Spirit of a Fighter977 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 977

7 min read November 5, 2026

"पर वो काग़ज़—"

"वो काग़ज़ नहीं, बेटा," जगत सिंह ने कहा। "वो सच है। और सच कुएँ में फेंकने से नहीं डूबता। वो तैरता है।"

मैंने कुएँ की तरफ़ देखा। वो अंधेरा था, गहरा और शांत, जैसे कोई बंद किताब।

और फिर मुझे गंध आई। कुएँ से। गीली मिट्टी की, और जली हुई लकड़ी की, और उसके नीचे बहुत धीमी, बहुत पुरानी — हल्दी की।

वो गंध मेरी माँ की थी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ अब भी अखाड़े की मिट्टी पर लेटी थीं, गुड़िया उनके पास बैठी थी। पर उनकी आँखें खुली थीं और वो मेरी तरफ़ ही देख रही थीं।

उनके होंठ हिले। दूर से, मैंने पढ़ा।

"मत जा।"

पर मैंने अपनी मुट्ठी खोली और धोती का टुकड़ा टिंकू के हाथ में रख दिया।

"अगर मैं लौटा," मैंने कहा, "तो ये मतलब है कि सच मिल गया।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें डर से भरी थीं, पर उसने सिर हिलाया।

"और अगर नहीं लौटा?" उसने पूछा।

मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।

"तो माँ को बता देना कि मैं उसी मिट्टी में मिल गया जिससे मैं बना था।"

और मैंने कुएँ की ओर कदम बढ़ाया, जहाँ अंधेरे में एक पीली शीशी किसी का इंतज़ार कर रही थी।

॥

कुएँ के मुँह पर मेरा पैर पड़ा और नीचे से ठंडी हवा उठकर मेरे चेहरे पर लगी। उसमें गीली मिट्टी की बू थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था — तेल, जला हुआ कपड़ा, और पसीना। भैरव का पसीना।

मैंने पीछे देखा। माँ अब भी मिट्टी पर लेटी थीं, गुड़िया उनका सिर अपनी गोद में रखे बैठी थी। मीरा उनके पास घुटनों के बल बैठी उनके माथे पर गीला कपड़ा रख रही थी। टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था, होंठ काँप रहे थे।

तभी बाहर से शोर उठा।

मैंने सिर उठाया। अखाड़े की दीवार के बाहर मशालों की रोशनी नाच रही थी। दर्जनों आवाज़ें एक साथ आ रही थीं। और सबसे ऊपर एक आवाज़, जो मुझे बचपन से पता थी।

"अरे भाग कहाँ रहा है! रुको! मैंने तो सुना है कि भैरव कुएँ की तरफ़ गया!"

सुक्खी बुआ।

मैंने कुएँ के किनारे हाथ रखकर नीचे झाँका। अंधेरा था, पर दूर, बहुत नीचे, पानी की सतह पर कुछ पीला चमक रहा था। एक शीशी। या शायद दो। और उनके पास, पत्थर की सीढ़ियों पर, कुछ और भी पड़ा था जो पानी में डूबा-सा लग रहा था।

पर मेरी नाक ने मुझे कुछ और बताया। कुएँ की दीवार से, ऊपर की तरफ़, ताज़ी खुरची हुई मिट्टी की गंध आ रही थी। जैसे किसी ने अभी-अभी रस्सी के लिए खूँटा ठोंका हो।

मैंने पलटकर देखा। कुएँ से दस कदम दूर, दीवार के उस पार, एक टूटी ईंट का ढेर था। उसके पीछे घास झुकी हुई थी — किसी के भारी जूते के निशान।

"वो यहाँ नहीं है," मैंने कहा।

टिंकू दौड़कर पास आया। "क्या?"

"भैरव कुएँ में नहीं गया। वो सुरंग के मुँह की तरफ़ गया है।" मैंने दीवार के उस पार इशारा किया। "उसने कुएँ के पास रस्सी बाँधने की कोशिश की, पर वक़्त नहीं मिला। वो अभी भी ऊपर है, बाड़ के पीछे।"

"तो चल!" टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा।

हम दौड़े। मशालों की रोशनी दीवार पर पड़ रही थी और गाँव वाले बाहर से चिल्ला रहे थे। मैं दीवार के उस कोने तक पहुँचा जहाँ पिछली बार भैरव चढ़ा था। ईंटों पर उसकी धोती का फटा हुआ पल्ला अब भी अटका था।

मैं रुका और मेरी नाक ने काम किया।

हवा पूरब से आ रही थी। और उसमें गंध थी — घी, तेल, और उसके नीचे कुछ जो मैंने पहले कभी नहीं सूंघा था। जैसे सड़ी हुई लकड़ी को आग में झोंका गया हो, पर आग न लगी हो।

"वो वहाँ है," मैंने कहा। "सुरंग के मुँह की तरफ़।"

मैं दीवार फाँदकर उस पार गया। मेरे पैर सूखी घास पर पड़े और मैं लुढ़ककर उठा। टिंकू मेरे पीछे आया, उसकी टोपी गिर गई थी और वो उसे उठाना भूल गया।

हम दौड़े। अखाड़े की पिछली दीवार के पास वो पुराना टीला था जिसके नीचे सुरंग का मुँह था। मैंने वहाँ पहुँचकर देखा।

और मेरे पैर जम गए।

कालू काका वहाँ खड़े थे।

वो सुरंग के मुँह के ठीक सामने खड़े थे, दोनों हाथों में एक बड़ा सा पत्थर पकड़े। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हवा में उड़ रही थी और उनकी आँखें — बूढ़ी, धँसी हुई आँखें — उस आदमी पर जमी थीं जो उनके सामने घुटनों के बल था।

भैरव।

उसका एक हाथ सुरंग के मुँह के किनारे पर था, दूसरा ज़मीन पर। उसकी धोती फटी हुई थी और उसके पैर के नीचे उसी सुरंग की काली मिट्टी थी। वो अंदर घुसने की कोशिश कर रहा था, पर कालू काका ने उसी पल पत्थर को सुरंग के मुँह पर गिरा दिया।

पत्थर गिरा। धूल उठी। सुरंग का मुँह बंद हो गया।

भैरव ने पलटकर देखा।

उसका चेहरा — वो मीठा, तेल लगी मूँछों वाला चेहरा — अब कुछ और था। उसके माथे पर पसीना था, उसकी आँखों में वो ठंडक नहीं थी, बस एक अजीब सी खाली जगह थी। और उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई शब्द ढूँढ रहा हो।

कालू काका ने उसके सामने खड़े होकर अपना पत्थर वाला हाथ नीचे किया। उनके हाथ काँप रहे थे। उनकी साँस फूल रही थी। पर उनकी आवाज़ साफ़ थी।

"बीस साल," कालू काका ने कहा।

भैरव ने उन्हें देखा।

"बीस साल तूने मुझे डरा कर रखा," कालू काका ने कहा। "मैं तेरे सामने झुकता रहा। तेरी मिट्टी सींचता रहा। तेरी शीशियाँ उठाता रहा। और जब मेरा बेटा मरा, तब भी मैं चुप रहा। क्योंकि मुझे डर था कि तू मेरा दूसरा बेटा भी ले लेगा।"

उनकी आवाज़ टूटी, पर वो रुके नहीं।

"आज मैं तेरे सामने खड़ा हूँ।"

भैरव धीरे-धीरे उठा। उसके घुटनों से मिट्टी झड़ रही थी। वो कालू काका से उम्र में बहुत छोटा था, शरीर से बहुत बड़ा था। वो एक कदम आगे बढ़ा।

"चल हट," वो बोला। उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी।

कालू काका नहीं हटे।

भैरव झपटा।

मैंने अपने पैर हिलाए, पर मुझसे पहले कुछ और हुआ।

एक लाठी हवा में घूमी और भैरव की छाती पर पड़ी।

आवाज़ ऐसी थी जैसे सूखी लकड़ी चटके। भैरव पीछे हटा, लड़खड़ाया, और घास पर गिरा।

मैंने पलटकर देखा।

रणवीर सिंह खड़े थे।

वो खड़े थे।

उनके एक हाथ में लाठी थी और दूसरा हाथ मीरा के कंधे पर। उनके पैर काँप रहे थे, उनकी साँस फूल रही थी, उनका चेहरा पसीने से भीगा था। पर वो खड़े थे। व्हीलचेयर उनके पीछे खाली खड़ी थी।

मीरा की आँखों में पानी था। उसने अपने पिता का हाथ कसकर पकड़ रखा था।

"पापा," वो फुसफुसाई। "आप…"

"चुप," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज नहीं थी, बस एक थकी हुई दृढ़ता थी। "बीस साल से ये लाठी मेरे हाथ में नहीं आई। आज आई है।"

भैरव घास पर पड़ा था। वो अपनी छाती पकड़े हुए था। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।

तभी बाहर से मशालों की रोशनी आई और गाँव वाले दौड़कर आए।

सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं। उनके हाथ में पान का बीड़ा था और साड़ी का पल्ला कंधे से गिरा हुआ था। उन्होंने भैरव को ज़मीन पर पड़ा देखा और उनका मुँह खुला रह गया।

"अरे!" वो चिल्लाई। "अरे मैंने तो सुना था कि भैरव भाग गया! पर ये तो…"

"चुप हो जाओ, बुआ," किसी ने पीछे से कहा।

सुक्खी बुआ ने पलटकर देखा और फिर अपना मुँह बंद कर लिया। ये पहली बार था जब मैंने उन्हें चुप होते देखा।

गाँव के लोग दीवार के उस पार से आ रहे थे — पहलवान, मज़दूर, बच्चे, बूढ़े। उनके हाथों में मशालें थीं और उनके चेहरों पर वो डर नहीं था जो पंचायत वाली रात था। कुछ और था। कुछ जो मैंने पहले नहीं देखा था।

हरनाम ठेकेदार भीड़ में सबसे आगे आया। उसके हाथ में फ़ाइलें नहीं थीं। उसका चश्मा टेढ़ा था और उसकी आँखें लाल थीं।

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