Spirit of a Fighter964 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 964

7 min read November 5, 2026

"उसके बाद करण बिलकुल चुप हो गया," गोलू ने कहा। उसकी आवाज़ टूटने लगी। "वो बोलता नहीं था, हिलता नहीं था। मैंने उसे हिलाया, मैंने उसका नाम पुकारा, पर वो ऐसे पड़ा रहा जैसे सो गया हो। और लंगड़ा हँसता रहा। उसने कहा — 'ये तो शुरुआत है। तेरे चाचा ने कहा है कि इसको वो पानी पिलाना जो इसके बाप को पिलाया था।'"

मैंने आँखें बंद कर लीं। वही शीशी। वही ज़हर। बीस साल पहले मेरे पिता भवानी सिंह को इसी पानी ने मारा था, और आज भैरव अपने ही बेटे को वही पिला रहा था — सिर्फ़ इसलिए कि वो बच्चा उसके रास्ते में खड़ा हो गया था, सिर्फ़ इसलिए कि उसने एक बार "मत पीना" लिखकर शीशी भेज दी थी।

"वही शीशी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक आ गई जो मुझे खुद पसंद नहीं आती। "वही ज़हर।"

"बस कहाँ रुकी थी?" मीरा ने पूछा। उसने गोलू के कंधे पर हाथ रखा, और उसका हाथ काँप रहा था। "गोलू, ध्यान से सोच। बस कहाँ रुकी थी? कोई आवाज़, कोई गंध?"

गोलू ने आँखें मूँद लीं। उसका माथा सिकुड़ा।

"लाल ईंटें," उसने कहा। "बहुत सारी लाल ईंटें। और पानी की आवाज़ आती थी। बहुत पानी। जैसे कोई बाँध हो। और एक चिमनी थी जो टूटी हुई थी, और उसमें से काला धुआँ नहीं, सिर्फ़ लाल रंग निकलता था।"

मेरी नसों में खून दौड़ गया। लाल ईंटें। पानी की आवाज़। टूटी चिमनी।

"नहर के पास वाला पुराना भट्ठा," मैंने कहा। "वही भट्ठा जहाँ रघुवीर मिला था। जहाँ कालू काका ने कहा था कि सुरंग का मुँह है।"

कालू काका ने सिर हिलाया। उनका चेहरा पीला था, और उनकी सफ़ेद दाढ़ी हवा में हिल रही थी।

"वो भट्ठा सिर्फ़ सुरंग का मुँह नहीं है," उन्होंने धीरे से कहा। "वो भैरव का सबसे पुराना ठिकाना है। जब से वो नौजवान था, वो वहाँ जाता था। मैंने एक बार देखा था उसे वहाँ एक बोरी लेकर जाते हुए। बोरी में कुछ था जो हिल रहा था।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी टोपी तिरछी हो गई थी, और उसने उसे सीधा नहीं किया — यही उसके डरने की निशानी थी।

"भैया," उसने कहा, "अगर करण को वो पानी पिला दिया है, तो…"

"तो हमें वक़्त नहीं गँवाना है," मैंने कहा।

पर तभी गोलू ने एक आवाज़ निकाली। छोटी, दबी हुई, जैसे कोई सपने में रो रहा हो।

"वो काँप रहा था," गोलू ने कहा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, और वो उन्हें पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रहा था। "करण मेरा दोस्त है। जब मैं पहली बार स्कूल गया था, तो कोई मुझसे नहीं बोलता था। मैं कोने में बैठ जाता था। फिर करण आया और उसने अपनी रोटी मेरे साथ बाँटी। उसने कहा — 'मेरे पापा बुरे हैं, पर मैं बुरा नहीं हूँ।' भैया, मैं उसे छोड़कर नहीं आया। मैं उसे बचाने वापस जाऊँगा।"

मेरे घुटने अपने आप ज़मीन पर टिक गए। मैंने अपनी जेब से वो कपड़ा निकाला जो मीरा ने मुझे दिया था — गीला, ठंडा, तुलसी की गंध वाला। और मैंने गोलू के घाव धीरे-धीरे साफ़ किए। उसकी कलाई पर रस्सी के निशान थे, लाल, उभरे हुए। उसके घुटने छिले हुए थे, और उसकी एड़ी में काँटा धँसा था जिसे मैंने बड़े ध्यान से निकाला। गोलू ने एक बार भी "आह" नहीं कहा।

"तू बहादुर है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो नरमी आ गई जो मैंने सिर्फ़ गुड़िया के सामने रखी थी। "तूने अपनी जान बचाकर भी अपने दोस्त को नहीं छोड़ा। मुझे पता है डर कैसा लगता है। मैं भी बचपन में रातों को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था और डरता था कि कोई मुझे देख न ले। पर तूने डर के बीच भी करण का हाथ नहीं छोड़ा। ये छोटी बात नहीं है, गोलू।"

गोलू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो डर था वो थोड़ा-सा पिघला।

"और मैं वादा करता हूँ," मैंने कहा, "कि जब तक करण ज़िंदा है, मैं उसे उसके बाप से बचाकर लाऊँगा। चाहे मुझे खुद उसी पानी का घूँट पीना पड़े।"

हरनाम ने एक आवाज़ निकाली। वो कुछ कहना चाहता था, पर शब्द उसके गले में अटक गए। वो गोलू के पास आया, और उसने अपने बेटे को गले लगा लिया। और फिर वो रोया। बैठकर, ज़मीन पर, दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर, ऐसे रोया जैसे बीस साल का सारा झूठ, सारा हिसाब, सारी फ़ाइलें एक साथ उसके सीने से बाहर निकल रही हों। गोलू ने अपने छोटे हाथों से उसका सिर सहलाया — ठीक वैसे ही जैसे माँ मेरा सिर सहलाती थी।

"पापा, रो मत," गोलू ने कहा। "मैं ठीक हूँ। और अब हम सब ठीक होंगे, है ना?"

हरनाम ने सिर हिलाया। पर वो कुछ नहीं बोला। बोल नहीं सका।

मीरा मेरे पास आई और उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "तूने कभी मुझसे नहीं कहा कि तू रातों को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें गीली थीं, पर उसमें हँसी भी थी — वो हँसी जो तब आती है जब कोई किसी को पहली बार पूरा देखता है।

"अब पता चल गया," मैंने कहा। "मेरी सारी शर्मीली बातें अब तेरे सामने खुल गईं।"

"शर्मीली?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ताना आ गया जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। "तू तो पूरा अखाड़ा जीतने की बात करता है, पर अपनी रातों की खबर किसी को नहीं देता। चल, उठ। हमें देर हो रही है।"

मैं उठा। और तभी मेरी जेब में कुछ हिला।

मोबाइल। मीरा के नाम से एक मैसेज। मैंने स्क्रीन खोली और मेरी साँस रुक गई।

"वीर, अखाड़े की तरफ़ से धुआँ दिख रहा है। मैं स्कूल की छत से देख रही हूँ।"

और उसके नीचे एक और मैसेज, दो सेकंड बाद आया हुआ:

"और भैरव यहाँ शहर में है। मैंने उसे सड़क पर देखा। वो सीधा स्कूल की तरफ़ आ रहा है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी और उसका चेहरा सफ़ेद था।

"क्या हुआ?" टिंकू ने पूछा।

मैंने उसे मोबाइल दिया। उसने पढ़ा, और उसकी टोपी फिर उसकी आँखों पर आ गई।

"अखाड़े में आग?" उसने कहा। "पर वहाँ तो माँ हैं नहीं… माँ तो गाँव में…"

"माँ गाँव में नहीं है," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो बहुत देर तक चुप रहने से आती है। "माँ यहाँ आई थी — गाँव वालों के साथ, मशालें लेकर। वो हमारे पीछे-पीछे स्कूल तक आई थी। और मैंने उसे अभी देखा नहीं… मैंने उसे दीवार के पास छोड़ा था।"

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।

मैं भागा।

पीछे से मीरा की आवाज़ आई — "वीर, रुक!" — पर मैं नहीं रुका। स्कूल की दीवार, वो ईंटें जिन पर काई थी, वो टूटा फाटक जिससे हम घुसे थे — सब कुछ धुंधला होकर पीछे छूट गया। मेरे पैर ज़मीन पर पड़ रहे थे और मेरी साँस फूल रही थी, पर मेरा दिमाग़ सिर्फ़ एक चीज़ पर अटका था। माँ। माँ, जो चक्की चलाकर मुझे पहलवान बनाना चाहती थी। माँ, जिसने कभी मेरी किसी बात का जवाब सीधा नहीं दिया, बस हल्दी का टीका लगाकर चुप रह गई। माँ, जिसके हाथों में आटे की गंध थी और आँखों में वो चमक जो किसी चक्की में नहीं पिसती।

स्कूल के बाहर भीड़ थी। गाँव वाले, मशालें, चीखें। और धुआँ — दूर से, अखाड़े की तरफ़ से, काला धुआँ आसमान में उठ रहा था।

"माँ!" मैंने पुकारा। "माँ!"

कोई जवाब नहीं।

फिर मैंने वो गंध पकड़ी। आटा। हल्दी। पसीना। और उसमें मिली हुई एक और गंध — बादाम के तेल की। भैरव।

मैं पलटा। और मैंने उसे देखा।

भैरव स्कूल के फाटक पर खड़ा था। उसकी लाल धोती धूल में सनी थी, और उसकी आँखें ठंडी थीं। उसके एक हाथ में माँ का हाथ था — माँ का कलाई पकड़े हुए, जैसे कोई बच्चा पकड़ता है। माँ का मुँह बँधा था, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था। और भैरव के दूसरे हाथ में एक मशाल थी।

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