Spirit of a Fighter – Chapter 978
"मैंने सब बता दिया," वो बोला। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "इंस्पेक्टर को। सब। हर काग़ज़। हर नाम।"
भैरव ने उसे देखा। उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैंने कभी नहीं देखा था। जैसे कोई आदमी अपना घर जलता देख रहा हो।
"हरनाम," वो बोला। उसकी आवाज़ धीमी थी। "तेरे बेटे को मैंने कुछ नहीं किया।"
"तूने मेरे बेटे को बंधक बनाया," हरनाम ने कहा। उसकी आवाज़ में अब काँप नहीं थी, सिर्फ़ एक थकी हुई सच्चाई थी। "तूने उसे डराया। तूने मुझे बीस साल तेरे साथ चलाया। और मैं चला, क्योंकि मुझे डर था। पर आज मेरा बेटा घर पर है, सो रहा है। और मैं तेरे लिए झूठ नहीं बोलूँगा।"
भैरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनके पीछे दो सिपाही थे। उन्होंने भैरव को घास से उठाया और उसकी कलाइयों में हथकड़ी लगाई। हथकड़ी की आवाज़ बहुत तेज़ थी, जैसे कोई चीज़ टूट रही हो।
उस पल अखाड़े की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरों में से एक गिरी। काँच चटककर बिखर गया। किसी ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की।
मैं वहीं खड़ा था। मेरे हाथ अब भी मुट्ठी में बंद थे। मेरी उँगलियों के बीच वो धोती का जला टुकड़ा दबा था जो मैंने बाड़ से उठाया था।
भैरव को ले जाया जा रहा था। वो सिपाहियों के बीच चल रहा था, उसके पैर घसीट रहे थे। और फिर, अचानक, वो रुका।
सिपाहियों ने उसे खींचा, पर वो नहीं हिला। उसने पलटकर देखा।
उसकी आँखें मुझे ढूँढ रही थीं।
और जब उन्होंने मुझे पाया, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति आई। जैसे किसी को एक बहुत पुरानी पहेली का जवाब मिल गया हो।
"तूने मेरी सबसे बड़ी चीज़ छीन ली," वो बोला।
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। थकान थी। बीस साल की थकान।
मैंने उसकी आँखों में देखा। मेरे अंदर कुछ भी नहीं था — न गुस्सा, न डर, न जीत की खुशी। बस एक खालीपन, जैसे कोई लंबी बीमारी के बाद पहली बार आँखें खोल रहा हो।
"तुमने खुद अपनी पहचान मिटाई थी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ शांत थी, हालाँकि मेरे हाथ काँप रहे थे। "मैंने नहीं। तुम विक्रम थे। भवानी सिंह के सबसे प्रिय शिष्य। और तुमने वो नाम बेच दिया — उस पानी के लिए, उन पैसों के लिए।"
भैरव ने मेरी बात सुनी। उसके होंठ हिले, जैसे वो कुछ कहना चाहता हो, पर शब्द न मिल रहे हों।
और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
वो हँसा।
धीमी, थकी हुई हँसी। ऐसी हँसी जो किसी बहुत पुराने मज़ाक पर आती है जिसे सिर्फ़ वो खुद समझता है।
"पहचान?" उसने कहा। उसकी आँखें चमकीं, और उस चमक में कुछ ऐसा था जिससे मेरी रीढ़ ठंडी हो गई। "मेरी पहचान तो अभी बाकी है, वीर सिंह। और वो तेरे ही घर में छुपी है।"
सिपाहियों ने उसे खींचा। वो चला गया, और उसकी हँसी हवा में रह गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
"तेरे ही घर में।"
मेरे घर में क्या था? कच्चा आँगन, चक्की, टूटी घड़ी, और माँ की अलमारी। माँ की अलमारी जिसमें मुझे वो काग़ज़ मिले थे। जिसमें से माँ की चूड़ी और दादा जी की अँगूठी मिली थी।
मैंने पलटकर देखा।
माँ अब भी मिट्टी पर लेटी थीं, पर उनकी आँखें खुली थीं। और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनके चेहरे पर वो थकान थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी। और उनके होंठ हिले।
मैं दौड़कर उनके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया।
"माँ," मैंने कहा। "माँ, तुम ठीक हो?"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उनकी पकड़ कमज़ोर थी।
"वो सच बोल रहा था," उन्होंने फुसफुसाया।
मेरा दिल धड़का।
"क्या?"
"तेरे पापा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उनके होंठों के पास झुकना पड़ा। "शेर सिंह… उन्होंने मुझे एक चीज़ दी थी। मरने से पहले। कहा था — अगर कभी वो आए, तो ये उसे देना।"
"कौन आए?"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"भैरव," उन्होंने कहा। "या विक्रम। जो भी उसका नाम हो। उसने कहा था — वो एक दिन आएगा, और उस दिन ये चीज़ उसके हाथ में होनी चाहिए।"
मेरा गला सूख गया।
"क्या चीज़, माँ?"
उन्होंने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।
"वो चीज़ मैंने छुपा दी," उन्होंने कहा। "बीस साल। तेरे पापा की कब्र के नीचे। जिस जगह पर सिर्फ़ मैं जानती हूँ।"
मेरे पीछे मीरा की आवाज़ आई। "वीर?"
मैंने पलटकर देखा। मीरा मेरे पीछे खड़ी थी, उसके हाथ में वो हरी शीशी थी जो उसने रास्ते में दिखाई थी। टिंकू उसके पीछे था और उसके हाथ में वो जला हुआ धोती का टुकड़ा था।
"वो क्या बोला?" मीरा ने पूछा। "आख़िरी में?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
पर मेरी आँखों ने कुछ और कहा होगा, क्योंकि मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "तुम झूठ बोल रहे हो।"
रात ख़त्म हो रही थी। पूरब में आसमान हल्का हो रहा था। अखाड़े की मिट्टी पर गाँव वाले खड़े थे, कुछ बैठे थे, कुछ आग बुझा रहे थे। रणवीर सिंह अब भी खड़े थे, लाठी के सहारे, और उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। मानो बीस साल बाद पहली बार वो अपने पैरों पर खड़े हों, अपनी मर्ज़ी से।
मैंने माँ को गुड़िया के साथ एक चारपाई पर लिटाया। टिंकू ने अपनी टोपी वापस उठा ली थी और वो अपनी दुकान से गरम पानी ले आया था। मीरा ने माँ के माथे पर पट्टी रखी और उन्हें एक हरी शीशी सूँघाई, जिससे उनके गालों पर थोड़ा रंग लौटा।
फिर मैं कुएँ की तरफ़ गया।
कालू काका वहाँ खड़े थे। उन्होंने पत्थर हटा दिया था और सुरंग का मुँह अब फिर खुला था। वो उसके किनारे पर बैठे थे, उनके हाथ में लालटेन थी जिसकी लौ अब भी जल रही थी।
मैं उनके पास बैठ गया।
"कालू काका," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखे बिना बोले। "हाँ, बेटा।"
"जब आपने आज उसके सामने पत्थर गिराया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "तब आपके हाथ काँप रहे थे।"
वो हल्के से हँसे। "बूढ़ा हूँ, बेटा। बूढ़े के हाथ काँपते हैं।"
"नहीं," मैंने कहा। "काँपते हाथ बुढ़ापे से नहीं होते। डर से होते हैं। और आप डरे हुए नहीं थे। आप काँप रहे थे क्योंकि आप बीस साल से ये करना चाहते थे।"
कालू काका कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी सफ़ेद दाढ़ी पर हाथ फेरा।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा, "जब मेरा बेटा चंदन मरा, तब मैंने सोचा था कि मैं भी मर जाऊँगा। पर मैं मरा नहीं। मैं अखाड़े में रह गया। मिट्टी सींचता रहा। और हर सुबह जब भैरव मुझे पानी का गिलास देता, मैं उसे पीता था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे पता था उसमें कुछ मिला है। पर मैं पीता था। क्योंकि अगर मैं नहीं पीता, तो वो मुझ पर शक करता, और मुझे अखाड़े से निकाल देता, और फिर मैं उसकी नज़र में नहीं रहता।"
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
"मैं अंदर रहना चाहता था। देखना चाहता था। कि एक दिन कोई आएगा जो उसे रोकेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और तू आया, बेटा।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"काका," मैंने कहा। "माँ ने कहा कि पापा ने मरने से पहले उन्हें कुछ दिया था। कुछ ऐसा जो भैरव को मिलना चाहिए था। वो चीज़ पापा की कब्र के नीचे छुपी है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें फैल गईं।
"तेरे पापा?" उन्होंने कहा। "शेर सिंह?"
"हाँ।"
वो उठ खड़े हुए। उनका शरीर अब काँप नहीं रहा था। उनकी आवाज़ में एक नई चीज़ थी।
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