Spirit of a Fighter971 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 971

7 min read November 5, 2026

मेरा खून जम गया।

"सर, आप वहीं रहिए," मैंने फ़ोन पर चिल्लाया। "कुछ मत कीजिए। मैं आ रहा हूँ।"

"वीर, वो… वो गा रहा है," रणवीर सिंह की आवाज़ काँप रही थी। "वो मेरे पास से गुज़र गया और… और उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। वो तहखाने की तरफ़ गया है।"

लाइन कट गई।

मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो दीवार के सहारे बैठा था, करण की गोद में।

"तू जानता है ये क्या है?" मैंने पूछा।

भैरव ने मेरी आँखों में देखा। और पहली बार, उसकी आँखों में डर था। सच्चा डर।

"वो तहखाने की मिट्टी जलाने आया है," उसने कहा। "बीस साल की सारी गंदगी मिटाने। और जो भी अंदर होगा, वो भी जल जाएगा।"

मैं भागा।

"वीर!" मीरा ने पीछे से आवाज़ दी।

"तू यहीं रुक," मैंने कहा, बिना पलटे। "करण को गाँव भेज।"

"मैं तेरे साथ हूँ।"

"मीरा—"

"मैं बहस नहीं कर रही," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं जानता था।

मैं रुका। पलटा। उसके हाथ में वो हरी शीशी थी, और दूसरे हाथ में उसका बैग।

"तेरे पास क्या है?" मैंने पूछा।

"जो भी ज़रूरी होगा।" उसने कहा। "चल।"

टिंकू पहले से दौड़ रहा था। उसकी टोपी उड़ गई थी, पर वो पलटकर नहीं देख रहा था। मैंने कभी टिंकू को इतनी तेज़ भागते नहीं देखा था। वो दुबला था, उसकी साँस जल्दी फूलती थी, पर आज वो मेरे साथ था।

स्कूल की गली, बाज़ार का मोड़, नहर का पुल — सब कुछ धुंधला सा गुज़रता गया। रास्ते में लोग खड़े थे, हाथ में बाल्टियाँ लिए, कुछ लोग दौड़ रहे थे। एक बूढ़ी औरत ने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की।

"बेटा, वहाँ मत जा, आग बहुत है!"

मैंने हाथ छुड़ाया।

अखाड़े की मिट्टी की दीवार दूर से दिखी। और उसके ऊपर, आसमान में, धुएँ का एक मोटा काला खंभा। मेरी साँस रुक गई।

धुआँ इतना घना था कि सूरज की रोशनी भी उसमें घुल गई थी। आग की लपटें दीवार के ऊपर नाच रही थीं, लाल और पीली, जैसे कोई जानवर अपना मुँह खोले खड़ा हो।

मैं दौड़ा। पैर धूल में फिसल रहे थे। और जब मैं दरवाज़े के पास पहुँचा, तो मैंने उसे देखा।

भैरव।

नहीं। यह भैरव नहीं था।

दरवाज़े के ठीक सामने, अखाड़े की मिट्टी पर, एक आदमी खड़ा था। बहुत पतला। कुबड़ा सा। सिर पर चमड़े की टोपी, जिसके नीचे से सफ़ेद बाल झाँक रहे थे। उसके हाथ में मशाल थी, और मशाल की लौ हवा में काँप रही थी।

पर उसकी आँखें। वो आँखें मैंने कभी नहीं देखी थीं। छोटी, धँसी हुई, और उनमें वो चमक थी जो आग की लपटों से भी ज़्यादा बुरी थी।

वो गा रहा था।

धीमी आवाज़ में। कोई बहुत पुराना गीत। और उसकी आवाज़ में कुछ था जो मेरी छाती में सुई की तरह चुभा।

वही गीत। वही, जो पापा रात में गुनगुनाते थे।

"रुक!" मैंने चिल्लाया।

वो रुका। पलटा। और मुझे देखकर मुस्कुराया। ऐसी मुस्कान जो किसी बच्चे को देखकर आती है।

"आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे पुराने काग़ज़ को मोड़ने की आवाज़। "मैं जानता था तू आएगा। तेरे पिता भी ऐसे ही आए थे।"

"तू जगत सिंह है?" मैंने पूछा।

उसने मशाल को ऊपर उठाया।

"मैं वो हूँ जो तेरे पिता ने बनाया था," उसने कहा। "और मैं वो हूँ जिसे तेरे पिता ने छोड़ दिया।"

और फिर, बिना एक पल रुके, उसने मशाल अपने पीछे फेंक दी।

मशाल हवा में घूमी, और सीधे अखाड़े के बीच, उस सूखी घास पर गिरी जहाँ पहलवान अपनी चोटें सुखाते थे। आग ने एक पल में पकड़ लिया। एक झटके में, पूरी मिट्टी के ऊपर लाल लपटें दौड़ गईं।

"नहीं!" मैं चिल्लाया।

आग हवा से भड़क उठी। और जगत सिंह मुस्कुराता हुआ पीछे हट गया, और उसकी आकृति धुएँ में घुल गई।

मैं आगे बढ़ा। पर टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ लिया।

"भाई, रुक! तू अंदर नहीं जा सकता, ये आग—"

"मेरे पिता की मिट्टी जल रही है!" मैंने चिल्लाया। "वो मिट्टी जिसमें उसकी हड्डियाँ हैं!"

और मैंने टिंकू का हाथ झटक दिया।

मैंने धोती का एक सिरा पकड़ा और अपने मुँह और नाक पर बाँध लिया। मीरा पीछे से दौड़ी आई।

"वीर, रुक जाओ!" उसकी आवाज़ फट गई थी। "आग तेरा रास्ता बंद कर देगी!"

पर मैं नहीं रुका।

मैं दरवाज़े से घुसा और आग मुझे घेरने लगी।

धुआँ आँखों में लगा। मेरी आँखों से पानी बहने लगा। मैंने पलकें झपकीं, पर कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ लाल और काला। और गरमी। ऐसी गरमी जैसे कोई मेरी खाल को खींच रहा हो।

मैं रुका।

एक पल को रुका।

और फिर मुझे वो गंध आई।

धुएँ के बीच से। आग की बदबू के नीचे से। वो गंध मेरी नाक में घुसी और सीधे मेरे दिल तक पहुँची।

गीली मिट्टी। हल्दी। पुराने पसीने की बू। और कपूर।

मेरे पापा की गंध।

मेरा सीना फूल गया। आग मेरे चारों तरफ़ थी, और मैं खड़ा था, और मेरे पैर जम गए थे। वो गंध अब और तेज़ हो गई। दीवारों से, मिट्टी से, ज़मीन से — जैसे पूरा अखाड़ा उसी गंध से बना हो।

"पापा," मैंने फुसफुसाया। मेरी आवाज़ धोती के नीचे दब गई।

और तभी मुझे लगा कि मेरे कंधे पर कोई हाथ है। बहुत हल्का। बहुत गरम नहीं। बस एक एहसास।

मैंने पीछे देखा। कोई नहीं था।

पर मेरी आँखों में पानी और भी बहने लगा, और इस बार वो धुएँ से नहीं था।

"मैं यहीं हूँ," मैंने धीरे से कहा। मुझे नहीं पता किससे कह रहा था। "मैं तेरी मिट्टी नहीं जलने दूँगा।"

और फिर मैंने अपनी जेब से वो पीतल की प्लेट निकाली जो स्कूल में मिली थी। उस पर लिखा था — "तहखाने की चाबी।" मैंने उसे मुँह से लगाया, और फिर अपनी छाती पर रखा।

और मैं आगे बढ़ा।

आग मेरे दोनों तरफ़ थी। मैं बीच से गुज़रा। मेरी धोती का छोर जल गया, मैंने उसे झटक दिया। मेरी बनियान की आस्तीन पर एक चिंगारी गिरी और छेद कर गई। मैंने महसूस किया, पर रुका नहीं।

तहखाने का दरवाज़ा सामने था। लोहे का बड़ा दरवाज़ा, जिस पर जंग लगी थी। और उसके ऊपर आग की लपटें नाच रही थीं।

मैंने दरवाज़े को धक्का दिया। वो खुला हुआ था।

और अंदर से, सीढ़ियों के नीचे से, एक आवाज़ आई।

खाँसी।

कोई खाँस रहा था। धीमी, टूटी खाँसी। और उसके साथ एक धीमी सी आवाज़, जो कुछ गा रही थी।

वो मेरी माँ की आवाज़ नहीं थी।

वो किसी और की थी। कोई बूढ़ा। कोई जिसकी आवाज़ सालों से इन सीढ़ियों में बंद थी।

मैं एक पल के लिए रुका। आग मेरे पीछे दहाड़ रही थी। ऊपर से टिंकू की आवाज़ आई।

"भाई! बाल्टी आ रही है! बाहर निकल!"

और मीरा की आवाज़।

"वीर, प्लीज! वो सीढ़ियाँ गिर रही हैं!"

मैंने पीछे देखा। सीढ़ियों की जो लकड़ी की रेलिंग थी, वो जल रही थी। और सीढ़ियाँ खुद, मिट्टी की, उनसे रेत की तरह गिर रही थी।

मुझे नीचे जाना था। और फिर ऊपर आना था।

और अगर मैं अंदर गया, तो शायद वो रास्ता बंद हो जाए।

मैंने एक गहरी साँस ली। धुआँ मेरे फेफड़ों में भरा। मेरी आँखें जलीं। और मैंने अपने हाथ जोड़ लिए।

"अगर ये आख़िरी बार है," मैंने धीरे से कहा, "तो माफ़ कर देना माँ।"

और मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।

तभी मेरा हाथ किसी ने पीछे से पकड़ लिया।

मैं पलटा। मेरी छाती धक-धक कर रही थी।

कालू काका थे।

उनका चेहरा राख से पुता हुआ था। उनकी दाढ़ी जली हुई थी, एक तरफ़ से। उनके हाथ में एक बाल्टी थी, पानी से भरी, और उनकी आँखों में आग की लपटें नाच रही थीं।

"तू नीचे मत जा," उन्होंने कहा।

"काका—"

"सुन!" उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर उनकी पकड़ मज़बूत थी। "मैं बीस साल से इस दरवाज़े का रखवाला हूँ। ये दरवाज़ा मेरी हड्डियों से बना है।"

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