Spirit of a Fighter988 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 988

7 min read November 5, 2026

गंगा देवी ने अपना चेहरा फिर हाथों में छिपा लिया। इस बार वो रो रही थीं। सच में रो रही थीं। उनके कंधे हिल रहे थे।

"तू चिल्लाई थी," कमला देवी ने कहा। "तूने कहा था — भवानी, नहीं! और तू उनकी तरफ़ दौड़ी थी। तेरे हाथ भवानी की बाँहों पर थे जब वो गिरे। तेरे हाथ पर उनका ख़ून लगा था। पर तूने उन्हें मारा नहीं था, गंगा। तूने उन्हें बचाने की कोशिश की थी।"

कमरा सन्नाटे में डूब गया।

मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। वो हाथों के पीछे से कुछ बुदबुदा रही थीं, पर समझ नहीं आ रहा था।

"तो फिर…" मेरी आवाज़ निकली, फटी हुई। "तो फिर तुमने झूठ क्यों बोला? तुमने क्यों कहा कि तुम देखती रही?"

कमला देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था। कुछ और था। थकान। तीस साल की थकान।

"क्योंकि वो डर गई थी, बेटा," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद प्रताप के आदमी हर जगह थे। अगर गंगा ने ये बताया होता कि वो वहाँ थी, तो प्रताप उसे भी मार देता। और उसके पास टिंकू था। छोटा-सा बच्चा।"

टिंकू की तरफ़ देखा। वो खिड़की के पास खड़ा था, दोनों हाथ जोड़े हुए, आँखें झुकी हुईं। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।

"मैंने तुझे धमकाया था," गंगा देवी ने अचानक कहा। उन्होंने हाथ नीचे किए। उनका चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुईं। "मैंने तेरी माँ को धमकाया था, वीर। मैंने कहा था कि अगर उसने मुँह खोला, तो गुड़िया की जान जाएगी। मैंने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि मैं डर गई थी। मैं अपने बेटे को बचाना चाहती थी।"

वो मेरी तरफ़ बढ़ीं। उनके पैर लड़खड़ा रहे थे।

"पर मैंने तेरे पिता को नहीं मारा," उन्होंने कहा। "मैंने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की। मैंने उनके हाथ पकड़े। मैंने कहा — भवानी, तेरे बेटे के लिए मत कर। पर उन्होंने मुझे झटक दिया। उन्होंने कहा — गंगा, तू नहीं जानती उस आदमी को। वो वीर को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा। अगर मैं मर गया, तो वो सोचेगा कि बदला पूरा हुआ। और वीर बच जाएगा।"

गंगा देवी मेरे सामने आकर रुकीं। उनकी आँखों से पानी बह रहा था।

"तेरे पिता ने अपनी जान देकर तेरी जान बचाई थी, बेटा।"

मेरे घुटने जवाब दे गए।

मैं वहीं, हवेली के उस फर्श पर, जहाँ कुछ घंटे पहले सब खड़े थे, धँस गया। मेरे हाथ ज़मीन पर टिक गए। मेरी आँखों से पानी ऐसा बहा जैसे सालों का रुका हुआ पानी टूट पड़ा हो।

मैंने कमला देवी के पैर छू लिए।

"बस," कमला देवी ने कहा। उन्होंने मेरा सिर पकड़कर ऊपर किया। उनके हाथ ठंडे थे, सख़्त थे। "मत कर ऐसा। तू मेरे भाई का बेटा है। मेरे भाई ने जो किया, वो उसने अपने बेटे के लिए किया। अगर मैं उसकी जगह होती, तो मैं भी वही करती।"

मेरी आँखों से पानी रुक नहीं रहा था। मुझे शर्म नहीं आ रही थी। मैं पच्चीस साल का आदमी था, मज़दूर था, अखाड़े का पहलवान था, और मैं उस फर्श पर बैठकर रो रहा था जैसे कोई बच्चा।

तभी मुझे कंधे पर हाथ का एहसास हुआ।

मैंने पलटकर देखा। मीरा थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और दबाया। उसकी उँगलियाँ मेरे काँपते कंधे पर स्थिर थीं।

मुझे उसकी कलाई की गंध आई — हल्दी, अदरक, और उसके बैग से आती तुलसी की पत्तियों की। उसी में एक नई गंध थी — मिट्टी की। सूखी मिट्टी। जैसे किसी ने हाथ धोए बिना मेरा कंधा पकड़ा हो।

कोने से एक आवाज़ आई। हल्की। किसी के रोने की आवाज़, जो रोक नहीं पा रहा।

टिंकू था।

वो खिड़की के नीचे बैठ गया था, घुटने सीने से लगाए। उसकी टोपी सर से उतरकर पास पड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं और वो अपनी आस्तीन से नाक पोंछ रहा था।

"मेरे पापा ने मेरे लिए…" वो बोला, और फिर रुक गया। उसकी आवाज़ गले में अटक गई।

कमला देवी उसके पास गईं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"तेरे पापा ने तेरे लिए नहीं," उन्होंने कहा। "तेरे पापा ने सबके लिए किया। वो जानते थे कि अगर प्रताप को ये पता चला कि उसके हाथ में क्या है, तो वो पूरे गाँव को खा जाएगा। तेरे पापा ने एक आदमी की जान देकर पूरे गाँव की जान बचाई।"

टिंकू ने अपना चेहरा घुटनों में छिपा लिया। उसके कंधे हिल रहे थे।

कुछ देर तक कमरे में सिर्फ़ उसके रोने की आवाज़ गूँजती रही। गंगा देवी दीवार के सहारे खड़ी थीं। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली थीं।

फिर टिंकू ने अपना चेहरा उठाया। उसने आस्तीन से आँखें पोंछीं, और फिर कुछ ऐसा किया जो मुझे आज तक याद है।

वो खड़ा हुआ। अपनी जेब से चाबी निकाली। कमरे के कोने में उसकी मिठाई की डिब्बी रखी थी — वही पीतल वाली डिब्बी जो वो हमेशा साथ रखता था। उसने उसे खोला। उसमें लड्डू थे।

उसने एक लड्डू निकाला, और उसे ऊपर उठाकर, अपनी आँखों के सामने किया।

"इस डिब्बी में आज सबसे पहला लड्डू बाबा के नाम का," उसने कहा। आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "भवानी बाबा के नाम का। जिन्होंने मेरे पापा की जान बचाई। और जिनकी वजह से मैं आज यहाँ खड़ा हूँ।"

उसने वो लड्डू डिब्बी में वापस रखा। फिर उसने डिब्बी बंद की और उसे सीने से लगाया।

उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे। ये सबसे अजीब बात थी जो मैंने उस दिन देखी।

"अब तू मेरा भाई है," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "सगा भाई नहीं, पर सगे से बढ़कर। क्योंकि तेरे बाप ने मेरे बाप के लिए जान दी। और मेरे बाप ने तेरे बाप के लिए।"

मैं उठा। मैंने उसके कंधे पकड़े। उसने डिब्बी एक हाथ में ली और दूसरे हाथ से मेरी कलाई पकड़ी।

हम दोनों वहीं खड़े रहे। कोई कुछ नहीं बोला।

कमला देवी ने हमारी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में भी पानी था, पर उन्होंने अपना चेहरा जल्दी से दूसरी तरफ़ कर लिया। वो चलकर खिड़की के पास गईं और बाहर देखने लगीं, जैसे बाहर कुछ बहुत ज़रूरी हो।

गंगा देवी ने अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा, "मैं तेरी माँ के सामने खड़ी नहीं हो सकती। मैंने उसे धमकाया। मैंने उसका दिल तोड़ा। पर मैं ये भी जानती हूँ कि तेरे पापा ने मुझे माफ़ कर दिया था। उस रात, मरने से पहले, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था और कहा था — गंगा, टिंकू का ख्याल रखना। वो मेरा बेटा है, जैसे वीर मेरा बेटा है। दोनों को मेरी कसम, दोनों को बराबर रखना।"

उनकी आवाज़ फूट पड़ी।

"मैं वो कसम निभा नहीं पाई," उन्होंने कहा। "मैंने टिंकू को अपने पास रखा, पर वीर को अपने से दूर रखा। मैं डरती रही। तीस साल से डरती रही।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मेरे अंदर गुस्सा भी था, और कुछ और भी। कुछ ऐसा जो मैं समझ नहीं पा रहा था।

"तुमने मेरी माँ को अकेला क्यों छोड़ा?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "तुम जानती थीं कि सच क्या है। तुम जानती थीं कि मेरे पापा ने खुद को मारा। फिर भी तुमने मेरी माँ को अकेले जीने दिया। उसे लगता रहा कि उसके पति को किसी ने मारा।"

गंगा देवी ने अपना सिर नीचा किया।

"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं इसका जवाब नहीं दे सकती। मैं सिर्फ़ इतना कह सकती हूँ कि जब तू पैदा हुआ था, तो मैं दूर से खड़ी तुझे देख रही थी। और मेरे हाथ काँप रहे थे। मैं तेरी माँ के पास जाना चाहती थी। पर मैं नहीं जा सकी।"

कमला देवी खिड़की से पलटीं।

"अब बहुत हो गया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में फिर वो सख़्ती आ गई थी। "बहुत देर हो चुकी है। पुरानी बातें बहुत हो गईं। अब आगे की बात करो।"

वो मेरे पास आईं। उनके चेहरे पर एक नई चिंता थी।

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