Spirit of a Fighter – Chapter 976
उन्होंने मेरे हाथ को अपने सीने पर रखा। उनका सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था।
"तेरे पापा," उन्होंने फुसफुसाया। "तेरे पापा की हड्डियाँ—"
"मेरे पास हैं," मैंने कहा। "उसी पीतल के संदूक में। मैंने उन्हें छोड़ा नहीं।"
उनकी आँखों से एक आँसू निकला और कान की तरफ़ बह गया। उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और धीरे से सहला दिया, जैसे कोई बीमार आदमी अपने बच्चे को आशीर्वाद दे रहा हो।
तभी बाहर से घोड़ों की टापें सुनाई दीं। मैंने पलटकर देखा।
इंस्पेक्टर शर्मा गेट पर खड़े थे, उनके पीछे चार सिपाही और एक जीप। उनका चेहरा पसीने से भीगा था।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, और आवाज़ में वो अधिकार था जो सिर्फ़ असली पुलिस में होता है। "हमें काग़ज़ मिल गए। हरनाम ने सब कुछ लिख दिया है। भैरव सिंह को हम अपने साथ ले जा रहे हैं।"
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो खंभे से बंधा खड़ा था, पर उसकी आँखें अब भी खुली थीं और वो मेरी तरफ़ देख रहा था। उसकी नज़र में कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया — शायद हार, शायद इंतज़ार।
एक सिपाही आगे बढ़ा, रस्सी खोलने के लिए। उसने भैरव के हाथों की रस्सी छुई। भैरव ने अपने हाथ हिलाए, जैसे कोई जकड़ी हुई कलाई को ढीला कर रहा हो। रस्सी ढीली हुई।
और फिर, अचानक, वो जो हुआ, वो इतनी तेज़ी से हुआ कि मुझे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आया।
भैरव ने उस सिपाही के हाथ से रस्सी खींची, उसके पैरों के बीच लगाया, और सिपाही लुढ़क गया। दूसरे सिपाही ने बंदूक उठाई, पर भैरव पहले ही झुककर उसके पैरों के नीचे से निकल चुका था। उसने खंभे के पीछे मशाल की तरफ़ हाथ बढ़ाया — वो मशाल जो अभी भी जल रही थी — और उसे उठाकर सिपाहियों के सामने फेंक दिया।
मशाल ज़मीन पर गिरी और फैल गई। तेल की गंध फैली। सिपाही पीछे हटे।
"पकड़ो उसे!" इंस्पेक्टर शर्मा चिल्लाए।
पर भैरव अखाड़े की दीवार की तरफ़ भाग रहा था। उसकी धोती का पल्ला उड़ रहा था। वो दीवार के पास पहुँचा — वो दीवार जिसके पीछे पुराना कुआँ था — और उसने एक ईंट खींची। दीवार में एक छेद बना, जैसे कोई पहले से टूटा हुआ हो।
"वहाँ से निकल रहा है!" मैंने चिल्लाया।
मैं दौड़ा। मेरे पैर जल रहे थे, मेरे हाथ जल रहे थे, पर मैं दौड़ा। टिंकू मेरे पीछे दौड़ा। कालू काका कुछ चिल्ला रहे थे, पर मैंने नहीं सुना।
भैरव छेद से घुसा और मैं उसके पीछे। मेरा कंधा ईंटों से टकराया, मैंने खुद को धक्का दिया और दूसरी तरफ़ निकला।
सामने पुराना कुआँ था। वो कुआँ जिसमें भैरव शीशियाँ डुबोता था। वो कुएँ के पास पहुँचा और रुक गया। वो पलटा।
मैंने उसका चेहरा देखा। आधा कुएँ की परछाई में, आधा चाँद की रोशनी में। उसका मुँह खुला था और वो हाँफ रहा था।
"तू मुझे पकड़ लेगा?" उसने कहा। "तू? एक मज़दूर?"
"मैं मज़दूर हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब काँप नहीं थी। "और तू भैरव सिंह। पर अभी तू सिर्फ़ एक आदमी है, जिसके पीछे कोई पानी नहीं, कोई मिट्टी नहीं, कोई अखाड़ा नहीं।"
उसने कुछ सोचा। उसकी आँखें कुएँ की तरफ़ गईं। फिर मेरी तरफ़। कुएँ की तरफ़।
"तूने ये कुआँ देखा है?" उसने कहा। "बीस साल से मैं इसमें शीशियाँ डुबो रहा हूँ। कभी सोचा, इसमें क्या है?"
"नहीं सोचा," मैंने कहा। "और अब नहीं सोचूँगा।"
"अंदर एक और कुआँ है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ अजीब था — शायद पागलपन, शायद सच। "इसके नीचे। बहुत गहरा। मैंने उसमें सब कुछ डाला है। हर शीशी। हर काग़ज़। हर नाम। तेरे पापा का नाम भी।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तू वो काग़ज़ निकाल," मैंने कहा। "अभी।"
"नहीं निकालूँगा," भैरव ने कहा। "पर तू खुद निकाल सकता है। नीचे जाकर। उस कुएँ में। जहाँ मैंने भवानी की हड्डियाँ—"
उसने वो वाक्य पूरा नहीं किया। क्योंकि मैंने उसे पकड़ लिया था। मेरे हाथ उसके गले पर थे और मैं उसे कुएँ की तरफ़ धकेल रहा था। वो मेरे हाथों से छूटने की कोशिश कर रहा था, पर मुझमें उस वक़्त वो ताकत थी जो किसी अखाड़े की मिट्टी से नहीं, किसी माँ की आँखों से आती है।
"बीस साल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "बीस साल तूने मेरे पापा को ज़हर दिया। मेरी माँ को रुलाया। मेरे गाँव के बच्चों को यतीम किया। और अब तू मेरे सामने कुएँ की बात कर रहा है?"
उसने मेरे हाथ से खुद को छुड़ाया और पीछे हटा। उसका पैर कुएँ के किनारे पर पड़ा। एक ईंट हिली और कुएँ में गिरी। उसकी आवाज़ बहुत देर तक आती रही।
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर पसीना था और उसकी आँखों में वो डर था जो शायद पहली बार असली था।
"मैं मरूँगा नहीं," उसने कहा। "मैं तेरे सामने नहीं मरूँगा।"
और फिर उसने कुछ किया जो मैंने सोचा भी नहीं था। उसने अपनी जेब से एक पीली शीशी निकाली — छोटी, चमकदार, वही शीशी जो उसने मुझे दी थी — और उसे कुएँ में फेंक दिया।
शीशी कुएँ में गिरी और उसकी आवाज़ आई, बहुत दूर से, जैसे कोई पाताल से बोल रहा हो।
"अब वो काग़ज़ उसी के साथ है," भैरव ने कहा, और वो हँसा। पहली बार वो हँसा था, और उसकी हँसी में वो कुछ था जो मेरी रीढ़ तक ठंडा कर गया। "नीचे जाकर निकाल। जाकर।"
मैंने पीछे देखा। टिंकू दौड़कर आ रहा था। उसके पीछे इंस्पेक्टर शर्मा और सिपाही।
भैरव ने मौक़ा देखा। वो दीवार की तरफ़ भागा — वो दीवार जिसके पीछे बाड़ थी, और बाड़ के पीछे खेत।
"रुक!" इंस्पेक्टर शर्मा ने चिल्लाया।
पर भैरव दीवार पर चढ़ गया। उसके हाथ ईंटों पर जमे और वो ऊपर खिंच गया। उसकी धोती का पल्ला दीवार पर फँसा और फट गया। वो मुड़ा, ऊपर से मेरी तरफ़ देखा, और उसके होंठ हिले। मैंने उसकी आवाज़ नहीं सुनी, पर मैंने उसके होंठ पढ़े।
"तेरा पापा भी ऐसे ही गया था," वो कह रहा था। "भागते हुए।"
और फिर वो गायब हो गया।
इंस्पेक्टर शर्मा और सिपाही दौड़कर दीवार की तरफ़ गए। मैं कुएँ के पास खड़ा रह गया। मेरी साँस फूल रही थी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
टिंकू मेरे पास पहुँचा। उसने मेरा कंधा पकड़ा।
"भाई," उसने कहा। "तू ठीक है?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने दीवार की तरफ़ देखा। वहाँ, बाड़ के एक खूँटे पर, कुछ लटक रहा था।
मैं दौड़कर वहाँ गया। मेरे पैरों के नीचे सूखी घास थी और उस पर ओस की बूँदें थीं। मैंने उसे उठाया।
लाल धोती का टुकड़ा। जला हुआ, फटा हुआ। और उसमें से एक गंध आ रही थी — गीली मिट्टी की, और उसके नीचे कुछ और, जो मैं पहचानता था। कपूर और चंदन।
वही गंध जो उस रात थी जब किसी ने मुझे गोद में उठाया था।
मैंने टुकड़े को अपनी मुट्ठी में दबा दिया।
तभी मेरे कानों में पीछे से आवाज़ आई। जगत सिंह की आवाज़, जो कालू काका के सहारे दीवार तक आ पहुँचे थे।
"वो भागा नहीं है," उन्होंने कहा।
मैंने पलटकर देखा।
"क्या मतलब?"
"वो भागा नहीं है," जगत सिंह ने दोहराया। "वो तुझे दिखा रहा है कि वो भाग सकता है। वो चाहता है कि तू उसके पीछे भागे। क्योंकि अगर तू उसके पीछे भागेगा, तो तू वहाँ होगा जहाँ वो चाहता है।"
मेरा खून ठंडा हो गया।
"तो मैं क्या करूँ?"
जगत सिंह ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी मुट्ठी पर रखा — उस मुट्ठी पर जिसमें धोती का टुकड़ा था।
"तू वहाँ जा जहाँ वो नहीं चाहता कि तू जाए," उन्होंने कहा। "कुएँ में। नीचे। जहाँ उसने सब कुछ फेंका है। काग़ज़। शीशियाँ। नाम।"
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