Spirit of a Fighter – Chapter 987
"क्योंकि तू भवानी का बेटा था," गंगा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "और अगर प्रताप को पता चलता कि भवानी का एक और बेटा है, तो वो तुझे उसी रात उठा ले जाता। मैंने तुझे सुक्खी के पास इसलिए छोड़ा ताकि तू उसकी नज़र से दूर रहे। मैं हवेली में रहती थी, उसके सामने, हर रोज़ उसकी आँखों में देखती थी, ताकि वो मुझ पर शक न करे। और मैं तुझे दूर से देखती थी। बस दूर से।"
"तुम मुझे दूर से देखती थीं," टिंकू ने कहा। "और मैं तुम्हें देखता भी नहीं था, क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि तुम कौन हो।"
गंगा देवी ने अपना हाथ वापस खींच लिया।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "और मैं हर रोज़ उस बात को जीती हूँ।"
टिंकू ने टोपी वापस पहनी।
"मैं तुमसे नफ़रत नहीं करता," उसने कहा। "पर माफ़ भी नहीं करता।"
वो पलट गया और मेरे पास आकर खड़ा हो गया।
कमला देवी ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई।
"बहुत हुआ," उन्होंने कहा। "अब सुनो, सब के सब। मैंने बीस साल चुप रहकर एक बात सीखी है — चुप्पी सबसे बड़ा ज़हर है। और अब मैं चुप नहीं रहूँगी।"
वो मेरे पास आईं।
"प्रताप सिंह," उन्होंने कहा, "अगले हफ़्ते शहर में अपने बड़े अखाड़े का उद्घाटन कर रहा है। 'भारत केसरी' से पहले का मुकाबला। उसमें वो अपने नए पहलवान उतारेगा।
"उद्घाटन के दिन वो अपना पुराना हिसाब भी चुकाएगा," कमला देवी ने कहा। "शहर के सारे पुराने पहलवानों को बुलाया है। जान-बूझकर बुलाया है। ताकि सब देखें कि जो उसके सामने नहीं झुका, उसका क्या हुआ।"
"आपको ये सब कैसे पता?" मैंने पूछा।
कमला देवी ने अपनी लाठी उठाई और उसकी नोक से मेरी छाती पर हल्का-सा टपकाया।
"क्योंकि मैं बीस साल से उसी शहर में रहती हूँ," उन्होंने कहा। "तुम सब मुझे भवानी की बहन समझते हो, जो रोती-धोती रही। पर मैं हर हफ़्ते उस अखाड़े के बाहर बैठती थी। चबूतरे पर। लोग समझते थे बूढ़ी है, धूप सेंकती है। मैं गिनती करती थी। कौन आया, कौन गया, किसकी आवाज़ दबी थी।"
उनकी आँखें मेरी तरफ़ आईं।
"भवानी मरने से पहले मेरे पास आया था," उन्होंने कहा। "रात को। मेरे घर। मैंने उसके हाथ पकड़े, तो उसकी हथेली जल रही थी। बुख़ार से नहीं। डर से। उसने कहा — दीदी, मैंने एक काग़ज़ छिपाया है। अगर मैं न रहूँ, तो वो काग़ज़ वीर के बाप के पास पहुँचाना।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"कौन-सा काग़ज़?" मेरी आवाज़ फट गई।
"वही जो तेरे पास है," उन्होंने कहा। "वो काग़ज़ भवानी ने मुझे दिया था। पर मैं औरत थी, अकेली, लाठी के सहारे। मैं उसे लेकर तेरे बाप के पास नहीं जा सकती थी। प्रताप के आदमी हर गली में थे। इसलिए मैंने वो काग़ज़ हरनाम को दिया। हरनाम ईंट ढोता था, कोई उस पर शक नहीं करता था।"
"हरनाम को?" मैंने कहा। "पर हरनाम तो…"
"हरनाम ने वो काग़ज़ तेरे बाप तक नहीं पहुँचाया," कमला देवी ने कहा। "वो डर गया। उसने सोचा, अगर प्रताप को पता चला, तो वो उसका सब कुछ ले लेगा। तो उसने काग़ज़ छिपा दिया। और फिर एक दिन मैंने सुना कि भवानी का काग़ज़ किसी को मिल गया है — तेरे हाथ में।"
मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"तो ये काग़ज़ तुम्हारे पास से आया," मैंने कहा। "हरनाम से। मेरे पास।"
"हाँ," कमला देवी ने कहा। "और अब तू जानता है कि ये काग़ज़ कितना भारी है। इस पर भवानी का ख़ून है।"
गंगा देवी ने अचानक अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
"मैंने तुझे धमकाया था," उन्होंने कहा। आवाज़ हाथों के पीछे से आ रही थी, दबी हुई। "तेरी माँ को, गुड़िया को। मैंने कहा था कि अगर तूने मुँह खोला, तो तेरा सब कुछ जाएगा। पर मैंने तेरे पिता को नहीं मारा। मैं तो उस रात खुद रो रही थी जब भवानी ने शीशी पी। मैंने उसका हाथ पकड़ा था और कहा था — भवानी, मत कर। पर उसने मेरा हाथ झटक दिया।"
वो रुकी। उनकी साँस टूट रही थी।
"और मैं वहीं खड़ी रही," उन्होंने फुसफुसाया। "मैं मदद के लिए नहीं दौड़ी। क्योंकि अगर दौड़ती, तो सब को पता चल जाता कि मैं वहाँ थी।"
कमरे में ऐसी चुप्पी छाई कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं।
"मेरे पापा ने मदद माँगी," उसने कहा, "और ये औरत खड़ी देखती रही?"
गंगा देवी ने हाथ नीचे किए। उनका चेहरा गीला था।
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैं खड़ी देखती रही।"
तभी बाहर से, हवेली के खुले दरवाज़े से, एक बूढ़ी आवाज़ आई। वो आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें गुस्सा ऐसा था जैसे लोहे पर चोट पड़ी हो।
"गंगा, झूठ मत बोल — तूने तो उस रात भवानी का हाथ भी पकड़ा था।"
सब पलटे।
दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। हाथ में लाठी, कंधों पर फटी शॉल, और आँखों में इतना गुस्सा कि कमरे की हवा भारी हो गई। वो कमला देवी थीं — भवानी की बहन। ठीक वैसी, जैसी कमला देवी ने खुद को बताया था। पर शॉल वाली औरत के हाथ में लाठी नहीं थी। उसके हाथ खाली थे, और उनकी उँगलियाँ हवा में किसी की तरफ़ उठी हुई थीं।
"ये क्या…" कमला देवी ने कहा। उनकी लाठी ज़मीन पर गिरी और ठक से बजी।
मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में सिर्फ़ एक बात थी — डर।
दरवाज़े पर खड़ी औरत ने अपनी उँगली गंगा देवी की तरफ़ की।
"बोल, गंगा," उसने कहा। "बोल कि उस रात तेरे हाथ पर भवानी का ख़ून लगा था या नहीं।"
॥
दरवाज़े पर खड़ी औरत की उँगली हवा में लटकी रह गई, और गंगा देवी के चेहरे से खून जैसे गायब हो गया।
कमला देवी ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनकी लाठी ज़मीन पर पड़ी थी, पर उन्होंने उसे उठाने की ज़हमत नहीं की। उनकी आँखें सीधी गंगा देवी पर टिकी थीं।
"तीस साल," कमला देवी ने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर कमरे के हर कोने तक पहुँच रही थी। "तीस साल मैंने इंतज़ार किया कि तू खुद बोलेगी। पर तू नहीं बोली। आज जब सबके सामने मौका आया, तब भी तू आधा सच बोलकर बचने की कोशिश कर रही है।"
गंगा देवी के होंठ फिर हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"तूने कहा, तूने भवानी का हाथ पकड़ा था," कमला देवी ने कहा। "सच है। पर तूने ये नहीं बताया कि उसके बाद क्या हुआ। तूने ये नहीं बताया कि भवानी ने तेरा हाथ क्यों झटका।"
मेरी साँस रुक गई थी। मैं दरवाज़े और गंगा देवी के बीच खड़ा था, और मुझे लगा जैसे कमरे की दीवारें सिकुड़ रही हैं।
"मैं उस रात हवेली के पीछे थी," कमला देवी ने कहा। "तू जानती है क्यों? क्योंकि भवानी ने मुझे खुद बुलाया था। उसने कहा था — बहन, आज रात कुछ होने वाला है। अगर मैं न रहूँ, तो मेरे बेटे को सच बता देना।"
वो रुकीं। उनकी आवाज़ में एक काँप था जो वो छिपाने की कोशिश कर रही थीं।
"मैं पीछे के दरवाज़े से अंदर आई। अंधेरा था। मैंने देखा — भवानी बैठे थे, और उनके सामने तू खड़ी थी। तेरे हाथ में शीशी थी। तू कह रही थी — भवानी, मत करो। ये ज़हर है। और वो कह रहे थे — गंगा, अगर मैं नहीं पीऊँगा, तो वो वीर को मार देगा। मुझे पता है वो मार देगा।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"मैंने अपने कानों पर यकीन नहीं किया," कमला देवी ने कहा। "मैं वहीं जम गई। और फिर भवानी ने वो शीशी तेरे हाथ से ली। उन्होंने एक बार आसमान की तरफ़ देखा, और फिर… पी ली।"
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