Spirit of a Fighter – Chapter 968
और उसी पल — धुएँ के बीच से — भैरव आगे बढ़ा। उसने ठाकुर का हाथ पकड़ा। मशाल नीचे गिरी और फर्श पर लुढ़क गई। मैंने उसे तुरंत पैर से कुचल दिया।
ठाकुर चिल्लाया। उसने भैरव को धक्का दिया। भैरव गिरा — भारी शरीर, थकी साँसें।
मैं करण के पास पहुँचा। उसे उठाया। उसका शरीर बोझिल था, जैसे कोई गीली बोरी। मैंने उसे अपने कंधे पर डाला और बाहर की तरफ़ भागा।
बाहर आते ही हवा मिली। ठंडी, ताज़ी हवा। मैंने करण को ज़मीन पर लिटाया। मीरा दौड़कर आई और उसने अपनी हरी शीशी निकाली।
"पानी," उसने कहा। "जल्दी!"
टिंकू पानी लेकर आया। मीरा ने शीशी की कुछ बूँदें करण के होंठों पर डालीं। फिर उसकी छाती पर हाथ रखकर दबाया। फिर और बूँदें।
करण ने खाँसा।
एक बार। फिर फिर।
और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और मैंने पहली बार किसी अनजान भगवान से कुछ माँगा।
जब मैंने आँखें खोलीं, तो करण की आँखें खुली थीं। वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
"तू…?" उसकी आवाज़ रेत जैसी थी।
"चुप," मैंने कहा। "साँस ले।"
और तभी मैंने पीछे मुड़कर देखा। भैरव अंदर गया था। ठाकुर के पास।
मैं दौड़ा। अंदर धुआँ और गाढ़ा हो गया था। दीवारें जल रही थीं। और बीच में — भैरव ठाकुर को दीवार से चिपका रहा था।
"बीस साल," भैरव चिल्लाया। "बीस साल तूने मुझे अपना कुत्ता बनाकर रखा। और आज तू मेरे बेटे को…?"
ठाकुर ने उसके चेहरे पर थप्पड़ मारा। भैरव लड़खड़ाया। पर उसने अपनी पकड़ नहीं छोड़ी।
"काग़ज़ कहाँ है?" भैरव गुर्राया। "बता। जो काग़ज़ तेरे पास है।"
ठाकुर हँसा। वो हँसी धुएँ में भी साफ़ थी।
"काग़ज़?" उसने कहा। "वो मेरे पास नहीं। वो मेरे बेटे के पास है — जिसे तू कभी नहीं जान सका। और वो अब कहीं दूर जा चुका है, इसी आग के बीच।"
भैरव चीखा। वो एक जानवर जैसा चीखा।
मैं आगे बढ़ा और मैंने भैरव का कंधा पकड़ा।
"छोड़ उसे," मैंने कहा। "छोड़, भैरव। मरने से पहले उसका सच निकलवाना है। मारने से कुछ नहीं मिलेगा।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आग की लपटें दिख रही थीं।
"मेरा बेटा," वो बोला। "मेरा बेटा बच गया?"
"हाँ," मैंने कहा। "वो बाहर है। मीरा के पास। साँस ले रहा है।"
भैरव का शरीर ढीला पड़ा। उसने ठाकुर को छोड़ दिया। ठाकुर दीवार से सरककर गिरा और खाँसने लगा।
मैंने भैरव का हाथ पकड़ा और उसे बाहर खींचा। टिंकू ने ठाकुर को उठाया — उसकी कलाई पीछे मोड़कर, जैसे अखाड़े में दाँव सिखाया जाता है।
बाहर आते ही हम सब ज़मीन पर गिर पड़े।
मैंने आसमान देखा। धुआँ ऊपर जा रहा था और उसके पीछे आसमान नीला था। नीला। गहरा नीला।
और तभी मैंने माँ की आवाज़ सुनी।
"वीर!"
वो दौड़कर आईं। उनके पीछे गाँव वाले थे — मशालें, लाठियाँ, और सबसे आगे — कालू काका, हरनाम, गोलू।
माँ ने मेरा चेहरा पकड़ा। मेरे माथे पर पट्टी देखी। मेरे हाथ देखे — जले हुए।
"तेरे हाथ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ रुक गई।
"ठीक है, माँ," मैंने कहा। "जल गए, बस।"
उन्होंने मेरा सिर अपनी छाती से लगा लिया। उनका दुपट्टा धुएँ की गंध ले रहा था और उनकी साँस में कपूर था — वही कपूर जो हमेशा उनके आँचल में रहता है। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"तू ठीक है?" उन्होंने फुसफुसाया।
"हाँ," मैंने कहा।
"और वो?" — उन्होंने करण की तरफ़ देखा।
"बच गया," मैंने कहा। "मीरा ने बचा लिया।"
माँ ने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा अपने घुटनों पर बैठी थी, करण का सिर उसकी गोद में था, और उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।
माँ उठीं। वो मीरा के पास गईं। और उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखा।
"बेटी," उन्होंने कहा, "तूने जान बचाई।"
मीरा ने ऊपर देखा। और उसकी आँखें भर आईं। माँ ने उसे गले लगा लिया। मीरा ने माँ के कंधे पर अपना चेहरा छुपा लिया और रोई — पहली बार, बिना रोक-टोक।
मैंने अपनी नज़र हटाई। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें देखना नहीं चाहिए — बस उनका होना जानना काफ़ी है।
मैं भैरव के पास गया। वो ज़मीन पर बैठा था, अपने घुटनों को बाँहों में भरे हुए। करण के पास जाने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
"जा," मैंने कहा। "वो तेरा बेटा है।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो मुझसे नफ़रत करेगा," उसने कहा।
"शायद," मैंने कहा। "पर वो अभी ज़िंदा है। और उसके पास तेरे पास आने का वक़्त है। जा।"
भैरव उठा। वो करण के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने करण का हाथ पकड़ा।
करण ने अपना हाथ नहीं खींचा। उसने बस अपनी आँखें खोलीं और अपने पिता को देखा।
"पापा," उसने धीरे से कहा, "मैंने तुम्हारी माँ की तस्वीर देखी थी। मुझे लगा तुम मुझे डाँटोगे।"
भैरव का सिर झुक गया। उसने अपना माथा करण के हाथ पर रख दिया। और वो रोया। एक भारी आदमी, बड़ी मूँछों वाला, बीस साल का ज़हर बाँटने वाला — वो फूट-फूटकर रोया, और उसके आँसू करण की उँगलियों पर गिर रहे थे।
मैं वहाँ से हट गया। मैं ठाकुर के पास गया।
वो टिंकू की पकड़ में था। उसका चश्मा टूट गया था और उसकी कमीज़ जगह-जगह से जली थी।
मैं उसके सामने झुका।
"काग़ज़ कहाँ है?" मैंने पूछा।
ठाकुर ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो हँसा — वो ही पुरानी हँसी, पर अब उसमें ज़ोर नहीं था।
"मेरे बेटे के पास," उसने कहा। "और वो अब गाँव में नहीं। वो उस आदमी के पास है जिसे कोई नहीं जानता।"
"कौन?"
"वो जिसने तेरे पिता को ज़हर वाला पानी दिया था। वो जो अब भी ज़िंदा है। और वो मेरा ही नहीं, तेरा भी दुश्मन है, वीर सिंह।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"नाम," मैंने कहा।
ठाकुर ने अपना मुँह खोला। और फिर उसकी आँखें ऊपर की तरफ़ घूम गईं, और उसका शरीर ढीला पड़ गया। टिंकू ने उसे हिलाया।
"बेहोश है," टिंकू ने कहा।
मैं खड़ा हुआ। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन ठोस नहीं लग रही थी।
माँ मेरे पास आईं।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।
"ठाकुर ने कुछ कहा," मैंने कहा। "एक आदमी का ज़िक्र किया। जिसने पापा को ज़हर दिया था। वो अब भी ज़िंदा है।"
माँ रुक गईं। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"माँ?" मैंने कहा। "तू जानती है?"
माँ ने अपना मुँह खोला। फिर बंद किया।
"माँ।"
"वो…" उन्होंने धीरे से कहा, "वो आदमी जिसका नाम कभी नहीं लिया जाता। वो तेरे पापा का गुरु था। और वो अब भी उसी अखाड़े के नीचे रहता है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"अखाड़े के नीचे?" मैंने कहा। "तहखाने में?"
माँ ने अपना सिर हिलाया। "तहखाने से भी नीचे। एक और तहखाना है जिसका किसी को पता नहीं। कालू जानता है। पर वो बोलता नहीं।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। कालू काका दूर खड़े थे — अपनी लाठी पर टिके, सफ़ेद दाढ़ी हवा में, और उनकी आँखों में वो डर था जो बीस साल पुराना था।
मैं उनके पास गया।
"काका," मैंने कहा। "तू जानता है न? तहखाने से नीचे क्या है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ काँपे।
"मैंने कसम खाई थी," उन्होंने कहा। "भवानी को। कि जब तक वो आदमी ज़िंदा है, मैं उसका नाम नहीं लूँगा।"
"काका," मैंने कहा, और मैंने उनका हाथ पकड़ा, "अगर वो मेरे पिता का हत्यारा है, तो मुझे उसका नाम जानने का हक़ है।"
कालू काका की आँखों से पानी बहा। वो मेरे कंधे पर झुके।
"उसका नाम," उन्होंने फुसफुसाया, "जगत सिंह है। और वो भवानी का गुरु था। और वो आज भी अखाड़े के नीचे, उस पुराने तहखाने में, ज़िंदा है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
अखाड़े के नीचे। उसी अखाड़े के नीचे जहाँ मैं बचपन से मिट्टी में खेलता आया हूँ। उसी मिट्टी के नीचे कोई बैठा था जिसने मेरे पिता को ज़हर दिया था।
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