Spirit of a Fighter – Chapter 979
"बेटा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा शेर सिंह… वो मरे नहीं थे। वो मारे गए थे।"
मैं खड़ा हो गया।
"क्या?"
"उस रात," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ तेज़ हो गई, जैसे बीस साल का सन्नाटा टूट रहा हो। "जब तेरे पापा की लाश मिली थी, मैं वहाँ था। मैंने देखा था उनके हाथ में कुछ था। मुट्ठी में बंद। जब लोग उन्हें उठा रहे थे, तब भैरव ने उनकी मुट्ठी खोली थी और उसमें से कुछ निकाल लिया था। मैंने उसे देखा था। एक पीली शीशी। पर उसमें पानी नहीं था।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्या था?"
"मुझे नहीं पता," कालू काका ने कहा। "पर भैरव उसे लेकर बहुत खुश हुआ था। और फिर उसने वो शीशी अपनी अलमारी में रख दी थी। और उसी रात उसने मुझे बुलाकर कहा — 'कालू, आज से तेरे बेटे की कब्र में कोई नहीं जाएगा।'"
मैं चुप खड़ा रहा।
"तो जो चीज़ माँ ने छुपाई है," मैंने धीरे से कहा, "वो शायद वही नहीं है जो भैरव ने निकाली थी।"
कालू काका ने सिर हिलाया। "शायद तेरे पापा ने दो चीज़ें बनाई थीं। एक वो जो भैरव को मिली, और एक वो जो तेरी माँ ने छुपाई। ताकि अगर एक चोरी हो जाए, तो दूसरी बची रहे।"
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। वो जला हुआ धोती का टुकड़ा अब भी मेरे हाथ में था। मैंने उसे सूँघा।
और मेरी नाक ने मुझे कुछ बताया जो मैंने पहले नहीं सूँघा था। टुकड़े की गंध में, गीली मिट्टी और कपूर के नीचे, एक और चीज़ थी। बहुत पतली, बहुत हल्की। जैसे कोई काग़ज़ जल रहा हो।
मैंने टुकड़े को पलटा। उसके अंदर, सिलाई के पास, एक छोटा सा जेब था। धोती की जेब। और उसमें कुछ था।
मैंने उसे निकाला।
एक काग़ज़ का टुकड़ा। बहुत छोटा। जला हुआ, सिकुड़ा हुआ। और उस पर कुछ लिखा था, लाल स्याही से। मैंने उसे पास लाकर पढ़ा।
"तीसरी शीशी वो नहीं है जो तू समझता है।"
मेरे हाथ काँप गए।
"कालू काका," मैंने कहा। "ये लिखाई…"
वो पास आए और उन्होंने काग़ज़ देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"ये तेरे पापा की लिखाई है," उन्होंने फुसफुसाया। "मैं इसे पहचानता हूँ। शेर सिंह हमेशा लाल स्याही से लिखते थे।"
मैंने काग़ज़ को अपनी हथेली पर रखा। मेरी आँखों के सामने धुंधलापन आ गया।
"तीसरी शीशी," मैंने धीरे से दोहराया। "वो शीशी जो मुझे अलमारी में मिली थी। जिसके पेंदे पर पापा का नाम था।"
कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा कुछ कहना चाहते थे। और उन्होंने इसे उसी धोती में छुपाया जो उन्होंने मरते वक़्त पहनी थी। ये उनका आख़िरी संदेश है।"
मैंने पलटकर देखा। अखाड़े में गाँव वाले अब भी थे। माँ चारपाई पर लेटी थीं। गुड़िया उनका हाथ पकड़े बैठी थी। मीरा मेरी तरफ़ आ रही थी, उसके चेहरे पर थकान थी पर आँखों में वो चमक थी जो सवाल पूछती है।
मैंने काग़ज़ को अपनी मुट्ठी में दबा दिया।
"कालू काका," मैंने कहा। "मुझे पापा की कब्र पर जाना है। आज ही। सूरज निकलने से पहले।"
वो मेरी तरफ़ देखते रहे।
"पर बेटा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा की कब्र तो खाली है। हड्डियाँ तो नंदकिशोर ने हटा दी थीं।"
"हड्डियाँ नहीं," मैंने कहा। "वो चीज़। जो माँ ने छुपाई थी। वो अब भी वहीं है। कब्र के नीचे। मिट्टी में।"
मैंने मुट्ठी खोली और काग़ज़ को देखा। लाल स्याही अब भी चमक रही थी, जैसे अभी-अभी लिखी गई हो।
"और भैरव ने कहा था कि उसकी पहचान मेरे घर में छुपी है," मैंने कहा। "पर वो गलत था। उसकी पहचान मेरे घर में नहीं है।"
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा।
"वो मेरे पापा की कब्र में है।"
तभी मीरा मेरे पास पहुँची। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने कहा। "तुम्हारी आँखें लाल हैं। तुम क्या देख रहे हो?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सुबह की पहली किरण आसमान पर फैल रही थी और उसकी रोशनी में मीरा का चेहरा थका हुआ था, पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
"मीरा," मैंने कहा। "मुझे तुमसे कुछ पूछना है।"
"पूछो।"
"अगर किसी आदमी की पहचान उसकी कब्र में छुपी हो," मैंने कहा, "तो क्या वो आदमी मरने के बाद भी बोल सकता है?"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
और उस पल, दूर, कब्रिस्तान की तरफ़ से, एक आवाज़ आई। किसी के रोने की आवाज़। धीमी, टूटी हुई।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "भाई," उसने कहा। "कब्रिस्तान में कोई है।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उस काग़ज़ को छुआ।
"हाँ," मैंने कहा। "और वो हमारा इंतज़ार कर रहा है।"
॥
रोने की आवाज़ दूर से आ रही थी, पर जैसे-जैसे हम कब्रिस्तान की तरफ़ बढ़े, वो आवाज़ साफ़ होती गई। कोई बूढ़ी औरत थी। घुटनों पर सिर रखे, नीम के पेड़ के नीचे बैठी, और काँप रही थी।
"कौन है?" टिंकू ने धीरे से पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "पता नहीं। पर उसकी गंध… जानी-पहचानी लग रही है।"
मैं आगे बढ़ा। मेरे जूते सूखी पत्तियों पर पड़ रहे थे, और हर कदम के साथ वो औरत सिकुड़ती जा रही थी।
"माई," मैंने धीरे से कहा। "डरो मत। हम तुम्हें कुछ नहीं करेंगे।"
उसने सिर उठाया। चेहरा पतला, आँखें सूजी हुईं, होंठ फटे हुए। उसके हाथ में एक पुरानी फटी हुई चादर थी, और चादर के कोने में कुछ लिपटा हुआ था।
"तुम… तुम वीर हो?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
मेरे पैर रुक गए। "तुम मुझे कैसे जानती हो?"
उसने चादर खोली। अंदर एक छोटी सी पोटली थी — ज़र्द कपड़े में बँधी हुई, जिस पर मिट्टी जमी थी।
"मैं गंगा हूँ," उसने कहा। "गंगा देवी की दासी। बीस साल से मैं इस कब्रिस्तान की मिट्टी साफ़ करती आई हूँ। और आज सुबह, जब मैंने ये कब्र खुली देखी… मुझे समझ आ गया कि अब सच बाहर आएगा।"
मीरा मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। "गंगा देवी की दासी?" उसने पूछा। "पर गंगा देवी ने तो हमें बताया था कि उसके पास कोई नहीं है।"
"वो झूठ बोली थी," बूढ़ी ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक अजीब सी थकान थी। "गंगा देवी ने मुझे बीस साल पहले यहीं छोड़ दिया था। कहा — इस कब्र की रखवाली करना। कोई इसे न छुए। और अगर कोई इसे छुए, तो उस आदमी को रोकना जो सबसे पहले आए।"
"तो तुमने मुझे क्यों नहीं रोका?" मैंने पूछा। "जब मैं आया था, तब?"
बूढ़ी ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में पानी भर आया।
"क्योंकि तुम्हारी आँखें तुम्हारे पापा की हैं," उसने कहा। "और मैं बीस साल से उन्हीं आँखों का इंतज़ार कर रही थी।"
मेरा गला भर आया। मैंने पलटकर मीरा की तरफ़ देखा। वो चुप खड़ी थी, पर उसका हाथ मेरी कमर पर था — वो मुझे सहारा दे रही थी।
"अंदर क्या है?" मैंने पूछा। "पोटली में?"
बूढ़ी ने पोटली आगे बढ़ाई।
"तुम्हारे पापा ने मरने से तीन दिन पहले मुझे ये दी थी," उसने कहा। "कहा था — अगर मैं न रहूँ, तो ये उस लड़के को देना जो मेरी आँखों वाला हो। और कहना — तीसरी शीशी सिर्फ़ एक शीशी है। असली चीज़ तो उसका ढक्कन है।"
मैंने पोटली खोली। अंदर एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया थी। और उस डिबिया के अंदर — एक पीली शीशी।
वही शीशी। बिल्कुल वैसी ही जैसी मेरे पास थी। पर इसका ढक्कन अलग था। इस ढक्कन पर एक छोटा सा निशान था — एक तराजू। तराजू का निशान।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"ये निशान…" मैंने धीरे से कहा।
"ये न्याय का निशान है," बूढ़ी ने कहा। "तेरे पापा ने इसे खुद बनाया था। कहा था — जिस दिन ये ढक्कन खुलेगा, उस दिन पता चलेगा कि असली ज़हर किसके पास है।"
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