Spirit of a Fighter965 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 965

7 min read November 5, 2026

"तो तू आ गया," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मुझे बचपन से डराती आई है। "मैं जानता था तू आएगा। तेरी माँ तेरे लिए चारा है, वीर सिंह। तू अपनी माँ को छोड़कर अपने दोस्त के बच्चे को बचाने नहीं जाएगा।"

मैंने एक कदम आगे रखा।

"माँ को छोड़ दे," मैंने कहा।

"क्यों छोड़ूँ?" भैरव ने कहा। "तेरी माँ ने बीस साल मुझे देखा है। वो जानती है कि मैं क्या हूँ। और वो कभी कुछ नहीं बोली, क्योंकि उसे पता था कि अगर बोलेगी तो तेरा क्या होगा।" उसने माँ की कलाई ज़ोर से पकड़ी, और माँ ने आँखें बंद कर लीं। "पर आज वो बोली है। आज वो गाँव वालों के साथ मशालें लेकर आई है, मेरे खिलाफ़। तो अब मैं भी कुछ बोलूँगा।"

उसने मशाल ऊपर उठाई।

"तेरे सामने एक चुनाव है, वीर सिंह," उसने कहा। "या तो तू मेरे साथ चल, और मैं तेरी माँ को छोड़ दूँगा, और करण को भी छोड़ दूँगा। या तू अपने रास्ते जा, और मैं तेरी माँ को ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।"

मेरी मुट्ठियाँ कस गईं। मेरी आँखों के सामने माँ का चेहरा था — वो चेहरा जो मुझे हर सुबह चार बजे चक्की की आवाज़ के साथ दिखता था।

और तभी माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने अपनी आँखों से कुछ कहा। शब्द नहीं, पर मैंने सुना। "मत आ, बेटा। ये तेरा वक़्त नहीं है।"

मैंने उनकी बात मानी।

नहीं।

मैंने उनकी बात नहीं मानी।

"भैरव," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने अपने पिता की कब्र से सीखी थी। "तूने मेरे पिता को मारा। तूने उनतीस नौजवानों को मारा। तूने अपने ही बेटे को ज़हर दिया। और अब तू मेरी माँ को धमका रहा है।"

मैंने एक कदम और बढ़ाया।

"तू भूल रहा है, भैरव," मैंने कहा, "कि मैं वो लड़का हूँ जो रातों को तेरे अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था। मैंने तुझे हर रोज़ देखा है। मैंने तेरी आवाज़ सुनी है। मैंने तेरी चाल देखी है। और मुझे पता है कि तू कब झूठ बोलता है।"

भैरव की आँखें सिकुड़ीं।

"अभी तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। "तू कभी मेरी माँ को नहीं मारेगा। क्योंकि तू जानता है कि अगर माँ को कुछ हुआ, तो गाँव वाले तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे। तू ये सिर्फ़ इसलिए कर रहा है क्योंकि तू डरा हुआ है। तेरा बेटा तुझसे नफ़रत करता है। तेरा गाँव तुझसे घृणा करता है। तेरा नाम — विक्रम — अब हर मुँह पर है, और वो नाम तुझे मार रहा है।"

भैरव का चेहरा बदला। उसकी मुट्ठी काँपी।

और उसी पल, पीछे से एक आवाज़ आई।

"भैरव सिंह! हाथ ऊपर करो!"

इंस्पेक्टर शर्मा। पीछे खड़े थे, दो सिपाहियों के साथ, और उनका रिवॉल्वर तनी हुई था।

भैरव पलटा। और उसी पल मैंने छलाँग लगाई।

मैंने उसकी मशाल वाली कलाई पकड़ी और मरोड़ दी। मशाल ज़मीन पर गिरी और धूल में बुझ गई। माँ छूटीं और वो लड़खड़ाकर पीछे हटीं। टिंकू दौड़कर आया और उन्हें सँभाला।

भैरव ने मुझे धक्का दिया और मैं गिरा। पर मैं उठा। वो भागने लगा — स्कूल के पीछे की तरफ़, जहाँ से हम आए थे। पर वहाँ मीरा खड़ी थी, हाथ में एक ईंट लिए हुए।

"एक कदम और बढ़ाया," उसने कहा, "तो ये तेरे माथे पर होगी। और मैं माफ़ी नहीं माँगूँगी।"

भैरव रुका। और उसी पल सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया।

मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो टिंकू के सहारे खड़ी थीं, और उनके होंठ काँप रहे थे।

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।

वो मेरी तरफ़ बढ़ीं और उन्होंने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया।

"तू आ गया," उन्होंने फुसफुसाया। "मैं जानती थी तू आएगा।"

"और अब," इंस्पेक्टर शर्मा ने कहा, और उन्होंने भैरव की कलाई पर हथकड़ी लगाई, "ये साहब हमारे साथ चलेंगे।"

भैरव मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में वो सब कुछ था जो अब खत्म हो रहा था — बीस साल का ज़हर, उनतीस मौतें, एक टूटा हुआ बचपन, और एक बेटा जिसने अपने पिता को "मत पीना" लिखकर पीली शीशी भेजी थी।

"तू जीत गया, वीर सिंह," उसने धीरे से कहा। "पर याद रख — मैंने तेरे बाप को मारा, और वो मरे हुए भी मेरे साथ हैं। हर पहलवान जो मेरे पानी से गया, वो मेरे साथ है। तू उन्हें वापस नहीं ला सकता।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। और मैंने कहा:

"मैं उन्हें वापस नहीं लाना चाहता, भैरव। मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि जो बचे हैं, वो तेरे बाद ज़िंदा रहें।"

और सिपाही उसे ले गए।

मैं ज़मीन पर बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मेरी साँस फूल रही थी, और मेरे कानों में एक अजीब सी आवाज़ थी — जैसे कोई दूर से रो रहा हो।

टिंकू मेरे पास आया और बैठ गया।

"भैया," उसने कहा, "तेरा माथा फूटा है।"

मैंने अपनी उँगली माथे पर फेरी। खून था।

"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "ये खून भैरव का नहीं है। ये मेरा है। और मेरा खून मेरे साथ है।"

मीरा ने मेरे सामने घुटने टेके और उसने अपने बैग से एक पट्टी निकाली। उसके हाथ काँप रहे थे जब उसने मेरे माथे पर पट्टी बाँधी।

"तू पागल है," उसने धीरे से कहा। "तू उसके सामने अकेला खड़ा था।"

"तू भी तो ईंट लेकर खड़ी थी," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भर आईं।

"हाँ," उसने कहा। "क्योंकि तू अकेला नहीं है।"

और फिर गोलू दौड़कर आया। उसके पीछे हरनाम था, और हरनाम के पीछे… एक सिपाही, जो एक बच्चे को गोद में लिए आ रहा था।

करण।

वो बेहोश था। उसका चेहरा पीला था, और उसके होंठ सूखे थे, और उसकी साँसें बहुत धीमी थीं।

"ये इसे स्कूल के पीछे पुरानी बस में मिला," सिपाही ने कहा। "अभी ज़िंदा है। पर बहुत कमज़ोर है।"

गोलू करण के पास गया और उसने उसका हाथ पकड़ा।

"करण," उसने कहा, "मैं आ गया। मैंने कहा था ना, मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा।"

करण की आँखें खुलीं। वो गोलू की तरफ़ देखने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी आँखें टिक नहीं रही थीं।

"गोलू," उसने फुसफुसाया। "तू… तू आ गया।"

"हाँ," गोलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में आँसू थे। "और अब तू ठीक हो जाएगा। मेरे पापा कह रहे हैं कि हम तुझे डॉक्टर के पास ले जाएँगे।"

करण ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो हर बच्चा पूछता है जब उसका सब कुछ टूट चुका होता है।

"मेरे पापा," उसने कहा। "वो…"

मैं उसके पास गया और उसके सामने बैठ गया।

"वो पकड़े गए," मैंने कहा। "और अब वो किसी को नहीं मार सकते।"

करण ने आँखें बंद कर लीं। और उसकी आँखों से एक आँसू निकला।

"मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की," उसने फुसफुसाया। "मैंने उनसे कहा कि ये ग़लत है। पर वो नहीं सुने।"

"तूने रोकने की कोशिश की," मैंने कहा। "और ये बहुत बड़ी बात है। तू अपने पापा के खिलाफ़ खड़ा हुआ। ये हर बच्चा नहीं कर सकता।"

करण ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला।

"अब मैं क्या करूँगा?" उसने पूछा। "मेरे पास कोई नहीं है।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ छोटा था, ठंडा, काँपता हुआ।

"तू मेरे पास है," मैंने कहा। "और तेरे पास गोलू है। और मेरे पास एक अखाड़ा है जहाँ तू रह सकता है। और एक माँ है जो तुझे खाना खिलाएगी। और एक टिंकू है जो तुझे मिठाई खिलाएगा — चाहे वो मीठी हो या नमकीन।"

टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर फिर रुक गया और उसकी आँखें भर आईं।

करण मुस्कुराया। बहुत धीमी, कमज़ोर मुस्कान, पर मुस्कान थी।

"मुझे मिठाई पसंद है," उसने कहा।

"तो फिर ठीक है," मैंने कहा। "अब तू आराम कर।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरी तरफ़ देखा और उन्होंने अपना सिर हिलाया।

"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तुमने आज बहुत बड़ा काम किया। मैं तुम्हें ये नहीं कहूँगा कि तुमने कानून अपने हाथ में लिया। पर मैं ये ज़रूर कहूँगा कि अगर तुम न होते, तो ये आदमी आज भी ज़िंदा होता और किसी और बच्चे को ज़हर पिला रहा होता।"

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