Spirit of a Fighter – Chapter 986
गंगा देवी की आँखें फैल गईं। वो उठने की कोशिश करने लगीं, पर उनके पैर लड़खड़ाए और वो वापस बैठ गईं।
"किसने कहा?"
"मेरी माँ ने," मैंने कहा। "और मेरी माँ झूठ नहीं बोलती।"
गंगा देवी ने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया। कुछ पल वो ऐसे ही बैठी रहीं। फिर उनके कंधे हिलने लगे और मैंने सुना — वो रो रही थीं। बूढ़ी औरत, हवेली की मालकिन, जिसने मुझे भवानी की हड्डियाँ दिखाई थीं और जिसने कहा था कि वो गवाही देगी — वो रो रही थी, बच्चे की तरह।
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ उनके हाथों के बीच से आ रही थी, "कि अगर मैं तुम्हें भवानी की हड्डियाँ दिखा दूँगी, तो तुम सच के इतने करीब पहुँच जाओगे कि मुझे खुद कुछ बताना ही नहीं पड़ेगा। मैंने सोचा था कि तुम खुद ढूँढ लोगे। और मैं… मैं बच जाऊँगी।"
"किससे बच जाती?" मैंने पूछा।
"उससे," उन्होंने कहा। "उस आदमी से। जिसने भवानी को मारा।"
उन्होंने अपने हाथ नीचे किए। उनकी आँखें लाल थीं।
"मैं नहीं जानती थी कि वो पानी ज़हर है," उन्होंने कहा। "मैं कसम खाती हूँ, वीर सिंह। मैंने भवानी को सिर्फ़ ताक़त के लिए कहा था। वो उस वक़्त टूट रहा था। हार रहा था। और मैं उसे हारते हुए नहीं देख सकती थी।"
"आपने उसका हाथ पकड़ा था," मैंने कहा। "उस रात। जब उसने शीशी पी।"
गंगा देवी रुक गईं।
"किसने बताया?"
"कोई नहीं," मैंने कहा। "ये कमला देवी कहेंगी। पर मैं उनसे पहले आपसे सुनना चाहता हूँ।"
गंगा देवी ने धीरे से कहा, "कमला…"
और उसी वक़्त बाहर से एक आवाज़ आई। बूढ़ी आवाज़, सूखी, पर साफ़।
"गंगा, झूठ मत बोल — तूने तो उस रात भवानी का हाथ भी पकड़ा था।"
हम सब पलटे।
पीछे के आँगन के दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। कमला देवी — भवानी की बहन। हाथ में लाठी, सिर पर सफ़ेद चुनरी, और आँखों में वो गुस्सा जो बीस साल से जमा था।
वो आगे आईं। उनकी लाठी की ठक-ठक पत्थर पर गूँज रही थी।
"तूने भवानी को पिलाया था," उन्होंने कहा, हर शब्द पर लाठी टिकाते हुए। "तूने अपने हाथों से शीशी उसके मुँह से लगाई थी। और जब वो काँपने लगा, तो तूने उसका हाथ पकड़ा — पकड़ा, गंगा — और कहा, 'मत डर, सिर्फ़ थोड़ी देर की बात है।'"
मेरी साँस रुक गई।
गंगा देवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"और उसके बाद," कमला देवी ने कहा, "जब भवानी मर गया, तो तूने अपनी ओर से सबको बता दिया कि ये सब भैरव का काम है। और खुद साफ़ बच गई।"
कमला देवी मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा चेहरा देखा — ऊपर से नीचे तक, जैसे किसी चीज़ को पहचानने की कोशिश कर रही हों।
"तू भवानी का बेटा है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा की आँखें हैं तुझमें। पर तेरे पास उसकी अक्ल नहीं आई। अगर आती, तो तू इस औरत के पीछे नहीं भागता।"
टिंकू ने आगे कदम बढ़ाया।
"आंटी," उसने कहा, "मैं—"
कमला देवी ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें रुक गईं।
"तू…" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "तू गंगा का बेटा है।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
कमला देवी ने अपनी लाठी को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया। उनका चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छू दिया गया हो।
"भवानी का बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ और आया — गुस्सा नहीं, कुछ और। "भवानी का बेटा मिठाई बेचता है।" उन्होंने टिंकू को देखा। "तू जानता है तेरे पापा कैसे मरे थे?"
"अब जानता हूँ," टिंकू ने कहा। "बस पूरा नहीं जानता।"
कमला देवी गंगा देवी की तरफ़ पलटीं।
"तो बता," उन्होंने कहा। "अब भी वक़्त है। इन दोनों बच्चों के सामने बता।"
गंगा देवी ने अपने हाथ गोद में रखे। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा, और टिंकू की तरफ़ नहीं देखा। वो ज़मीन देख रही थीं।
"वो रात," उन्होंने शुरू किया, और उनकी आवाज़ टूटी हुई थी, "भवानी अपने कमरे में था। उसने शीशी खुद उठाई थी। मैंने उसे रोका था। मैंने कहा था — 'भवानी, अब मत।' और उसने कहा — 'गंगा, अगर मैं अब नहीं पिया तो कल अखाड़े में मेरी लाश उठेगी।'"
वो रुकीं। उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं।
"मैंने उसका हाथ पकड़ा," उन्होंने कहा। "न शीशी छीनने के लिए। उसे रोकने के लिए। मैंने कहा — 'पर मैं तो अब भी तेरी हूँ, भवानी। तू मर गया तो मैं क्या करूँगी?'"
"झूठ," कमला देवी ने कहा।
"सच," गंगा देवी ने कहा, और उन्होंने पहली बार कमला देवी की तरफ़ देखा। "सच, कमला। तूने वो बात सुनी जो तू सुनना चाहती थी। तूने मेरी आवाज़ नहीं सुनी, तूने सिर्फ़ अपना गुस्सा सुना।"
कमला देवी का हाथ लाठी पर कस गया।
"तो तू कहती है कि तूने उसे ज़हर नहीं दिया?"
"मैंने उससे ये नहीं छुपाया कि शीशी में क्या है," गंगा देवी ने कहा। "मैंने उसे बताया था कि इस पानी से ताक़त बढ़ती है, पर आँखें बदलती हैं। और वो खुद हँसा था। उसने कहा — 'आँखें बदलें या न बदलें, मुझे तो बस एक बार जीतना है।'"
"और तूने उसे रोका नहीं," कमला देवी ने कहा।
"मैंने उसे रोका," गंगा देवी ने कहा। "मैंने कहा कि मैं ये शीशी फेंक दूँगी। और उसने कहा कि अगर तूने फेंकी, तो मैं तुझे छोड़ दूँगा।"
कमला देवी हँसीं। वो हँसी ठंडी थी, और उसमें दर्द था।
"तो तूने अपने पति की जान से ज़्यादा अपना घर बचाया।"
गंगा देवी ने कुछ नहीं कहा।
मैं वहीं खड़ा था। मेरे हाथ ठंडे थे। और मेरे अंदर कुछ ऐसा हो रहा था जिसे मैं शब्दों में नहीं कह सकता था। मेरे पापा ने शीशी खुद पी थी। मेरे पापा ने खुद चुना था। और गंगा देवी ने उन्हें रोका था, पर ज़ोर से नहीं।
ये बात मेरे दिल पर पत्थर की तरह गिरी।
"रुको," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी थी। मैंने गला साफ़ किया। "रुको। अब सीधी बात। कोई आधा सच नहीं। कोई घुमाव नहीं।"
मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा।
"वो आदमी," मैंने कहा। "जो शीशी बनाता था। जगत सिंह का सौतेला भाई। उसका नाम क्या है? और वो अब कहाँ है?"
गंगा देवी ने अपना मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
"बोलो," मैंने कहा।
"उसका नाम प्रताप सिंह है," गंगा देवी ने कहा। "और वो अब शहर में है। बड़ा ठेकेदार। उसके पास अपनी ईंटें हैं, अपने पहलवान हैं, और अपने डॉक्टर। वो अब भी वही करता है जो बीस साल पहले करता था। बस अब वो सीधे नहीं, हाथों से करवाता है।"
"भैरव उसका हाथ था," मैंने कहा।
"हाँ। और शेराज़ उसकी उँगली। और ठाकुर महेंद्र उसकी जेब।"
"और आप?" मैंने कहा। "आप क्या हैं?"
गंगा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहुत पुराना था।
"मैं वो हूँ," उन्होंने कहा, "जिसने अपने पति की जान बचाने के लिए उसके क़ातिल से हाथ मिलाया। और फिर बीस साल उसके साये में रही, ताकि वो मुझे भी न मार दे।"
"और मेरी माँ को धमकाया," मैंने कहा। "गुड़िया की जान की धमकी दी।"
गंगा देवी ने अपना सिर झुका लिया।
"हाँ," उन्होंने कहा। "और मुझे इसका कोई बहाना नहीं है।"
टिंकू आगे आया। वो गंगा देवी के सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी टोपी उतारी।
"माँ," उसने कहा।
शब्द कमरे में गिरा और कमरे में ही रह गया।
गंगा देवी ने अपनी आँखें उठाईं। उनके होंठ काँपे।
"तूने मुझे माँ कहा," उन्होंने फुसफुसाया।
"मैंने आज पहली बार कहा," टिंकू ने कहा। "और शायद आख़िरी बार। क्योंकि मुझे एक जवाब चाहिए। तुमने मुझे सुक्खी बुआ के पास क्यों छोड़ा?"
गंगा देवी ने अपना हाथ बढ़ाया, पर टिंकू ने पीछे हट लिया।
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