Spirit of a Fighter – Chapter 961
मैंने दीवार के उस टूटे हिस्से की तरफ़ देखा, जहाँ गुड़िया का धागा फँसा था। मेरी मुट्ठी में चाँदी का टुकड़ा था, और मेरे गले में पिता का ताबीज़, और मेरी जेब में वो काग़ज़ जिस पर गुड़िया ने लिखा था — "भैया, मत आना।"
और मैंने सोचा — कि गुड़िया ने ये लिखा था। पर वो यहाँ आई कैसे?
मेरी छाती में एक सवाल उभरा, ठंडा और भारी — क्या गुड़िया यहाँ खुद आई थी? या उसे यहाँ लाया गया था?
और अगर वो यहाँ है, तो वो उस खिड़की में क्यों नहीं दिखी?
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी आँखों में वही सवाल देखा।
"अंदर चल," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो अब मुझे जानी-पहचानी लगती है। "सवाल बाद में। पहले वो।"
मैंने दीवार की तरफ़ कदम बढ़ाया। और उसी पल, अंदर से, बहुत दूर से, एक आवाज़ आई।
घंटी की आवाज़। स्कूल की बड़ी घंटी।
पर वो घंटी बज रही थी — दोपहर में नहीं, शाम को, जब स्कूल बंद होता है।
और उसके साथ, बच्चों की चीख़ नहीं, बच्चों की हँसी आई। बहुत सारे बच्चे, एक साथ हँस रहे थे।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।
"भैया," वो फुसफुसाया, "बच्चे हँस क्यों रहे हैं?"
मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने दीवार के उस टूटे हिस्से की तरफ़ देखा, जहाँ से अंदर जाने का रास्ता था, और मेरे हाथ पसीने से भर गए।
"क्योंकि," मैंने धीरे से कहा, "वो उन्हें खुश कर रहा है। और जब कोई बच्चों को खुश करता है, तो बच्चे सवाल नहीं पूछते।"
मैंने अपना पैर दीवार के उस टूटे हिस्से पर रखा, और मैंने अपने अंदर वो आवाज़ सुनी जो माँ ने दी थी — "तू मारने वाला नहीं, बचाने वाला है।"
और फिर मैंने दीवार पकड़ी, और ऊपर खींच लिया।
॥
दीवार के ऊपर चढ़ते वक़्त मेरे हाथ की सारी ताकत उस पत्थर में चली गई जिसे मैंने पकड़ा था। पत्थर हिला, मिट्टी मेरी आँखों में गिरी, और मैं लुढ़कता हुआ अंदर की तरफ़ गिरा।
गिरा तो घुटनों के बल, और मेरी हथेली पर कुछ चुभा। काँच। टूटा हुआ काँच, जिस पर धूल की मोटी परत थी।
मैं उठा। और फिर मेरी साँस रुक गई।
ये स्कूल का पिछला हिस्सा था। चारदीवारी के अंदर। दाईं तरफ़ एक लंबा बरामदा, जिसके खंभों पर सफ़ेदी उतर रही थी। बाईं तरफ़ रसोई की खिड़कियाँ, जिनसे अभी भी वही गंध आ रही थी जो हर स्कूल में होती है — उबली दाल, और उसके ऊपर हल्की फिनाइल की बू। बच्चों की हँसी अब भी आ रही थी, पर कहीं दूर से, जैसे कोई कमरा हो जिसका दरवाज़ा बंद है और अंदर बच्चे खेल रहे हों।
दीवार के उस पार से आवाज़ आई — "भैया!"
टिंकू। मैंने हाथ बढ़ाया और उसे खींचा। वो गिरा, उठा, और उसकी टोपी धूल में लुढ़क गई।
"मेरी टोपी," वो बोला, और उसे उठाने झुका।
"टोपी बाद में," मैंने कहा। "पहले वो।"
मीरा आख़िरी में आई। वो चढ़ी नहीं, उसने एक चीज़ निकाली — कमर पर बँधी रस्सी — फेंकी, और मैंने पकड़ी। वो हल्की उतरी, जैसे उसे दीवारों से उतरना आता हो। गाँव की लड़कियाँ दीवार नहीं चढ़तीं, पर ये शहर से आई थी। और शहर में लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं।
पीछे से हरनाम की साँसें आ रही थीं, जैसे कोई बूढ़ा बैल सीढ़ी चढ़ रहा हो। वो चढ़ा, दीवार पर लेटा, फिर लुढ़ककर नीचे आया। उसका माथा अब भी खून से सना था, और उसकी आँखें किसी और ही दुनिया में थीं।
वो उठा और सीधा चल पड़ा।
"हरनाम भाई," मैंने उसकी बाँह पकड़ी, "रुक। पहले पता करें कि गोलू कहाँ है। अंधे होकर भागेगा तो—"
"मेरा बेटा यहाँ है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "वो मुझे बता रहा है। वो मुझे खींच रहा है।"
मैंने उसकी कलाई छोड़ दी। कभी-कभी बाप की आवाज़ से तर्क नहीं जीतता। मुझे ये पता था। मेरी माँ भी ऐसे ही मुझे खींचती थी, बिना हाथ लगाए।
बरामदे के आख़िर में एक कमरा था जिसके दरवाज़े पर पीतल की तख़्ती लगी थी — "कार्यालय"। मैंने दरवाज़ा खोला।
अंदर एक बूढ़ी औरत बैठी थी, मेज़ के पीछे, एक बड़ी कुर्सी पर जो उसके लिए बड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, चश्मा जिसका एक काँच टूटा हुआ था और उस पर काग़ज़ का टुकड़ा चिपका था, हाथ में मोटी लाल जिल्द वाली किताब। उसने सिर उठाया और देखा — हम चार, धूल से भरे, खून से सने, और एक आदमी जो रो रहा था।
उसने किताब बंद की, बहुत धीरे से, जैसे कोई मंदिर में घंटी रख रहा हो।
"तुम लोग," उसने कहा, "कौन हो?"
"मैडम," मीरा आगे आई, "गोलू कहाँ है? गोलू — जिसे कल कोई ले गया।"
बूढ़ी औरत का चेहरा नहीं बदला। पर उसकी उँगलियाँ किताब पर जम गईं।
"तुम गोलू के कौन हो?" उसने पूछा।
हरनाम आगे आया। उसने दोनों हाथ जोड़े, और मैंने देखा कि उसके हाथ काँप रहे हैं, और उसकी आँखों से पानी गिर रहा है, और वो कुछ बोल नहीं पा रहा।
"ये उसका बाप है," मैंने कहा।
बूढ़ी औरत ने हरनाम को देखा। फिर उसने चश्मा उतारा, आँखें मलीं, और दोबारा देखा।
"तू वही है," उसने धीरे से कहा, "जो हर महीने आता था? जो गोलू को खीर खिलाता था और बाहर गेट पर खड़ा रह जाता था, अंदर नहीं आता था?"
हरनाम ने सिर हिलाया। "मैं… मैं मज़दूर हूँ, मैडम। मेरे कपड़े… बच्चों के बीच जाता तो उसे शर्म आती। मैं गेट पर ही खड़ा रह जाता था।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा उतरा। मुझे अपनी माँ याद आई — कैसे वो स्कूल के गेट पर खड़ी रहती थी जब गुड़िया की फीस देने की बारी आती, और अंदर नहीं जाती थी, क्योंकि उसकी साड़ी में पैबंद था।
बूढ़ी औरत ने कुर्सी पीछे सरकाई और उठी। उसकी कमर टेढ़ी थी।
"मैं वार्डन हूँ," उसने कहा। "कमला देवी। और बेटा, तेरा बेटा यहाँ से गया है — दो दिन पहले। और वो गया है… उसी के साथ जो उसे चाचा कहलवाता था।"
हरनाम की टाँगें काँपी।
"चाचा?" उसने कहा। "कौन चाचा? मेरे बेटे का कोई चाचा नहीं है।"
कमला देवी ने मेज़ से एक रजिस्टर उठाया। मोटा, भूरे काग़ज़ वाला। उसने पन्ने पलटे, और उसकी उँगली एक लाइन पर रुकी।
"हर महीने की पहली तारीख़ को एक आदमी आता था। बड़ा, भारी, बड़ी मूँछें। गोलू को बाहर ले जाता, मिठाई खिलाता, और कहता — 'मैं इसका चाचा हूँ, इसके बाप का सौतेला भाई।'" उसने हरनाम की तरफ़ देखा। "मैंने तुझसे कभी पूछा नहीं। मेरी गलती। मैंने सोचा, माँ-बाप मज़दूरी करते हैं, कोई रिश्तेदार शहर से आता होगा, बच्चे को खुश करता होगा।"
"और दो दिन पहले?" मीरा ने पूछा।
"दो दिन पहले एक लंगड़ा आदमी आया। घसीटता हुआ पैर। कहने लगा कि गोलू की माँ बीमार है, बहुत बुरी हालत में है, उसे आख़िरी बार बच्चे को देखना है।" वार्डन ने रजिस्टर के बीच से एक तह किया हुआ काग़ज़ निकाला। "और उसके पास ये था। बाप की लिखाई। मैंने पढ़ा तो साफ़ लिखा था — 'गोलू को भेज दीजिए, उसकी माँ का हाल बुरा है।' मैंने बच्चा दे दिया। ये मेरी नादानी थी।"
हरनाम ने काग़ज़ लिया। उसने उसे देखा। फिर उसके हाथ काँपने लगे, और काग़ज़ उसके हाथ से गिर गया।
"ये मेरी लिखाई नहीं है!" वो चीखा। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी जानवर के पैर के नीचे से बच्चा निकल गया हो। "मैंने ये नहीं लिखा! मैंने कभी नहीं लिखा! देखो — मैं तो ठीक से अक्षर भी नहीं बनाता! मैंने स्कूल में चार कक्षा पढ़ी है! ये मेरी लिखाई जैसी भी नहीं है!"
वार्डन कमला देवी ने उसकी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो किसी के चेहरे पर तब आता है जब उसे पता चले कि उसके हाथों से कोई चीज़ टूट गई है और वो कभी जुड़ नहीं सकती।
"तो मैंने…" उसने धीरे से कहा, "मैंने बच्चा उसके हाथ में दे दिया।"
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