Spirit of a Fighter963 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 963

7 min read November 5, 2026

हरनाम उसे अपनी छाती से लगाए बैठ गया, धूल में। वो कुछ नहीं बोल रहा था। बस अपने बेटे का सिर सहला रहा था, और उसकी आँखों से पानी गिर रहा था, और उसके होंठ काँप रहे थे।

"पर करण…" गोलू ने कहा, और वो हरनाम की छाती से हटा और मेरी तरफ़ देखा, और मुझे नहीं पता वो मुझे कैसे पहचानता था, पर उसने मेरी कमीज़ पकड़ी। "करण उसके पास है। वो बीमार है। उसका सिर फट रहा है। वो रो रहा था और बोल रहा था कि उसे दवा चाहिए और वो लंगड़ा उसे दवा देने के नाम पर और पिला रहा था।"

मीरा आगे आई और गोलू के सामने घुटनों के बल बैठी।

"गोलू," उसने कहा, और उसकी आवाज़ नरम थी, बहुत नरम, "तू भागकर आया। तेरे पीछे कोई आ रहा है?"

गोलू ने सिर हिलाया। "मैं दीवार के पीछे से आया। रास्ता जानता था — करण ने बताया था। वो बोला था, 'तू भाग, और किसी को बता, मैं नहीं भाग सकता, मेरी टाँगें नहीं चल रहीं।'" और फिर उसने गोलू को कुछ दिया था?

गोलू ने अपनी मुट्ठी खोली।

उसकी हथेली में एक छोटी सी पीली शीशी थी — आधी भरी हुई — और उसके ढक्कन पर काली मिट्टी लगी थी।

"करण ने दी," गोलू ने कहा। "बोला — 'ये पापा को देना। बोलना — बेटा, अब मैं वो नहीं पीऊँगा।'"

मैंने वो शीशी उसकी हथेली से ली। ढक्कन खोला। और मेरी नाक में जो गंध आई, वो कोई नई नहीं थी। वही कड़वाहट। वही धातु जैसा स्वाद हवा में। पर उसके नीचे कुछ और भी था — बादाम का तेल, और कपूर, और… और मिट्टी। अखाड़े की लाल मिट्टी।

मैंने शीशी को अपनी आँखों के सामने उठाया। उसके काँच पर, बाहर की तरफ़, किसी ने नाखून से कुछ खुरचा था। छोटे अक्षर। बच्चे के अक्षर।

"मत पीना।"

मैंने शीशी मीरा को दी। उसने देखा, और उसकी आँखें भर आईं, और उसने शीशी अपनी मुट्ठी में भर ली।

"भैरव का बेटा," मीरा ने धीरे से कहा, "अपने बाप का ज़हर पी रहा है, और हमें चेतावनी भेज रहा है।"

"और वो कहाँ है?" मैंने गोलू से पूछा।

गोलू ने पीछे की तरफ़ उँगली उठाई, उस दीवार की तरफ़ जिसके पीछे स्कूल का पीपल वाला मैदान था।

"वहाँ," उसने कहा। "ट्यूबवेल के नीचे। वहाँ एक कमरा है, ज़मीन के नीचे। सीढ़ियाँ हैं। और वहाँ उसने दो लालटेन जलाई हैं। और वहाँ…" वो रुका, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "वहाँ एक बूढ़ी औरत भी है। बँधी हुई। वो बोल नहीं पाती। वो बस कराहती है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"गंगा देवी," मैंने कहा।

और फिर हवा बदली। पीछे से, दीवार के उस पार से, एक आवाज़ आई — भैरव की आवाज़, मीठी, जैसे गुड़ की चाशनी, और उसमें वो सब कुछ था जो मुझे पहले से पता था, पर सुनकर भी रोंगटे खड़े हो गए।

"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हँसी थी, "तेरा बेटा — मेरा मतलब, तेरे गाँव का बेटा — मेरे पास है। और मैं उसे वो पिला रहा हूँ जो मैंने तेरे बाप को पिलाया था। सोच, दोनों बाप-बेटे, एक ही पानी से।"

मैंने मुट्ठी कसी।

"पर तू एक बात भूल रहा है, वीर सिंह," भैरव ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में मिठास नहीं थी, सिर्फ़ ठंडक थी। "तेरे पास वक़्त नहीं है। क्योंकि करण अब वो पी रहा है जो मैंने उसे दिया है। और अगर तू सीढ़ियों से नीचे आया, तो मैं उसे आख़िरी घूँट खुद अपने हाथ से पिला दूँगा।"

हवा फिर बदली। और फिर सिर्फ़ पीपल के पत्तों की आवाज़ बची।

टिंकू मेरे पास आया। उसका चेहरा पीला था, पर उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने उसमें कभी नहीं देखी थी।

"भैया," उसने कहा, "मैं जानता हूँ तू क्या सोच रहा है। तू सीधा सीढ़ियों से नहीं जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि वो तेरा इंतज़ार कर रहा है," टिंकू ने कहा। "वो चाहता है कि तू सीधा आए। वो चाहता है कि तू उसके सामने खड़ा हो, और फिर वो करण को तेरे सामने मार दे, और कहे — 'देख, ये तेरे आने से हुआ।'"

मैं चुप रहा। क्योंकि टिंकू सही कह रहा था।

मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी और धीरे से कहा, "गोलू ने कहा कि वो दीवार के पीछे से आया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो चमक थी जो तब आती है जब कोई रास्ता दिख जाए।

"तो एक रास्ता है," उसने कहा। "और सीढ़ियाँ दूसरा।"

उसने शीशी उठाई, वो पीली शीशी जिस पर बच्चे के अक्षरों में लिखा था — "मत पीना"।

"हमें करण को बचाना है," उसने कहा, "और करण को बचाने का रास्ता उसी के हाथ से आया है।"

हरनाम उठा। उसने गोलू का हाथ पकड़ा, और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अब सिर्फ़ एक चीज़ थी — वो चीज़ जो आदमी को खड़ा कर देती है।

"वीर," उसने कहा, "तू बता। मैं तेरे साथ हूँ। इस बार मैं भागूँगा नहीं।"

मैंने मुट्ठी खोली। उसमें वो चाँदी का टुकड़ा था, और मेरे गले में पिता का ताबीज़, और मेरी जेब में गुड़िया का काग़ज़।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात पक्की। अंदर जाकर कोई भी अकेला नहीं लड़ेगा। हम एक साथ जाएँगे, और एक साथ निकलेंगे। और अगर कोई फँसे, तो बाकी लोग रुकेंगे नहीं। पीछे हटेंगे नहीं।"

मीरा ने सिर हिलाया।

"और भैरव?" टिंकू ने पूछा।

मैंने पीपल की तरफ़ देखा, जिसकी जड़ें उस ट्यूबवेल को जकड़े हुए थीं, और जिसके नीचे ज़मीन के अंदर एक आदमी अपने ही बेटे को ज़हर पिला रहा था।

"भैरव को मैं देख लूँगा," मैंने कहा। "पर पहले करण।"

और हम चले। गोलू आगे-आगे, अपने छोटे नंगे पैरों से रास्ता दिखाते हुए, और हम सब उसके पीछे, उस दीवार की तरफ़ जिसके पीछे से अभी-अभी एक बच्चे की आवाज़ ने पूरे अंधेरे को चीर दिया था।

॥

गोलू के नंगे पैर उस पुरानी दीवार के पास रुके जहाँ ईंटें काई खाए खड़ी थीं। उसने उँगली से एक ईंट की तरफ़ इशारा किया और फिर अपना मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ होंठ काँपे। हरनाम ने उसे सीने से लगा लिया।

"बेटा, धीरे बोल। कोई जल्दी नहीं है।"

गोलू ने एक लंबी साँस खींची। उसकी साँस में वो बदबू थी जो बंद कमरे में दिन बिताने के बाद आती है — पसीना, धूल, और उल्टी की हल्की बू।

"लंगड़ा हमें स्कूल के पीछे ले गया," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "एक पुरानी बस थी, पीली, जिसके शीशे टूटे थे। उसने करण को पहले चढ़ाया, फिर मुझे। मैंने रोना चाहा, पर उसने कहा अगर आवाज़ निकाली तो करण को वो पानी पिला देगा जो वो अपनी जेब में रखता है।"

मेरी छाती में कुछ जम गया। पीली शीशी। वो शीशी जो मेरे पिता को मार गई, जो लुट्टन को खोखला कर गई, जो हर उस नौजवान की उम्र खा गई जिसने भैरव की धोती पकड़ी थी।

"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी — धीमी, दबी हुई।

"बस चली," गोलू ने कहा। "बहुत देर तक चली। रास्ते में करण को बुखार आ गया। वो काँपने लगा, मैंने उसे अपनी कमीज़ ओढ़ा दी, पर उसके दाँत बज रहे थे। मैंने लंगड़े से कहा उसे पानी दे, तो वो हँसा।" गोलू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में तब आता है जब वो पहली बार देखते हैं कि बड़े लोग कितने बुरे हो सकते हैं। "फिर उसने अपनी जेब से वही शीशी निकाली और करण के मुँह में डाल दी।"

टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"उसके बाद?" मीरा ने पूछा। वो गोलू के सामने घुटनों के बल बैठ गई थी, और उसके हाथ में कपड़ा था जिसे वो गोलू के माथे पर फेर रही थी।

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