Spirit of a Fighter – Chapter 982
"मुंशीजी नहीं मरे," उन्होंने कहा। "वो आज भी ज़िंदा हैं। और वो… वो तेरे पापा के सबसे करीबी आदमी थे।"
तभी, अखाड़े के फाटक पर, एक लाठी की आवाज़ आई। टप। टप। टप।
सबने पलटकर देखा।
एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, आँखों पर मोटा चश्मा। उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे, पर उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो मैंने सिर्फ़ एक और आदमी में देखी थी।
भैरव सिंह।
बूढ़े ने अपना चश्मा उतारा और मेरी तरफ़ देखा।
"नमस्ते, बेटा," उसने कहा। "मैं तेरे पापा का दोस्त हूँ। मुंशी।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उस काग़ज़ को छुआ जो पापा ने छोड़ा था।
और मैंने धीरे से कहा, "तो तुम हो वो आदमी। जिसने मेरे पापा को मारा।"
॥
तो तुम हो वो आदमी। जिसने मेरे पापा को मारा।
मेरे मुँह से ये शब्द निकले, और अखाड़े के फाटक पर खड़ा वो बूढ़ा हिला भी नहीं। उसकी लाठी की टप-टप बंद हो गई। उसने चश्मा हाथ में लिए हुए मुझे देखा, फिर मेरे पीछे खड़ी माँ को देखा, और उसके होंठों पर वो मुस्कान और गहरी हो गई।
"तेरे पापा के दोस्त," उसने दोहराया, जैसे मैंने कुछ कहा ही न हो। "बीस साल से तेरे पापा का दोस्त। और तू… तू मुझे ऐसे देख रहा है जैसे मैं तेरा दुश्मन हूँ।"
"तुम हो," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ सुनकर माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। बहुत ठंडी।
"वीर," वो धीरे से बोलीं।
"माँ, वो नाम।" मैंने उनकी तरफ़ देखे बिना कहा। "तुमने अभी-अभी मेरे कान में जो नाम फुसफुसाया, वो यही नाम था। मुंशीजी।"
"मैंने तुमसे कहा था वो मरा नहीं है," माँ ने कहा। "पर मैंने ये नहीं कहा था कि उसने तुम्हारे पापा को मारा है।"
मैंने उनकी तरफ़ पलटकर देखा। उनका चेहरा पीला था, पर आँखें साफ़ थीं।
फाटक पर खड़े बूढ़े ने लाठी आगे टिकाई और धीरे-धीरे हमारी तरफ़ चलने लगा। उसकी चाल में वो लचक नहीं थी जो बूढ़ों में होती है। वो सीधा चल रहा था। जैसे किसी ने उसे बीस साल बंद कमरे में रखा हो और वो आज बाहर निकला हो।
"रुक जाओ," रणवीर सिंह की आवाज़ पीछे से आई। वो व्हीलचेयर पर थे, पर उनका हाथ उठा हुआ था। "मुंशी, तुम यहाँ क्या करने आए हो?"
बूढ़ा रुक गया। उसने रणवीर सिंह को देखा और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैं समझ नहीं पाया।
"रणवीर," उसने कहा। "तुम भी। बीस साल बाद। तुमने तो कभी मुझसे मिलने की कोशिश नहीं की।"
"तुम मर चुके थे," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में काँपन था। "तुम्हारी लाश मिली थी। तुम्हारा अंतिम संस्कार हुआ था। मैं खुद उसमें शामिल था।"
"अंतिम संस्कार तो तुमने किसका किया, ये तुम्हें भी नहीं पता," बूढ़े ने कहा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, तेरे पापा का आख़िरी काग़ज़ तेरे पास है ना? जो मैंने तेरी माँ को दिया था?"
मेरे पेट में एक झटका लगा। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। वो काग़ज़ जो पापा ने छोड़ा था। "तीसरी शीशी वो नहीं है जो तू समझता है।"
"तुम्हें कैसे पता?" मैंने पूछा।
"क्योंकि वो काग़ज़ मैंने लिखवाया था," उसने कहा। "तेरे पापा ने लिखा, पर मैंने कहा था कि लिखो। उस रात। जब उन्हें पता चला कि भैरव उन्हें ज़हर देने वाला है।"
माँ ने मेरा हाथ और ज़ोर से पकड़ा। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे। डर था।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "ये सच बोल रहा है?"
"मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती थी," माँ ने कहा। "पर डरती थी।"
"सरस्वती," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। सीधी थी। "अब भी वक़्त है। बता दे। वरना ये बच्चा अपने पापा की मौत का बदला जिसे लेगा, उसे वो और बड़ा कर देगा।"
"मेरे पापा की मौत का बदला," मैंने कहा, "मैं उसी से लूँगा जिसने उन्हें मारा। और मुझे पता है कि किसने मारा। भैरव ने मारा। पर भैरव को ज़हर देने वाला कोई और है। और वो कोई और तुम हो।"
बूढ़े ने अपना सिर हिलाया। धीरे-धीरे। जैसे कोई बच्चे को सबक समझा रहा हो।
"मैं वो नहीं हूँ," उसने कहा। "मैं वो आदमी हूँ जिसने बीस साल तक उस आदमी को ढूँढा। जिसने तेरे पापा को मरवाया। और आज मैं उसे ढूँढ नहीं पाया, इसलिए तेरे पास आया हूँ। क्योंकि तू वो आदमी है जो उसे ढूँढ सकता है।"
मैं चुप हो गया।
मेरे पीछे टिंकू खड़ा था। उसने धीरे से कहा, "भाई, ये आदमी… ये आदमी पागल है। इसकी बातें…"
"टिंकू," मैंने कहा। "चुप।"
मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा। उसकी आँखें मुझ पर जमी थीं। ठंडी। साफ़। और उनमें कुछ और भी था जो मुझे देखना था। कुछ ऐसा जो बीस साल का था।
"अगर तुमने बीस साल तक उसे ढूँढा," मैंने कहा, "तो तुम्हें क्या मिला?"
"कुछ नहीं," उसने कहा। "सिर्फ़ एक नाम। एक नाम जिसे कोई बोलना नहीं चाहता। और एक शीशी। जो तेरे पापा ने बनाई थी।"
"वो शीशी मेरे पास है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैंने तुझे देखा था। उस दिन। जब तू इसे लेकर अखाड़े से बाहर निकला था। मैं उस वक़्त बाज़ार में था। तेरे चेहरे पर वो चमक थी जो तेरे पापा के चेहरे पर होती थी। उस दिन मुझे लगा कि अब मेरा इंतज़ार ख़त्म।"
"तो फिर तुम सामने क्यों नहीं आए?" मैंने पूछा। "क्यों भैरव को मुझे पकड़ने दिया? क्यों मेरी माँ और बहन को उठने दिया?"
बूढ़े ने एक लंबी साँस ली। और उस पल में, पहली बार, वो बूढ़ा लगा। सच में बूढ़ा।
"क्योंकि मुझे डर था," उसने कहा। "बीस साल पहले मैं एक चीज़ देख रहा था। एक चीज़ जिसने मुझे रातों की नींद ख़त्म कर दी। और जब मैंने उसे देखा, मैं भाग गया। मैंने खुद को मरा हुआ दिखाया। मैंने अपना नाम बदला। मैंने अपनी सूरत बदली। और मैं उसी जगह छुपकर बैठ गया जहाँ कोई मुझे ढूँढ न सके — सबके सामने।"
"तुम मुंशी थे," मैंने कहा। "अखाड़े के हिसाब-किताब वाले।"
"हाँ," उसने कहा। "और वही मेरा सबसे बड़ा छुपने का ठिकाना था। जो आदमी सबके सामने बैठकर हिसाब लिखता हो, उस पर कोई शक नहीं करता।"
"पर तुमने काग़ज़ लिखा," मैंने कहा। "वो काग़ज़ जो तुमने पापा को लिखवाया। तुमने उन्हें भैरव से बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में कुछ टूटा।
"क्योंकि मैं उस वक़्त भी डरता था," उसने कहा। "मैंने सोचा था कि अगर तेरे पापा उस शीशी से उस आदमी को पकड़ लेंगे, तो सब ठीक हो जाएगा। पर तेरे पापा ने शीशी पी ली। उन्होंने खुद पी ली। क्योंकि उन्हें भरोसा था कि उनकी दवा उन्हें बचाएगी।"
"तुमने उन्हें रोका क्यों नहीं?" मेरी आवाज़ फट गई।
"मैंने रोका," बूढ़े ने कहा। "पर देर हो चुकी थी।"
हवा सुन्न हो गई।
मेरे पीछे किसी ने सिसक लिया। गुड़िया थी। माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
मैं वहीं खड़ा था। और मेरे अंदर कुछ ऐसा भर रहा था जिसे मैं नाम नहीं दे सकता था। गुस्सा भी नहीं था। दुख भी नहीं था। जो था, वो इन दोनों से बड़ा था।
"तुम जो भी हो," मैंने कहा, "मेरे पापा की मौत में तुम भी शामिल हो। तुम चुप रहे। तुम भाग गए। तुम बीस साल छुपे रहे। और अब तुम मेरे सामने आए हो, तो कुछ चाहिए होगा।"
बूढ़े ने लाठी की टप अखाड़े की मिट्टी पर मारी। एक बार। ज़ोर से।
"मुझे तेरे पापा का क़ातिल चाहिए," उसने कहा। "और मुझे तेरा साथ चाहिए। क्योंकि वो आदमी अब अकेला नहीं है। वो अब बूढ़ा भी नहीं है। वो अब हर जगह है। और उसने तेरे पापा की हड्डियाँ उठवा ली हैं।"
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