Spirit of a Fighter – Chapter 970
"वो तेरा बेटा है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर वो चौंका। "है ना?"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले पर कोई आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया। एक बार। बस एक बार।
"तो आ," मैंने कहा। "उसे अपने हाथों में ले।"
वो हिला नहीं। वो खड़ा रहा। जैसे मेरी बात समझ न आई हो।
"मैं कह रहा हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऊँची हो गई, "आ और अपने बेटे को गोद में ले। मैंने इसे आग से निकाला है। अब इसे तेरे हाथ पकड़ेंगे।"
भैरव के पैर हिले। धीरे। सँभलकर। जैसे कोई बूढ़ा आदमी चल रहा हो, कोई पहलवान नहीं। उसने करण के पास घुटने टेके और अपने दोनों हाथ बढ़ाए। उसके हाथ काँप रहे थे। वो हाथ जिन्होंने बीस साल तक शीशियाँ पकड़ी थीं, अब अपने बेटे का सिर पकड़ने के लिए काँप रहे थे।
उसने करण को अपनी गोद में उठाया। करण का सिर उसकी छाती पर गिरा। और भैरव ने अपना सिर करण के सिर पर रख दिया।
और फिर वो रोया।
वो ऐसे रोया जैसे बीस साल का सूखा हुआ कुआँ एक झटके में भर गया हो। उसकी पीठ हिल रही थी, उसके कंधे हिल रहे थे, और उसकी आवाज़ — वो मीठी, चिकनी आवाज़ — अब टूटी हुई थी। बस फूट रही थी, आवाज़ नहीं।
और तभी करण ने, बेहोशी में, अपने होंठ हिलाए।
"पापा…"
बस इतना। एक शब्द। इतना धीमा कि शायद मैंने ही सुना। पर भैरव ने सुना। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने बेटे के सिर को और कसकर अपनी छाती से लगा लिया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथ जल रहे थे। मेरी पीठ पर छाले उभर रहे थे। और मेरी साँस ऐसी फूल रही थी जैसे मैंने कोई लंबी कुश्ती लड़ी हो।
मैं दीवार की तरफ़ गया और उसके सहारे बैठ गया। मेरी टाँगें मुझे और नहीं उठा सकती थीं। मैंने अपने हाथ देखे। उँगलियों पर छाले थे — लाल, फूले हुए। और दाहिने हाथ की हथेली पर एक जगह जली थी, जहाँ बस का लोहे का दरवाज़ा छुआ था।
मीरा मेरे पास आई। वो बैठ गई मेरे सामने, और उसने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया।
"ये जल गया है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो कभी-कभी आती थी — जब वो डाँटती नहीं थी, बस होती थी। "तूने बस का दरवाज़ा नंगे हाथ से खोला?"
"दस्ताने नहीं थे," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। और फिर — मुझे यकीन नहीं हुआ — वो हँसी। बहुत धीरे। जैसे किसी बात पर नहीं, बस मेरे होने पर।
"तू पगलाया है," उसने कहा। "बिलकुल पगलाया।"
वो अपना बैग खोलकर कुछ ढूँढने लगी। उसने एक छोटी डिबिया निकाली जिसमें हल्की पीली मलहम थी, और मेरी हथेली पर धीरे से लगाने लगी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। और उस मलहम में अदरक और शहद की गंध थी।
मैं दीवार से टिका रहा और उसे अपना हाथ पकड़े हुए देखता रहा।
"मीरा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ थकी हुई थी।
"हूँ।"
"मैंने आज तक किसी को अपने बेटे के लिए रोते नहीं देखा।"
उसने मेरी हथेली पर मलहम लगाते हुए ऊपर देखा।
"और अब?"
"अब देख लिया।" मैंने कहा। "और मुझे समझ नहीं आ रहा — मैं उससे नफ़रत करूँ या तरस खाऊँ।"
मीरा ने मेरा हाथ धीरे से नीचे रखा और मेरी आँखों में देखा।
"दोनों मत कर," उसने कहा। "बस याद रख — उसने जो किया, वो उसके बेटे के लिए नहीं किया। उसने अपने लिए किया। और अपने लिए किए हुए काम का हिसाब बेटे से नहीं लिया जाता, पर बाप से ज़रूर लिया जाता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके माथे पर धुएँ की एक काली लकीर थी। उसके बाल बिखरे हुए थे। और उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे पहली बार अखाड़े की मिट्टी में दिखी थी, जब वो मुझे धक्का देकर बाहर निकाल रही थी।
"तू डॉक्टर बनेगी," मैंने कहा, "तो मरीज़ तेरे हाथ में सुरक्षित रहेंगे।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने को हुई, पर तभी टिंकू की आवाज़ आई।
"भाई! भाई, इधर आ!"
मैं उठा। मेरी टाँगें अभी भी काँप रही थीं, पर मैं उठा।
टिंकू जली हुई घास के ढेर के पास खड़ा था। उसने अपनी लाठी से राख हटाई थी और अब वो नीचे झुक रहा था। उसके हाथ में कुछ था। कुछ चमक रहा था।
"ये देख," उसने कहा, और अपनी आवाज़ धीमी कर दी। जैसे डर रहा हो कि कहीं कोई सुन न ले।
मैंने उसके हाथ से वो चीज़ ली।
एक धातु की प्लेट थी। पीतल की। छोटी, हथेली जितनी। उस पर कुछ खुदा हुआ था। मैंने उसे धुएँ से साफ़ किया और पढ़ा।
"ठाकुर महेंद्र सिंह," मैंने धीरे से पढ़ा। "तहखाने की चाबी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मीरा मेरे पास आई। उसने प्लेट देखी और उसका चेहरा कड़ा हो गया।
"यानी ठाकुर अब खुद अखाड़े पहुँच गया है," उसने कहा। "वो ये प्लेट यहाँ छोड़ गया — जानबूझकर। वो चाहता है कि हम जानें कि वो अंदर है।"
"पर क्यों?" टिंकू ने पूछा। "वो तो भाग रहा था।"
"नहीं," मैंने कहा। "वो नहीं भाग रहा था। वो इंतज़ार कर रहा था।" मैंने प्लेट को अपनी जेब में रखा। "उसे अखाड़े की चाबी चाहिए। और वो अखाड़े के अंदर है।"
हरनाम ने करण की तरफ़ देखा, जो अब भी भैरव की गोद में था। "और ये?" उसने पूछा।
"ये भी चलेगा," मैंने कहा। "अब ये अकेला नहीं है।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — शुक्रिया नहीं, कुछ और। कुछ जो मैं नहीं समझ पाया।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "मैं तेरे पिता के सामने जो हूँ, वो मैं जानता हूँ। पर अगर तू मुझे मौका दे, तो मैं उस आदमी तक रास्ता जानता हूँ जिसने सब शुरू किया था।"
"तू रास्ता जानता है," मैंने कहा, "क्योंकि तूने उसके साथ बीस साल काम किया है।"
"हाँ," भैरव ने कहा। और उसने अपनी आँखें नीची नहीं कीं। "और मैंने उसके साथ बीस साल काम किया है, इसलिए अब मैं तुझे उसका कमज़ोर पल बता सकता हूँ।"
मैंने उसे देखा। दीवार के सहारे बैठा, जले हाथों वाला, थका हुआ — और उस आदमी से बात कर रहा था जिससे मैं सबसे ज़्यादा नफ़रत करता था।
"बोल," मैंने कहा।
"जगत सिंह का शरीर जवान नहीं है," भैरव ने कहा। "वो बीस साल से तहखाने में रह रहा है। उसकी आँखें कमज़ोर हैं, उसकी साँस छोटी है। वो ताकत से नहीं लड़ता। वो बातों से लड़ता है। वो तेरे अंदर का डर जगाएगा। वो तेरे पिता का नाम लेगा, वो तेरी माँ का नाम लेगा, और वो तुझे तोड़ने की कोशिश करेगा — ताकत से नहीं, यादों से।"
मैं चुप रहा।
"और एक बात," भैरव ने कहा। "वो तेरे पिता का गुरु था। तेरे पिता ने उससे जो सीखा, वो तू भी सीखेगा — बिना जाने। जब तू उसके सामने खड़ा होगा, तो तेरे हाथ अपने आप उसी तरह उठेंगे जैसे तेरे पिता के उठते थे। और वो यही इंतज़ार कर रहा होगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था।
"वीर," उसने कहा।
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
और तभी मेरा फ़ोन बजा।
मैंने जेब से निकाला। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था — रणवीर सिंह।
मैंने फ़ोन उठाया।
"वीर!" रणवीर सिंह की आवाज़ पहले से ही फटी हुई आई। और पीछे कुछ और था। कुछ जलने की आवाज़। "वीर, सुन!"
"सर, क्या हुआ?"
"अखाड़े में आग लगी है," उन्होंने कहा और उनकी साँस भारी थी। "पूरी मिट्टी जल रही है। और मैं व्हीलचेयर पर बैठा हूँ, मैं खुद को बाहर नहीं खींच पा रहा! वो मेरी तरफ़ आ रहा है, वीर! मैं उसकी आवाज़ सुन रहा हूँ!"
मेरी छाती कस गई।
"कौन?" मैंने पूछा। "कौन आ रहा है?"
और फिर, फ़ोन पर, रणवीर सिंह की आवाज़ के पीछे, मैंने एक और आवाज़ सुनी। धीमी। बूढ़ी। गाती हुई। कोई पुराना गीत।
वही गीत।
वही गीत जो मेरे पापा रात में मेरे सिर पर हाथ रखकर गुनगुनाते थे।
और मेरा खून जम गया।
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