पर मैं जानता हूँ कि वो मेरे कपड़ों से मेरी पहचान समझ रहा था — धोती, बनियान, टूटी चप्पल।
"तू वो लड़का है," उसने कहा। "अखाड़े वाला। जिसने आज पंचायत में सबको बोल दिया।"
"हाँ।"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने लोटा रखा और अपनी कुर्सी से उठा।
"पाँच मिनट," उसने कहा। "और अगर साहब पूछें तो मैंने तुझे देखा ही नहीं।"
"थैंक्यू सर," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में असली भरोसा था।
जेल के अंदर की हवा बाहर से अलग थी। उसमें उबकाई, पसीना, और गीली दीवारों की बू थी। मेरी नाक ने एक और चीज़ पकड़ी — कुछ जला हुआ। जैसे कोई दीया बुझा हो और उसकी कालिख अभी तक हवा में घुल रही हो।
तीसरे कमरे में भैरव सिंह बैठा था। उसकी कलाई में ज़ंजीर थी और ज़ंजीर का दूसरा सिरा दीवार में जड़ा था। उसकी लाल धोती मैली हो चुकी थी। मूँछें बिखरी हुई थीं, और उसके गले की सोने की चेन गायब थी। पर उसकी आँखें वही थीं — ठंडी, जैसे कुएँ का पानी।
वो उठा नहीं। बस सिर उठाया।
"तू आ गया," वो बोला। "मुझे पता था।"
मैं उसके सामने खड़ा रहा। मेरे पीछे मीरा और टिंकू खड़े थे। मीरा की डायरी उसके हाथ में थी, और टिंकू की डिब्बी अब खाली थी।
"तूने खुद को मारने की कोशिश की," मैंने कहा। "क्यों?"
"क्योंकि वो आदमी बाहर है," भैरव ने कहा। "और जो आदमी बाहर है, वो मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा। मैं जानता हूँ उसके बारे में बहुत कुछ। और अब जब वो जानता है कि मैं पकड़ा गया, तो वो मुझे ख़त्म करेगा। जेल में मरना बेहतर है, कम से कम मरने का तरीका मैं चुनूँगा।"
"तो तू डरता है?"
"डरता हूँ?" भैरव हँसा। उसकी हँसी में दाँत दिखे, जिनमें एक सोने का था। "बेटा, मैं तीस साल से उस आदमी के सामने झुककर खड़ा हूँ। डरना तो तब शुरू हुआ जब मैंने पहली बार उसे देखा था। उसने मेरी पीठ पर हाथ रखा और कहा — 'विक्रम, तू मेरा बेटा है।' उस दिन मैं समझ गया था कि उसका बेटा होना क्या होता है।"
"तू मेरा दुश्मन है," मैंने कहा। "पर आज मैंने तेरे उस्ताद को देखा। और तुझ पर तरस आया।"
भैरव का चेहरा बदला। एक पल के लिए उसकी आँखों में वो आग बुझी जो पंचायत में जल रही थी। फिर वो फिर जली, पर इस बार किसी और चीज़ से — शायद शर्म से।
"तरस," वो बोला। "तू मुझ पर तरस खाता है?"
"हाँ।" मैंने कहा। "क्योंकि तू बीस साल से जिस आदमी की सेवा कर रहा था, उसने आज एक पल में तुझे गिरा दिया। उसने ये नहीं कहा कि भैरव मेरा साथी था। उसने कहा — 'भैरव मेरा हथियार था।' हथियार। टूट जाए तो फेंक दो।"
भैरव ने अपना सिर नीचे किया। उसकी ज़ंजीर खनकी। उसकी साँस तेज़ हुई, फिर धीमी हुई।
"तू सही बोलता है," वो धीरे से बोला। "पर मैं तुझे मुफ़्त में कुछ नहीं बताऊँगा।"
मीरा आगे आई। उसकी आवाज़ ठंडी और साफ़ थी, जैसे वो कोर्ट में खड़ी हो। "तुझे बताना पड़ेगा। तेरे खिलाफ़ इतने सबूत हैं कि अदालत में तेरी एक बात नहीं सुनी जाएगी। पर अगर तू गवाही दे, तो सज़ा कम हो सकती है।"
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ चमका। "तू रणवीर की बेटी है। बिलकुल उसकी तरह बात करती है।" फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "पर मैं गवाही नहीं दूँगा। मैं उस आदमी के खिलाफ़ गवाही देकर अपने बेटे को मरवाना नहीं चाहता।"
"करण?" मैंने पूछा।
"हाँ, करण।" भैरव की आवाज़ में पहली बार कुछ नरम आया — शायद वो चीज़ जो हर बाप में होती है, बुरे से बुरे में भी। "तूने उसे बचाया। टिंकू ने बताया कि तू उसे स्कूल की बस से उठाकर लाया। वो अभी बेहोश है, है ना?"
"हाँ। मीरा ने उसे दवा दी है, पर वो होश में नहीं आया।"
"उसकी जान अभी भी ख़तरे में है," भैरव ने कहा। "क्योंकि जो ज़हर उसे दिया गया, वो प्रताप सिंह का नहीं था। वो मेरा था। और उसका तोड़ सिर्फ़ मेरे पास है।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। मैंने एक कदम आगे रखा, फिर रुक गया। माँ की बात याद आई — "उसे तेरा गुस्सा चाहिए।" मैंने साँस ली।
"क्या चाहिए तुझे?" मैंने पूछा।
भैरव ने अपनी ज़ंजीर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "ठाकुर के पास एक काग़ज़ है। वो आदमी जिसने बीस साल में किसी को नहीं दिखाया। उस काग़ज़ में सब नाम हैं, सब तारीख़ें। हर वो आदमी जिसे मैंने पानी पिलाया, कब पिलाया, कितना पिलाया, किसने कहा। उस काग़ज़ में प्रताप सिंह का नाम भी है, और ठाकुर का नाम भी।"
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