Spirit of a Fighter985 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 985

7 min read November 5, 2026

माँ ने काग़ज़ की तरफ़ देखा जो मेरे हाथ में था।

"क्योंकि गंगा ने ही उसे शीशी वाले आदमी से मिलवाया था," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले।"

मेरा सिर घूम गया।

"क्या?"

"गंगा की मजबूरी थी," माँ ने कहा। "भैरव — यानी विक्रम — उस वक़्त अखाड़े का मालिक बन रहा था। और गंगा को लगा कि अगर वो भवानी को ताक़त का रास्ता नहीं दिखाएगी, तो भवानी हार जाएगा और उनका घर टूट जाएगा। उसने सोचा — थोड़ी सी ताक़त, थोड़ा सा पानी, और भवानी फिर से अखाड़े का शेर बन जाएगा।"

"पर वो पानी ज़हर था," मैंने कहा।

"उसे नहीं पता था," माँ ने कहा। "उसे सिर्फ़ इतना बताया गया था कि ये पानी ताक़त देता है। जब भवानी ने पहली बार पिया, तो अगले दिन उसकी आँखें लाल थीं और उसके हाथ काँप रहे थे। तब गंगा को समझ आया कि उसने क्या किया। उसने वो शीशी फेंक दी। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भवानी के शरीर में ज़हर घुस चुका था।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।

"तो गंगा देवी ने मेरे पापा को मारा," मैंने कहा।

"नहीं," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "गंगा ने गलती की। बहुत बड़ी गलती। पर उसने भवानी को नहीं मारा। भवानी को उस आदमी ने मारा जो ये पानी बनाता था। और वो आदमी कोई और नहीं, हरनाम का पुराना मालिक था।"

मैं रुक गया।

"हरनाम का पुराना मालिक?"

"हाँ," माँ ने कहा। "हरनाम जब छोटा था, तो उसी आदमी के यहाँ मज़दूरी करता था। वो आदमी ईंटों का ठेकेदार था, बड़ा ठेकेदार। पर उसका असली धंधा ईंट नहीं था। वो शहर के अखाड़ों में पहलवानों को पानी पिलाता था। और उसका नाम—"

वो रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"उसका नाम," माँ ने कहा, "जगत सिंह का सौतेला भाई था।"

मेरे कानों में ये नाम पड़ा और मेरे पूरे शरीर में फैल गया। जगत सिंह। वो अंधे बूढ़े गुरुजी, जो तहखाने में मिले थे। जो भवानी के गुरु थे। जिन्होंने कहा था कि भैरव सिर्फ़ हाथ था, असली खिलाड़ी कोई और है।

"तो जगत सिंह ने अपने ही भाई को—"

"जगत सिंह ने अपने भाई को नहीं भेजा," माँ ने कहा। "उसने भवानी को उस आदमी से मिलवाया था। शुरू में। क्योंकि जगत सिंह को भी लगा था कि भवानी को ताक़त चाहिए। पर जब उसे पता चला कि उसका भाई भवानी को धीरे-धीरे ज़हर दे रहा है, तो उसने मना किया। और तब उसके भाई ने उसे भी ज़हर दे दिया।"

मेरे पेट में ठंडी गाँठ बन गई।

"जगत सिंह की आँखें इसीलिए गईं?"

"हाँ। उसने आँखें खोईं, पर जान नहीं गई। भाई ने सोचा कि अंधा आदमी किसी को क्या बताएगा। और फिर उसने भैरव को अपना हाथ बनाया।"

मीरा ने धीरे से कहा, "तो असली साँप जगत सिंह का भाई है। और उसके पास भवानी को मारने का इरादा था।"

"और आज भी है," माँ ने कहा। "वो अब शहर में बड़ा ठेकेदार है। उसके पास पैसा है, आदमी हैं, और सबसे ज़रूरी — उसके पास सबूत मिटाने की आदत है। इसीलिए भवानी की हड्डियाँ गायब हुईं। इसीलिए मुंशीजी के काग़ज़ जले। इसीलिए शेराज़ जैसे लोग अब भी ज़िंदा हैं।"

मैं उठ खड़ा हुआ। मुझे कमरे में खड़ा रहना पड़ा। ऐसा लगा कि अगर मैं नहीं उठा तो मेरे अंदर कुछ फट जाएगा।

"तो फिर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ दूर से आ रही थी, "गंगा देवी ने ये सब जानकर भी मुझे कुछ नहीं बताया। मुझे हवेली में बुलाया, भवानी की हड्डियाँ दिखाईं, और बोली कि आज सच बाहर आएगा। पर उसने ये नहीं बताया कि वो खुद उस साँप की रस्सी थी।"

"क्योंकि वो शर्मिंदा है," माँ ने कहा। "और शर्मिंदा आदमी झूठ बोलता है।"

"तो अब मैं उससे सच उगलवाऊँगा," मैंने कहा। "आज। अभी।"

मीरा उठी। उसने अपना बैग कंधे पर डाला।

"मैं चलूँगी," उसने कहा।

"मीरा—"

"मैं साथ चलूँगी," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं जानता था कि हटेगी नहीं। "क्योंकि गंगा देवी ने पहले भी झूठ बोला था। और लोग जो झूठ बोल चुके होते हैं, उनसे सच निकलने के लिए कोई चीज़ चाहिए होती है। तेरे पास काग़ज़ है। मेरे पास सवाल हैं। और टिंकू के पास—"

वो रुकी। उसने टिंकू की तरफ़ देखा।

"टिंकू के पास वो है," उसने कहा, "जो गंगा देवी ने खोया था। एक बेटा।"

टिंकू ने अपनी टोपी उतारी। उसने उसे अपने हाथ में घुमाया। फिर उसने उसे वापस पहन लिया, ठीक से, दोनों तरफ़ सीधा, जैसे कोई फ़ौजी तैयार हो रहा हो।

"मैं चलूँगा," उसने कहा। "पर एक बात कहूँ?"

"बोल।"

"मुझे उससे कुछ नहीं चाहिए। न प्यार, न माफ़ी। बस एक जवाब। कि उसने मुझे क्यों छोड़ा। और वो जवाब अगर झूठा हुआ, तो मैं उसका नाम लेना बंद कर दूँगा।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"चल।"

हम बाहर निकले। दोपहर ढल रही थी और गाँव की मिट्टी में सुबह की हल्दी और दोपहर की धूप मिल गई थी। रास्ते में नीम के पेड़ की छाया पड़ी थी और उसके नीचे सुक्खी बुआ खड़ी थीं, पान का बीड़ा बना रही थीं। हमें देखकर उन्होंने बीड़ा हाथ से रख दिया।

"अरे, ये तीनों कहाँ?" उन्होंने कहा। "ऐसे चले जा रहे हैं जैसे घर में कोई मर गया हो।"

"बुआ," मैंने कहा, "हवेली के दरवाज़े पर मुझे कोई मिले तो बता देना।"

"हवेली?" उनकी आवाज़ ऊँची हुई। "अरे मैंने तो सुना है कि गंगा देवी ने हवेली के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। पूजा का कमरा, पिछला आँगन, सब। कहती है कि अब कोई अंदर नहीं जाएगा।"

"तो वो मेरे लिए दरवाज़ा खुलेगी," मैंने कहा।

मैं आगे बढ़ गया। सुक्खी बुआ की आवाज़ पीछे आई, "अरे ये लड़का भी न—"

हवेली का फाटक बंद था। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई नहीं आया। मैंने फिर खटखटाया, ज़ोर से।

अंदर से पैरों की आहट आई। दरवाज़ा खुला। एक बूढ़ी दासी खड़ी थी, जिसकी आँखें डरी हुई थीं।

"मालकिन नहीं मिलेंगी," उसने कहा।

"कह दो वीर सिंह आया है," मैंने कहा। "भवानी सिंह का बेटा। और कह दो कि मैं उस काग़ज़ के साथ आया हूँ जिस पर उसका नाम लिखा है।"

दासी की आँखें फैल गईं। वो अंदर गई।

हम वहीं खड़े रहे। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। टिंकू ने अपनी टोपी की छज्जा नीचे किया, जैसे खुद को छुपा रहा हो।

दासी लौटी। उसका चेहरा पीला था।

"आ जाइए," उसने कहा। "मालकिन पीछे के आँगन में हैं।"

हवेली के अंदर की हवा ठंडी थी और उसमें धूप की गंध नहीं थी। दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे धूल में लिपटे थे। कमल की खुशबू आ रही थी — पूजा के कमरे से, मंदिर से।

पीछे के आँगन में गंगा देवी बैठी थीं। उनके सामने एक छोटी अग्नि जल रही थी, और वो उसमें कुछ डाल रही थीं। उनका चेहरा पहले से ज़्यादा सफ़ेद था और उनके हाथ धुएँ से काले पड़ गए थे।

उन्होंने हमें देखा, और उनकी आँखों में कुछ बदला। फिर वो अपने काम में लग गईं।

"आ गए," उन्होंने कहा। "मुझे पता था आओगे।"

"आपको पता था," मैंने कहा। "क्योंकि आप जानती थीं कि मैं ये काग़ज़ पढ़ूँगा।"

मैंने काग़ज़ उनके सामने रख दिया।

गंगा देवी ने उसकी तरफ़ देखा। उनका हाथ रुका। फिर उन्होंने अपनी आँखें उठाईं और मेरी तरफ़ देखा।

"कहाँ मिला?"

"मेरे पापा की शीशी में," मैंने कहा। "आपका नाम। बस आपका नाम। कुछ नहीं। कोई हिदायत नहीं। कोई वजह नहीं। बस आपका नाम।"

गंगा देवी ने अपना हाथ अग्नि से हटाया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"तो पापा ने आपका नाम क्यों लिखा?" मैंने पूछा। "क्योंकि आपने उन्हें उस आदमी से मिलवाया था?"

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