Spirit of a Fighter – Chapter 967
"तेरा खून?" मैंने कहा, और मैंने शीशी निकालकर उसकी तरफ़ बढ़ा दी। "ये तेरे बेटे की लिखाई है। ये शीशी उसने अपने हाथ से भेजी थी — इस पर लिखा है मत पीना।"
भैरव की नज़र शीशी पर गई।
"और ये शीशी," मैंने कहा, "तेरे आदमी लंगड़े ने उसे ज़बरदस्ती पिलाई। तेरे बेटे को। तेरी ही शीशी।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ा।
"वो पहले एक इंसान है, भैरव। तेरा खून बाद में। और तूने उसे अपना ही ज़हर पिला दिया।"
भैरव का चेहरा टूटा।
मैंने उसे पहले कभी टूटते नहीं देखा था। न जब पंचायत में उसका नाम खुला, न जब पुलिस ने उसे पकड़ा। पर अभी — अभी उसका मुँह खुला रह गया, और उसकी आँखों में वो ठंडक पहली बार हिली।
"क्या?" उसकी आवाज़ फटी। "लंगड़े ने…?"
"हाँ," मैंने कहा। "लंगड़े ने। तेरे बेटे को। तेरे ही ज़हर से।"
भैरव ने एक कदम पीछे रखा। फिर उसने दीवार का सहारा लिया। उसकी उँगलियाँ सफ़ेदी पर फिसलीं, और वो धीरे-धीरे बैठ गया — घुटनों के बल, दीवार से टिका हुआ, एक बूढ़े आदमी की तरह। वो बूढ़ा आदमी जो अभी तक खुद को जवान समझ रहा था।
"बीस साल," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ टूटा हुआ था, "बीस साल मैंने सबको ज़हर दिया…"
उसने अपने हाथ देखे। दोनों हाथ। जैसे पहली बार देख रहा हो।
"और आज मेरा ही बेटा…"
टिंकू ने मेरी कलाई दबाई। मैंने उसे चुप रहने का इशारा किया।
मैं भैरव के सामने झुका। घुटने के बल। उसके चेहरे के सामने।
"सुन," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "अगर तू सच बोले, तो मैं तेरे बेटे को बचा सकता हूँ। मीरा के पास दवा है। माँ उसे संभाल लेंगी। पर अगर तू अभी भी खेल खेलेगा, तो वो कल तक नहीं रहेगा। समझा?"
भैरव ने अपना सिर उठाया।
और पहली बार, बीस साल में पहली बार, उसने सीधा मेरी आँखों में देखा। बिना ठंडक। बिना हिसाब। बस देखा।
"मैंने उसे अंदर नहीं भेजा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ रेत जैसी थी। "करण। वो मेरे पास आया था अपनी माँ की तस्वीर लेने। मैंने उसे बस थोड़ी देर रोका था। मैंने उसे कुछ नहीं कहा।"
"तो किसने कहा?" मैंने पूछा। "किसने उसे ज़हर दिया?"
भैरव ने अपना मुँह खोला। फिर बंद किया। फिर खोला।
"लंगड़ा मेरा आदमी नहीं है," उसने कहा।
मेरे पीछे टिंकू ने साँस रोकी।
"क्या?"
"शेराज़ को मैंने नहीं भेजा। वो मेरे पास चौदह साल पहले आया था — ठाकुर महेंद्र के साथ। ठाकुर ने कहा था इसे अपने पास रख, ये तेरे काम आएगा। मैंने रख लिया। पर वो मेरा नहीं, ठाकुर का है।"
उसने मेरे शीशी वाले हाथ की तरफ़ देखा।
"और आज जो हुआ… करण को उठाकर ले जाना… ये ठाकुर का काम है। ठाकुर ही मेरे बेटे को ले गया है।"
"क्यों?" मैंने पूछा। "क्यों ले जाएगा ठाकुर तेरे बेटे को?"
भैरव ने अपना सिर दीवार से टिका दिया। उसकी आँखें बंद हो गईं।
"क्योंकि," उसने कहा, "ठाकुर के पास मेरी एक बात है। एक काग़ज़। जो मैंने बीस साल पहले लिखा था। और अगर वो काग़ज़ बाहर आया, तो बीस साल का सारा सच — सिर्फ़ मेरा नहीं, ठाकुर का भी — खुल जाएगा। इसलिए वो करण को रखकर मुझे बाँधना चाहता है।"
"कैसा काग़ज़?" मैंने पूछा।
"भवानी की मौत का असली काग़ज़। जिस पर मेरे हस्ताक्षर हैं। और ठाकुर के भी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तो तूने भवानी को मारा?"
भैरव ने आँखें खोलीं।
"मैंने ज़हर दिया," उसने धीरे से कहा। "पर मारने का हुक्म ठाकुर का था। मैं तब जवान था। मुझे लगा अगर मैंने नहीं किया तो मेरा भी वही हश्र होगा। मैं डर गया था, वीर। मैं आज भी डरा हुआ हूँ — बीस साल से।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"तो अब डर खत्म," मैंने कहा। "तू मेरे साथ चलेगा। और जो काग़ज़ ठाकुर के पास है, वो हम निकलवाएँगे।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था — शायद शर्म, शायद थकान।
"तू मुझे मारेगा नहीं?" उसने पूछा।
"मारने से क्या होगा?" मैंने कहा। "मरे हुए आदमी से सच नहीं निकलता। ज़िंदा आदमी से निकलता है। और तेरे बेटे को बचाने के लिए मुझे तेरा सच चाहिए। चल।"
भैरव उठा। उसके घुटने काँप रहे थे। टिंकू ने उसकी बाँह पकड़ी — ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर से, मैंने देखा — पर भैरव ने कुछ नहीं कहा।
हम स्कूल के गेट से अंदर घुसे। आँगन खाली था। कमरे बंद थे। और फिर…
आग।
स्कूल के पीछे से धुआँ उठ रहा था। काला, मोटा धुआँ। और उसके नीचे लपटें — पीली, लाल, ऊपर उठती हुईं।
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ी।
"ट्यूबवेल वाला कमरा," वो बोला। "गोलू ने कहा था न — करण वहीं बंद था।"
मैं दौड़ा।
आँगन के पीछे से रास्ता मुड़ता था — आम के पेड़ों के बीच से। धुआँ मेरी आँखों में घुस रहा था और मेरी साँस फूल रही थी। पर गंध साफ़ थी — जली लकड़ी, जला कपड़ा, और उसके नीचे मिट्टी के तेल की बू। किसी ने तेल डालकर आग लगाई थी।
ट्यूबवेल का कमरा पत्थर का था, छत पक्की, और दरवाज़ा लोहे का। दरवाज़े के नीचे से धुआँ रिस रहा था। और दरवाज़े पर एक लोहे की ज़ंजीर थी — बाहर से बंद।
मैंने ज़ंजीर पकड़ी। गरम थी। मेरी हथेली जल गई, पर मैंने छोड़ा नहीं।
"टिंकू!" मैं चिल्लाया। "कुछ भारी!"
टिंकू दौड़कर आया। उसने अपना कुर्ता उतारकर ज़ंजीर पर लपेटा, और हम दोनों ने मिलकर खींचा।
एक बार। दो बार।
ज़ंजीर ढीली पड़ी। दरवाज़ा खुला।
अंदर धुआँ भरा था। कोई खिड़की नहीं। और कोने में — गंगा देवी बँधी हुई थीं। उनका मुँह कपड़े से बंधा था और उनकी आँखें खुली थीं — डर से फटी हुईं।
मैं अंदर घुसा। साँस घुट रही थी। मैंने गंगा देवी के बंधन खोले। वो खाँस रही थीं।
"बाहर," मैंने कहा। "जल्दी।"
उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे खींचकर बाहर ले आईं। पर तभी मैंने पीछे मुड़कर देखा।
दीवार से पीछे — तख़्ते पर — करण लेटा था। बेहोश। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे। और उसके पास…
ठाकुर महेंद्र खड़ा था। उसके हाथ में मशाल थी। और उसकी आँखों में वो हँसी थी जो मैंने बीस साल पहले कब्र पर सुनी थी।
"आ गया, वीर सिंह," उसने कहा। "मुझे पता था तू आएगा। भवानी का बेटा होकर तू कैसे न आता?"
मीरा पीछे से आई। उसकी आँखें धुएँ से लाल थीं। उसने अपना बैग खोला और करण की तरफ़ बढ़ी।
"रुक," ठाकुर ने कहा। उसने मशाल ऊपर उठाई। "एक कदम आगे बढ़ी तो ये मशाल इसकी छाती पर रख दूँगा।"
मीरा रुक गई। उसकी मुट्ठी बंधी।
और मैंने पीछे से एक आवाज़ सुनी — भारी, फटी, काँपती।
"महेंद्र।"
भैरव दरवाज़े पर खड़ा था।
"महेंद्र," उसने फिर कहा, "मेरा बेटा छोड़।"
ठाकुर हँसा।
"तेरा बेटा?" उसने कहा। "भैरव, तूने बीस साल मेरे लिए ज़हर बाँटा और अब अपने बेटे की बात करता है? तू वही कर जो मैंने कहा — चुप रह। और ये लड़का और ये लड़की, दोनों आज यहीं रहेंगे।"
और उसने मशाल करण की तरफ़ झुका दी।
मैंने अपनी आँखें बंद नहीं कीं।
मैंने ठाकुर के हाथ पर देखा — वो काँप रहा था। थोड़ा-सा। बस उँगलियाँ। और उसकी साँस — तेज़, उखड़ी हुई। और उसके कपड़ों की गंध — मिट्टी का तेल।
और फिर मैंने सुना — दूर से, आँगन की तरफ़ से — पैरों की आवाज़। बहुत सारे पैर। और माँ की आवाज़।
"वीर!"
मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा।
"तेरा आदमी लंगड़ा इसी दरवाज़े पर तेरा इंतज़ार कर रहा था," मैंने कहा। "पर अब वो बाहर नहीं, अंदर है। पुलिस के पास। और तेरे पास सिर्फ़ एक रास्ता है — मशाल नीचे रख, और सच बोल।"
ठाकुर की आँखें हिलीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno