Spirit of a Fighter – Chapter 962
कमरे में सन्नाटा छा गया। और उस सन्नाटे में, बहुत दूर से, वो घंटी फिर बजी — आधी घंटी, फिर रुक गई।
मीरा ने सबसे पहले अपनी आवाज़ वापस पाई।
"मैडम," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब वो लड़की वाली नहीं थी, वो वैद्य वाली थी — साफ़, तेज़, और बिना किसी नरमी के, "आपके पास रजिस्टर है। हर बच्चे का नाम, उसका घर, कौन ले गया, कब ले गया। मुझे वो दिन चाहिए। दो दिन पहले का पूरा पन्ना।"
वार्डन ने कुछ कहना चाहा, पर मीरा ने हाथ उठाया।
"मैडम, आपके हाथ से एक बच्चा गया है। अब आप मदद करेंगी या रजिस्टर में लिखेंगी कि 'मैंने बिना पूछे बच्चा दे दिया'?"
वार्डन की आँखें भर आईं। उसने रजिस्टर खोला, पन्ने पलटे, और उसे मेज़ पर रख दिया, उँगली एक लाइन पर रखकर।
मीरा झुकी। मैं उसके पीछे खड़ा था, और मैंने उसकी आँखों को उस पन्ने पर चलते देखा — ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर।
और फिर वो रुकी।
उसने उँगली एक लाइन पर रखी और उसे दो बार सहलाया, जैसे कोई अंधा अक्षरों को पहचान रहा हो।
"भैरव का बेटा…" उसने धीरे से कहा, इतने धीरे से कि मुझे लगा वो खुद से बोल रही है। "करण… और वो गोलू के साथ ही पढ़ता था।"
"क्या?" मैंने कहा।
मीरा ने सिर उठाया। उसके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले भी देखा था — जब उसे तहखाने में दीवार पर मिटा हुआ नाम मिला था। वो भाव जो कहता है कि एक टुकड़ा जुड़ गया, पर उससे दस और सवाल पैदा हो गए।
"देख," उसने कहा, और मुझे रजिस्टर की तरफ़ खींचा। "इसी पन्ने पर, गोलू की लाइन के ठीक नीचे, एक और लाइन है। लिखा है — 'करण, कक्षा पाँच, विक्रम का बेटा।' और ये देख —" उसकी उँगली उसी तारीख़ पर गई, "— ये भी उसी दिन गया है। उसी घंटे। और जाने वाले का नाम लिखा है — 'चाचा'।"
हरनाम धीरे-धीरे आगे आया। उसने रजिस्टर देखा, और उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"तो मेरा बेटा…" उसने फिर कहा, और उसकी आवाज़ में एक बच्चे जैसी बेबसी थी, "तो मेरा बेटा उसके बेटे का दोस्त था?"
वार्डन ने धीरे से सिर हिलाया।
"दोनों एक ही बेंच पर बैठते थे," उसने कहा। "करण बहुत चुप रहता था। गोलू उसे हँसाता था। एक बार मैंने देखा — गोलू ने अपना आधा पराठा करण को दे दिया था, और करण ने उसे ऐसे छुपाया जैसे कोई खज़ाना छुपा रहा हो।"
हरनाम ने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लिया। और वो रोया, बिना आवाज़ के, कंधे हिलते हुए, एक मज़दूर जो अपने बेटे के लिए पूरी ज़िंदगी ईंटें ढोता रहा और एक झूठी चिट्ठी उससे दूर ले गई।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उसके होंठ कसे हुए थे।
"रुको," मीरा ने कहा। "कुछ जम नहीं रहा। अगर भैरव अपने ही बेटे को यहाँ से ले गया — तो उसे क्यों ले गया? वो तो उसका बाप है। बाप अपने बेटे को स्कूल से क्यों चुपके से उठाएगा?"
"क्योंकि," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी, "वो अपने बेटे को बचा रहा है।"
सब मेरी तरफ़ मुड़े।
"भैरव अब जेल में नहीं है," मैंने कहा। "वो भाग गया है। और उसके पीछे पूरा गाँव है, पुलिस है, पंचायत है। वो जानता है कि अब वो पकड़ा जाएगा। तो वो अपने बेटे को कहीं छुपा रहा है — अपने साथ, जहाँ कोई न पहुँचे।"
"पर गोलू?" हरनाम ने सिर उठाया, और उसकी आँखों में पागलपन था। "मेरा बेटा क्यों? वो मेरे बेटे को क्यों ले गया?"
मीरा ने रजिस्टर पर हाथ रखा।
"क्योंकि," उसने कहा, "तू गवाह है। तू भैरव का हिसाब रखता था। तेरे पास काग़ज़ हैं। भैरव जानता है कि अगर तू बोलेगा, तो सब खत्म। इसलिए उसने तेरे बेटे को अपने बेटे के साथ रख लिया — एक तीर से दो शिकार। बेटा साथ है, और तू चुप।"
हरनाम ने अपना मुँह खोला, पर कुछ नहीं बोला। उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो पिता की आँखों में तब आती है जब उसे पता चले कि उसकी वजह से उसका बच्चा फँसा है।
"मैंने…" वो बोला, "मैंने काग़ज़ दिए… मैंने सब दे दिया…"
"इसलिए उसे जल्दी है," मीरा ने कहा। "वो जानता है कि अब देर हो रही है। इसलिए उसने बच्चों को उठा लिया और कहीं भागने की तैयारी कर रहा है। और हमारे पास वक़्त है — शायद सुबह तक। शायद उतना भी नहीं।"
मैंने वार्डन की तरफ़ देखा।
"मैडम," मैंने कहा, "आपने कहा कि वो हर महीने आता था। वो बाहर मिलता था या अंदर आता था? कहीं ले जाता था? कहीं बैठता था?"
वार्डन ने सोचा। उसकी आँखें ऊपर गईं, जैसे वो पुराने दिनों को छत पर ढूँढ रही हो।
"बाहर," उसने कहा। "पीछे वाले मैदान में। वहाँ एक पुराना पीपल है, और उसके नीचे एक टूटा हुआ ट्यूबवेल है। मैंने एक बार देखा था — वो गोलू को वहाँ ले गया था, और उसने उसे अपनी जेब से कुछ निकालकर दिया था।"
"क्या दिया था?" मीरा ने पूछा।
"मुझे दूर से लगा… लड्डू।" वार्डन ने कहा। "पर उसकी गंध अजीब थी। जब मैं वहाँ से गुज़री, तो हवा में कुछ कड़वा था। मैंने सोचा, शायद कोई दवा हो।"
मेरी छाती में ठंडी सुई चुभी।
"कड़वा," मैंने कहा। "कैसा कड़वा? जैसे कोई कुनकुना पानी हो जिसे पीने के बाद गले में स्वाद रह जाता है?"
वार्डन ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में डर आया।
"तू कैसे जानता है?" उसने पूछा।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ तेज़ थी।
"वो लड्डू नहीं था," मीरा ने धीरे से कहा, "वो शीशी थी। भैरव उसे बच्चे को पिला रहा था। अपने बच्चे को।"
कमरे में हवा भारी हो गई।
"अपने ही बेटे को?" टिंकू ने कहा। वो अब तक चुप खड़ा था, और अब उसकी आवाज़ काँप रही थी। "वो अपने ही बच्चे को वो ज़हर पिला रहा है?"
"नहीं," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ कड़ी कर ली, क्योंकि मुझे समझ आ गया था। "वो उसे ज़हर नहीं पिला रहा था। वो उसे ताकत दे रहा था। वो चाहता है कि उसका बेटा भी पहलवान बने — जैसे वो खुद था। वो चाहता है कि रणवीर सिंह का बेटा नहीं, भैरव का बेटा मिट्टी में खड़ा हो।"
हरनाम ने धीरे से मेरी तरफ़ देखा।
"पर वो पानी…" उसने कहा, "वो पानी तो आदमी को खोखला कर देता है। मैंने देखा है। मैंने लुट्टन को देखा है। मैंने उन उनतीस लोगों की सूची बनाई है।"
"और उसका बेटा?" मीरा ने पूछा।
हरनाम चुप हो गया। और उस चुप्पी में सबसे बड़ा सवाल था, और जवाब उसी कमरे में खड़ा था, किसी के मुँह से निकलने के इंतज़ार में।
तभी बाहर, पीछे वाले मैदान से, एक चीख़ आई।
नहीं, चीख़ नहीं। किसी के भागते पैरों की आवाज़ — नंगे पैर, पत्थरों पर, और साँस जो बेतरह खींची जा रही हो।
हम सब दौड़े। बरामदे से नीचे, सीढ़ियों से, और खुले मैदान में।
सामने, चारदीवारी के पास, एक बच्चा भाग रहा था। दुबला, छोटा, कपड़े फटे — कमीज़ का एक आस्तीन गायब, पैर नंगे, और उसकी टाँगों पर खरोंचें जिनसे अभी खून बह रहा था। वो भाग रहा था जैसे कोई उसके पीछे हो, पर उसके पीछे सिर्फ़ अंधेरा था।
हरनाम ने उसे देखा और उसकी साँस रुक गई।
"गोलू," वो फुसफुसाया।
बच्चा कमज़ोर था। वो लड़खड़ाया। मैं दौड़ा, और उसके गिरने से पहले उसे पकड़ा। मेरी बाँहों में वो छोटा शरीर था जो काँप रहा था, और उसके पैरों से धूल उड़ रही थी, और उसकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ में धँस गईं।
"पापा," उसने कहा, और फिर उसकी नज़र हरनाम पर पड़ी, और उसका चेहरा ऐसे टूटा जैसे कोई बाँध टूट गया हो।
वो मेरी बाँहों से निकला और भागकर हरनाम से लिपट गया।
"पापा! पापा!" वो रो रहा था, और रोते हुए बोल रहा था, और बोलते हुए रो रहा था। "वो लंगड़ा आदमी मुझे ले जा रहा था — बोला था माँ के पास ले जा रहा है — पर माँ तो घर पर है — मैंने कहा मुझे माँ के पास ले चलो तो वो हँसा — और फिर उसने मुझे एक कमरे में बंद कर दिया जिसमें कोई खिड़की नहीं थी — और करण भी वहाँ था —"
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