Spirit of a Fighter – Chapter 959
"ठीक नहीं है," हरनाम ने कहा। उसने अपना हाथ खोला।
उसकी हथेली में एक घड़ी थी। छोटी, प्लास्टिक की, बच्चों वाली। उसका पट्टा टूटा हुआ था, और उसके काँच पर कीचड़ सूखा था।
"ये गोलू की है," हरनाम ने कहा। उसकी आवाज़ टूट गई। "मैंने इसे स्कूल के बाहर कीचड़ में पाया। गेट के पास, वहाँ जहाँ पानी भरता है।"
उसने घड़ी को उलटा किया। पीछे, पेंसिल से लिखा था — "गोलू, कक्षा छह।"
"इसका मतलब वो वहाँ से भागने की कोशिश कर चुका है," हरनाम ने कहा। "और वो गिरा। और उसे पकड़ लिया गया।"
वो घड़ी को अपनी छाती से लगाकर रोने लगा। मैंने उसे उठाया।
"देख हरनाम," मैंने कहा। "घड़ी टूटी है, पर वो टूटी है। उसका मतलब है वो ज़िंदा है। मरे हुए बच्चे की घड़ी नहीं टूटती।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तू सही कहता है," वो धीरे से बोला। "मैंने सोचा नहीं था।"
माँ ने आगे बढ़कर हरनाम का सिर सहलाया। हरनाम पहली बार मेरी माँ को इस तरह देख रहा था। उसकी आँखों में शर्म थी।
"तेरा बच्चा लौटेगा," माँ ने कहा। "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है। और जिसके दिल में अपने बच्चे के लिए ये जलन हो, उसकी दुआ अधूरी नहीं जाती।"
हरनाम ने कुछ कहना चाहा, पर उससे सिर्फ़ एक आवाज़ निकली।
उसी वक़्त सुक्खी बुआ आगे आईं, डंडा घसीटती हुई।
"अरे सुनो," वो बोलीं, "मैंने तो सुना है कि उस स्कूल में हर महीने एक आदमी आता है, बड़ी मूँछों वाला, और सबको मिठाई बाँटता है। बच्चे उसे चाचा बुलाते हैं।"
मैं जम गया।
"बड़ी मूँछों वाला?" मीरा ने पीछे से कहा। वो गाड़ी से उतर रही थी, फ़ाइल हाथ में।
"हाँ," सुक्खी बुआ ने कहा। "तेल लगी मूँछें। और अँगूठी में पत्थर। मैंने तो सुना है कि वो वहीं का सरपंच है।"
"वो भैरव है," मीरा ने कहा। "भैरव स्कूल में खुद जाता है।"
हवा एक पल रुकी। मैंने पीछे देखा — वो मशालें अब भी दूर थीं, पर अब वो आगे बढ़ रही थीं, धीरे-धीरे।
"गाँव वालों," मैंने पलटकर कहा। "मुझे तीन घंटे चाहिए। बस तीन घंटे। उस स्कूल में एक बच्चा बंद है, और भैरव उसे मारने वाला है।"
बंसी नाई ने अपनी छुरी उठाई।
"जा," वो बोला। "हम इन्हें यहीं रोकेंगे।"
"ये बैलगाड़ी ले जा," चिमन भाई ने कहा। "रास्ता छोटा है, पगडंडी से सीधे शहर पहुँच जाएगा।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और कुछ देर देखा। फिर उन्होंने अपने गले से एक छोटा ताबीज़ निकाला और मेरे गले में डाल दिया।
"ये तेरे पिता का था, भवानी का," उन्होंने कहा। "मैंने इसे बीस साल छुपाया। अब ये तेरा है।"
मैंने ताबीज़ को छुआ। उसमें मिट्टी की गंध थी, और एक बहुत हल्की, बहुत पुरानी, चंदन की गंध।
"माँ, आप—"
"मैं यहाँ रुकूँगी," उन्होंने कहा। "और तू जा। पर सुन — जो भी हो, तू भवानी का बेटा है। तू मारने वाला नहीं, बचाने वाला है। ये याद रख।"
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरा सिर उठाया और मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगाया।
फिर मैं गाड़ी पर चढ़ा।
रास्ता छोटा था, पर कच्चा। बैलगाड़ी के पहिये पत्थरों पर उछलते थे और मेरी हड्डियाँ टकराती थीं। चिमन भाई बैल के पास बैठे थे और उन्होंने रस्सी अपने हाथ में ले रखी थी।
टिंकू मेरे बगल में बैठा था। वो अपनी टोपी बार-बार पलट रहा था, जैसे उसके अंदर कुछ घूम रहा हो।
"बोल," मैंने कहा। "जो बोलना है, बोल।"
टिंकू ने टोपी पहनी, फिर उतारी।
"वो ताबीज़," वो बोला। "माँ ने तुझे दिया। मुझे नहीं।"
मेरा दिल धसका।
"टिंकू—"
"मुझे पता है क्यों," उसने जल्दी से कहा, और मुस्कुराया। पर वो मुस्कान उसकी आँखों तक नहीं पहुँची। "मैं बड़ा हूँ ना। बड़े को ताबीज़ नहीं मिलता। बड़े को मिठाई बनानी होती है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ टोपी के किनारे पर सफ़ेद पड़ गई थीं, इतनी ज़ोर से दबा रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू मेरा भाई है। माँ ने तुझे छोड़ा था, वो उसका दर्द है। पर मैंने तुझे नहीं छोड़ा। और आज भी नहीं छोड़ूँगा।"
टिंकू ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी जेब से एक लड्डू निकाला, आधा टूटा हुआ, और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"कल का है," वो बोला। "बासी नहीं है, थोड़ा सूखा है बस।"
मैंने वो लड्डू खाया। उसमें घी की गंध थी और मिठास ऐसी जो ज़ुबान पर रुक जाए। और मेरी आँखें भर आईं, उसका पता नहीं उसे चला।
मीरा सामने बैठी थी, गाड़ी की पटिया पर, और वो फ़ाइल के पन्ने पलट रही थी। उसकी उँगली एक पन्ने पर रुकी।
"वीर," वो बोली, "सुन। भैरव की फ़ाइल में एक नाम है — 'विक्रम उर्फ़ भैरव।' और उसके नीचे लिखा है — 'पुत्र, विक्रम।' पर पत्नी का नाम काट दिया गया है।"
"काट दिया?"
"काली स्याही से," मीरा ने कहा। "किसी ने बाद में काटा है।"
मैंने फ़ाइल पकड़ी और उस पन्ने को सूँघा। स्याही की गंध के नीचे, हल्की सी, कपूर की गंध थी।
"ये गंगा देवी ने काटा है," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि उसका नाम ऐसी जगह नहीं आना चाहिए जहाँ कोई पढ़ सके," मैंने कहा।
हम शहर के बाहर तीसरे पहर पहुँचे। सूरज ढल रहा था और लोहे के कारखानों की चिमनियाँ धुआँ छोड़ रही थीं। शहर की हवा में कोयले की गंध थी, और उसके नीचे, बहुत हल्की, चीनी की चाशनी की।
बैलगाड़ी रुकी। चिमन भाई ने बैल को पेड़ से बाँधा।
"यहाँ से पैदल," उन्होंने कहा। "स्कूल तीसरी गली में है।"
हम उतरे। टिंकू ने अपना बैग उठाया, जिसमें डिब्बियाँ थीं। मैंने अपनी धोती ठीक की।
हरनाम ने मेरा कंधा पकड़ा।
"वीर," वो बोला, "एक बात। जब हम अंदर जाएँ, और अगर गोलू…" उसका गला रुका। "अगर वो डर गया हो, तो उसे मेरी आवाज़ सुनाइयो। कहियो कि उसका बाप आया है।"
"तू खुद सुनाएगा," मैंने कहा। "मैं तुझे सामने रखूँगा।"
स्कूल बड़ा था। पुराना, पीलापन लिए सफ़ेद, दो मंज़िला, और ऊपर घंटी वाला छोटा गुंबद। चारों तरफ़ ऊँची दीवार, और दीवार पर टूटे काँच की बोतलें जड़ी हुईं। लोहे का गेट बंद था, और उस पर ताला लगा था — बड़ा, भारी, जिसका रंग खून जैसा था।
दीवार के अंदर से आवाज़ आ रही थी। बच्चों के खेलने की, दूर, मैदान से।
हरनाम ने गेट की सलाखें पकड़ीं और उनमें से झाँका। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
मैंने भी झाँका।
मैदान में करीब तीस बच्चे थे। कुछ दौड़ रहे थे, कुछ रस्सी कूद रहे थे। और दूर, दीवार के साये में, एक छोटा लड़का अकेला बैठा था। उसके घुटने मुड़े हुए थे और वो उन्हें अपनी बाँहों में जकड़े हुए था। उसका सिर झुका हुआ था। उसकी कमीज़ पर धूल थी, और एक जगह, कोहनी पर, फटी हुई थी।
हरनाम ने मेरी बाँह जकड़ ली। उसकी साँस रुक गई।
"गोलू," वो फुसफुसाया। और फिर वो कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ उसके गले से एक आवाज़ आई, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरमराहट।
वो गेट की सलाखों से चिपक गया। उसका माथा लोहे से टकराया और वो वहीं रह गया।
बच्चा मैदान में उठा। उसने अपने घुटने झाड़े। और उसी पल उसने पलटकर देखा — नहीं, उसने गेट की तरफ़ नहीं देखा, उसने किसी और चीज़ की तरफ़ देखा, किसी दूसरे बच्चे की तरफ़ जो उसे कुछ बुला रहा था। और वो धीरे-धीरे उसकी तरफ़ चल पड़ा।
हरनाम ने अपने आँसू पोंछे। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो सिर्फ़ एक पिता के चेहरे पर आ सकती है — आधी मुस्कान, आधी टूटी हुई।
"वो बड़ा हो गया है," वो बोला। "देख, वीर। उसकी चाल देख। वो पहले गिरता था, हर दो कदम पर। अब नहीं गिरता।"
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