Spirit of a Fighter – Chapter 969
और तभी, दूर से — गाँव की तरफ़ से — एक आवाज़ आई। घंटे की आवाज़। रणवीर अखाड़े का घंटा। जो बीस साल से नहीं बजा था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी सुना था। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"वीर," उसने कहा, "ये घंटा तो सिर्फ़ अखाड़े के मुख्य दरवाज़ा पर है। और उसे बजाने का हक़ सिर्फ़ अखाड़े के मालिक को है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"माँ," मैंने कहा, "क्या वो…"
"हाँ," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने ज़ख्म से खून निकल रहा हो। "वो घंटा खुद जगत सिंह ने बजाया है। वो तुझे बुला रहा है।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। धुआँ छँट रहा था और सूरज पूरा निकल आया था। लाल। इतना लाल कि आँख जल जाए।
और उसी लाल सूरज के नीचे, दूर गाँव की तरफ़, अखाड़े पर लगा घंटा बज रहा था।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
एक… दो… तीन…
और मुझे पता था — अब जो लड़ाई होगी, वो मिट्टी की नहीं होगी। वो उस आदमी से होगी जो मेरे पिता का गुरु था। जो मेरे पिता को ज़हर देकर भी ज़िंदा रहा। जो बीस साल से मेरे ही गाँव के नीचे बैठा था।
मैंने अपनी मुट्ठी बाँधी। मेरे हाथ में जले के छाले थे, मेरे माथे पर पट्टी थी, और मेरी जेब में पिता का काग़ज़ था।
पर मैं खड़ा था।
और मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "अखाड़ा बुला रहा है।"
मीरा ने करण को गोलू के हवाले किया और उठी। उसने अपना बैग उठाया और मेरे बराबर आकर खड़ी हो गई।
"एक बात कहूँ?" उसने कहा।
"कह।"
"अगर उसने तेरे पापा को ज़हर दिया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मिट्टी में होती है, "तो अबकी बार हम उसे सिर्फ़ पकड़ेंगे नहीं। हम उसका नाम लेंगे — पूरे गाँव के सामने।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"हाँ," मैंने कहा। "अबकी बार नाम लेंगे।"
और हम चले — मैं, मीरा, टिंकू, माँ, कालू काका, हरनाम, गोलू, और करण, जो अभी भी कमज़ोर था पर अपने पैरों पर खड़ा था।
और पीछे-पीछे, सबसे आख़िर में, भैरव सिंह चल रहा था।
घंटा बजता रहा।
और उसकी आवाज़ में एक बात थी जो मेरे कानों से नहीं जा रही थी — घंटे की आवाज़ के नीचे, धीरे से, एक बूढ़ी आवाज़ गा रही थी। कोई पुराना गीत। कोई पुरानी लय।
जो गीत मेरे पापा भी गुनगुनाते थे, जब वो रात में मेरे सिर पर हाथ रखते थे।
और मुझे पता था — वो आदमी मेरा इंतज़ार कर रहा था। बीस साल से।
॥
घंटे की आवाज़ मेरे कानों में बजती रही, पर मेरे पैर उसकी तरफ़ नहीं, स्कूल के पीछे की तरफ़ मुड़ गए। क्योंकि उसी पल टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी और चिल्लाया।
"भाई! धुआँ!"
मैंने पीछे देखा। स्कूल की पिछली दीवार के पार, सूखी घास के मैदान से काला धुआँ ऊपर उठ रहा था। सीधा आसमान में। और उस धुएँ में एक लकीर थी — पतली, सीधी, किसी ने जानबूझकर कुछ जलाया था।
मैं दौड़ा। मेरे पीछे मीरा, टिंकू, हरनाम, और माँ भी। माँ की साँस फूल रही थी पर उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
उस मैदान में पहुँचकर मैं रुक गया।
सामने पुरानी पीली बस खड़ी थी — वही जिसका ज़िक्र गोलू ने किया था। उसके पहिये तक धुएँ में छिपे थे। और बस के पीछे, घास का एक ढेर जल रहा था। आग छोटी थी, पर धुआँ काला और भारी। जैसे कोई जानबूझकर धुआँ बनाना चाहता हो। आँखों को रोने पर मजबूर करने वाला धुआँ।
मैंने गहरी साँस अंदर खींची।
और मेरी नाक ने जो बताया, उससे मेरा पेट कड़ा हो गया।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धुएँ में फट गई, "इस आग में तेल है। ढेर सारा तेल। कोई इसे खुद से नहीं जलाया। किसी ने जलाया है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"बस के अंदर कोई है?" उसने पूछा।
मैंने ध्यान से सुना। धुएँ के शोर में, आग की चटचटाहट में, एक और आवाज़ थी। हल्की। धीमी। किसी के मुँह से निकलती हुई साँस। रुकी हुई। अधूरी।
"हाँ," मैंने कहा। "कोई है। मर रहा है।"
टिंकू ने बिना कुछ पूछे अपनी कुर्ता उतारी। उसने उसे मिट्टी के पास पड़े पानी के हौज़ में डुबोया और निचोड़कर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले भाई," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी पर हाथ नहीं। "मुँह पर बाँध ले। और मैं तेरे पीछे आ रहा हूँ।"
"तू रुक।"
"मैं नहीं रुकूँगा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "भाई, आज तक तू अकेला लड़ता आया। अब नहीं।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने कुछ नहीं कहा। बस कुर्ता मुँह पर बाँधा और आग की तरफ़ बढ़ा।
धुआँ मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारता रहा। मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने अपनी आस्तीन से उन्हें ढका और बस के दरवाज़े तक पहुँचा। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा। पर मेरी नाक मुझे रास्ता दिखा रही थी — जली लकड़ी की गंध के नीचे, उस पीली शीशी वाले ज़हर की गंध थी। और उस गंध के साथ एक और गंध — पसीना। ठंडा पसीना। बीमार आदमी का पसीना।
मैं सीढ़ी चढ़ा। दो सीढ़ियाँ। तीन।
और फिर मैंने उसे देखा।
आख़िरी सीट पर करण पड़ा था। उसका शरीर सीट से आधा नीचे लटक रहा था। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे, उसकी आँखें बंद थीं, और उसकी गर्दन की नस धीरे-धीरे धड़क रही थी। बस। एक धड़कन। फिर रुकना। फिर एक धड़कन।
मैंने उसे गोद में उठाया। वो हल्का था। इतना हल्का कि मुझे लगा मैं किसी बच्चे को उठा रहा हूँ, कोई नौजवान नहीं। उसका सिर मेरे कंधे पर गिरा, और उसके बालों से वही गंध आई जो भैरव के कपड़ों से आती थी — बादाम का तेल।
मैं उसे लेकर नीचे उतरा। मेरी टाँगें काँप रही थीं, और मेरी पीठ पर आग की गरमी चुभ रही थी। पर मैं रुका नहीं।
बाहर निकलते ही मीरा दौड़कर आई। उसने करण को ज़मीन पर लिटाया और अपना बैग खोला। उसकी उँगलियाँ जल्दी में थीं, पर उनमें वो यकीन था जो किसी डॉक्टर के हाथों में होता है।
उसने हरी शीशी निकाली — अदरक और तुलसी वाली। उसने करण के मुँह खोले और धीरे से कुछ बूँदें उसके होंठों के बीच डालीं। फिर उसकी कलाई पकड़ी, आँखें बंद कीं, और अपने होंठ हिलाने लगी — जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
मेरी साँस रुक गई।
"मीरा," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मैं खुद नहीं पहचान पाया।
मीरा ने आँखें खोलीं।
"ज़हर धीमा है," उसने कहा। "देर से दिया है। शायद रात में एक खुराक। इतनी कम कि वो मार न सके, पर बेहोश कर दे।" उसने करण की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "इसकी उम्र कम है, वीर। इसका शरीर जवान है। इसे बचाया जा सकता है।"
मेरे अंदर कुछ खिसका। कुछ जो देर से हिला था, अब हिल गया।
"तो बचा," मैंने कहा।
"मैं कोशिश कर रही हूँ।" उसने कहा। "पर साफ़ हवा चाहिए। और पानी। ठंडा पानी।"
टिंकू पहले से पानी लेकर आ रहा था। हरनाम ने अपनी कमीज़ उतार दी और करण के सिर के नीचे रख दी। माँ उसके पैरों के पास बैठ गईं और उसके माथे पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगीं — जैसे गुड़िया के माथे पर फेरती थीं जब वो बुखार में होती थी।
और उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
दीवार के पास, छाया में, भैरव सिंह खड़ा था।
वो मेरी तरफ़ देख नहीं रहा था। वो करण को देख रहा था। सिर्फ़ करण को। और उसके चेहरे पर जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उसकी बड़ी तेल लगी मूँछें काँप रही थीं, और उसकी आँखें — वो ठंडी आँखें — पानी से भरी हुई थीं।
उसने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर रुक गया। जैसे उसे डर हो कि अगर वो आगे बढ़ा तो हम उसे भगा देंगे।
मेरे अंदर कुछ कड़ा हुआ। ये वही आदमी था जिसने मेरे पिता को ज़हर दिया। जिसने बीस साल तक पहलवानों को मौत की तरफ़ धकेला। जिसने माँ को बंधक बनाया। और अब ये…
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno